होम/देश/आरक्षण और सख्त कानूनों से तौबा: खुद को दलित सूची से बाहर कराना चाहती है यह खास जाति, वजह हैरान करने वाली
देशपढ़ने में समय: 5 मिनट

आरक्षण और सख्त कानूनों से तौबा: खुद को दलित सूची से बाहर कराना चाहती है यह खास जाति, वजह हैरान करने वाली

तमिलनाडु की एक प्रमुख जाति ने आरक्षण का लाभ और कड़े कानूनों का मोह त्यागकर खुद को अनुसूचित जाति की श्रेणी से बाहर करने की अनूठी मांग उठाई है। इस समुदाय का मानना है कि इस पहचान से सामाजिक कलंक जुड़ता है और आत्मसम्मान तथा व्यापारिक प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है।
The Freelance ब्यूरो
TheFreelance ब्यूरो
27 सितंबर 2026 • अपडेटेड
🌐Read in English →
शेयर करें:
आरक्षण और सख्त कानूनों से तौबा: खुद को दलित सूची से बाहर कराना चाहती है यह खास जाति, वजह हैरान करने वाली
📷 आरक्षण और सख्त कानूनों से तौबा: खुद को दलित सूची से बाहर कराना चाहती है यह खास जाति, वजह हैरान करने वाली — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • तमिलनाडु के देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय ने अनुसूचित जाति की सूची से बाहर आने की अनोखी पहल शुरू की है।
  • समुदाय ने स्वेच्छा से यह फैसला लिया है कि वे किसी के भी खिलाफ एससी-एसटी कानून का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
  • इस मांग का मुख्य उद्देश्य आर्थिक लाभ नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और मुख्यधारा में व्यापारिक हिस्सेदारी बढ़ाना है।

आरक्षण और कड़े कानूनी सुरक्षा चक्र को छोड़ने का अनूठा फैसला

देशभर में जहां एक ओर विभिन्न जातियां खुद को सरकारी आरक्षण के दायरे में लाने या अपनी श्रेणी उन्नत कराने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं, वहीं इसके ठीक विपरीत एक बेहद दिलचस्प मामला सामने आया है। तमिलनाडु की एक प्रभावशाली कृषि और पशुपालक जाति ने खुद को सरकारी दस्तावेजों में मिलने वाली अनुसूचित जाति यानी एससी की सूची से बाहर करने का मन बना लिया है। भारतीय सामाजिक इतिहास में यह अपनी तरह का एक अनोखा और साहसिक कदम माना जा रहा है, जहां कोई समूह तमाम कानूनी और संवैधानिक सुविधाओं को स्वेच्छा से त्यागने की बात कर रहा है।

इस समुदाय का नाम देवेंद्रकुला वेल्लालर है, जो मुख्य रूप से दक्षिणी तमिलनाडु और कावेरी डेल्टा के उपजाऊ क्षेत्रों में निवास करता है। इस बिरादरी के लोगों का साफ तौर पर कहना है कि उन्हें अब सरकारी कोटे की बैसाखियों की जरूरत नहीं है। उनका मुख्य लक्ष्य अपनी खोई हुई सामाजिक गरिमा को पुनर्जीवित करना और समाज में एक स्वतंत्र व प्रतिष्ठित पहचान स्थापित करना है। उनका मानना है कि इस विशेष दर्जे के साथ जुड़ा सामाजिक कलंक उनके युवाओं के लिए व्यापार और उच्च व्यवसायों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बनता है.

विज्ञापन • ADVERTISEMENT

संबंधित खबरें

राजस्थान पर्यटन का बदलता ट्रेंड: महलों की सैर से आगे बढ़कर अब देसी परिवारों के साथ जिंदगी जी रहे विदेशी सैलानी

राजस्थान पर्यटन का बदलता ट्रेंड: महलों की सैर से आगे बढ़कर अब देसी परिवारों के साथ जिंदगी जी रहे विदेशी सैलानी

बिहार एमएलसी चुनाव से पहले सियासी पारा हाई: बाहुबली विधायक और सत्ताधारी दल के नेता आमने-सामने, छिड़ी जुबानी जंग

बिहार एमएलसी चुनाव से पहले सियासी पारा हाई: बाहुबली विधायक और सत्ताधारी दल के नेता आमने-सामने, छिड़ी जुबानी जंग

सिनेमा से सियासत तक: थलपति विजय का बड़ा कदम, बच्चों को सोने की अंगूठी पहनाकर जीतेंगे दिल

सिनेमा से सियासत तक: थलपति विजय का बड़ा कदम, बच्चों को सोने की अंगूठी पहनाकर जीतेंगे दिल

यूनिवर्सिटीज में सुलगती चिंगारी: क्या सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे झूठे संदेशों से बिगाड़ा जा रहा है अमन?

यूनिवर्सिटीज में सुलगती चिंगारी: क्या सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे झूठे संदेशों से बिगाड़ा जा रहा है अमन?

बिहार में बढ़ते अपराध पर सियासत तेज: जदयू नेता श्याम रजक बोले- दीया बुझने से पहले तेज होती है लौ

बिहार में बढ़ते अपराध पर सियासत तेज: जदयू नेता श्याम रजक बोले- दीया बुझने से पहले तेज होती है लौ

राजस्थान में निकाय चुनाव की आचार संहिता समाप्त: सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों से पाबंदी हटी, अटके विकास कार्यों को मिलेगी रफ्तार

राजस्थान में निकाय चुनाव की आचार संहिता समाप्त: सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों से पाबंदी हटी, अटके विकास कार्यों को मिलेगी रफ्तार

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर घमासान तेज: चुनाव आयोग के नए नियमों से आम जनता को बड़ी राहत

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर घमासान तेज: चुनाव आयोग के नए नियमों से आम जनता को बड़ी राहत

बॉक्स ऑफिस पर 'द पैराडाइज' का तहलका: सिर्फ तीन दिनों में 100 करोड़ के पार पहुंची नानी की फिल्म

बॉक्स ऑफिस पर 'द पैराडाइज' का तहलका: सिर्फ तीन दिनों में 100 करोड़ के पार पहुंची नानी की फिल्म

एससी-एसटी कानून के इस्तेमाल से तौबा का संकल्प

इस पूरे घटनाक्रम के बीच समुदाय के भीतर एक और बड़ा वैचारिक बदलाव देखने को मिला है। बिरादरी के नेताओं और प्रमुख लोगों ने आपसी सहमति से यह तय किया है कि वे किसी भी आपसी विवाद या अन्य मामलों में कड़े एससी-एसटी अधिनियम का प्रयोग नहीं करेंगे। उनका मानना है कि इस तरह के कड़े प्रावधानों के प्रयोग से समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरियां और कटुता बढ़ती है, जिससे समग्र सामाजिक सौहार्द पर बुरा असर पड़ता है।

इस नीति का मुखर समर्थन करते हुए स्थानीय स्तर पर नेताओं ने खुलकर अपनी बात रखी है। उनका तर्क है कि कानूनी लड़ाइयों और मुकदमों के बजाय आपसी संवाद और भाईचारे के जरिए समाज में बदलाव लाया जाना चाहिए। समुदाय का यह रुख मौजूदा दौर की राजनीतिक और सामाजिक बहसों से बिल्कुल अलग हटकर है, जहां अमूमन कानूनी प्रावधानों को सुरक्षा कवच के रूप में सबसे आगे रखा जाता है।

"हमारे समुदाय ने स्वैच्छिक रूप से यह तय किया है कि हम किसी के खिलाफ भी एससी-एसटी एक्ट के तहत मामले दर्ज नहीं कराएंगे। हमारा मानना है कि इन कानूनों के दुरुपयोग से आपसी कटुता बढ़ती है और सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है।" — अनंतन अय्यासामी, समुदाय के प्रमुख नेता

ऐतिहासिक पहचान की तलाश और कृषि संस्कृति की जड़ें

इस समुदाय के इतिहास और संस्कृति की बात करें तो 'देवेंद्रकुला' शब्द का गहरा पौराणिक अर्थ है, जो खुद को देवराज इंद्र का वंशज मानता है, जबकि 'वेल्लालर' शब्द पारंपरिक रूप से खेती-किसानी और भूमि से जुड़ा हुआ है। यह मुख्य रूप से एक मेहनतकश कृषक और गो-पालक वर्ग है, जिसकी आबादी तमिलनाडु की कुल अनुसूचित जाति आबादी का एक मजबूत हिस्सा बनाती है। राज्य की कुल जनसांख्यिकी में इनकी हिस्सेदारी लगभग पांच से नौ प्रतिशत के आसपास आंकी जाती है, जो मदुरै, तिरुनेलवेली, रामनाथपुरम और थूथुकुडी जैसे जिलों में बहुतायत में रहते हैं।

वर्ष 2021 के दौरान संसद द्वारा एक विशेष विधेयक पारित करके पल्लार समेत करीब सात उप-जातियों को मिलाकर इस एकीकृत पहचान को कानूनी अमलीजामा पहनाया गया था। उस समय केंद्रीय सत्ता के शीर्ष नेताओं ने भी इस समुदाय की सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर की सराहना की थी। हालांकि, अब इस पहचान को एक कदम आगे ले जाते हुए वे लोग प्रशासनिक और संवैधानिक स्तर पर अपनी श्रेणी में बदलाव की पुरजोर मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें एक नई सामाजिक दिशा मिल सके।

ओबीसी से होते हुए अनारक्षित श्रेणी तक पहुंचने का दीर्घकालिक लक्ष्य

समुदाय के बुद्धिजीवियों और नेताओं का रोडमैप बेहद स्पष्ट है। उनकी शुरुआती मांग यह है कि उन्हें सबसे पहले अनुसूचित जाति की सूची से हटाकर अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी श्रेणी में स्थानांतरित किया जाए। इसके बाद उनकी योजना अगले एक से डेढ़ दशक तक ओबीसी कोटे के तहत अपनी स्थिति मजबूत करने की है, ताकि उनका अंतिम और वास्तविक लक्ष्य हासिल हो सके।

उनका अंतिम सपना खुद को पूरी तरह से सामान्य यानी अनारक्षित श्रेणी का हिस्सा बनाना है। उनका सोचना है कि तमिलनाडु में पहले से ही व्यापक स्तर पर आरक्षण व्यवस्था लागू है, लेकिन एससी श्रेणी में बने रहने से उन्हें कोई वास्तविक अतिरिक्त फायदा नहीं मिल रहा है, बल्कि इसके कारण उन्हें कई स्तरों पर सामाजिक भेदभाव और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

धार्मिक मान्यताओं और आंतरिक बहसों का नया मोड़

इस पूरी मांग के बीच समुदाय के भीतर भी वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आए हैं। बहुसंख्यक हिस्सा जो पारंपरिक हिंदू आस्थाओं से जुड़ा है, वह इस पुरानी श्रेणी से मुक्ति पाने के पक्ष में पूरी तरह एकजुट नजर आता है। उनका मानना है कि यह बदलाव उनकी आने वाली पीढ़ियों के आत्मसम्मान के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

दूसरी ओर, इसी समुदाय के वे लोग जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है, इस पूरी कवायद का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक आरक्षण मॉडल ही उनके अधिकारों की सबसे सुरक्षित गारंटी है। इसके बावजूद, बहुसंख्यक वर्ग अपनी इस अनूठी मांग पर अडिग है कि उन्हें सरकारी मदद से ज्यादा अपनी व्यक्तिगत गरिमा और मेहनत के बल पर आगे बढ़ना है।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
विज्ञापन एवं अनुशंसित सामग्री • RECOMMENDED

संबंधित खबरें (Related Articles)

राजस्थान पर्यटन का बदलता ट्रेंड: महलों की सैर से आगे बढ़कर अब देसी परिवारों के साथ जिंदगी जी रहे विदेशी सैलानीNATIONAL

राजस्थान पर्यटन का बदलता ट्रेंड: महलों की सैर से आगे बढ़कर अब देसी परिवारों के साथ जिंदगी जी रहे विदेशी सैलानी

27 सित॰
बिहार एमएलसी चुनाव से पहले सियासी पारा हाई: बाहुबली विधायक और सत्ताधारी दल के नेता आमने-सामने, छिड़ी जुबानी जंगNATIONAL

बिहार एमएलसी चुनाव से पहले सियासी पारा हाई: बाहुबली विधायक और सत्ताधारी दल के नेता आमने-सामने, छिड़ी जुबानी जंग

27 सित॰
सिनेमा से सियासत तक: थलपति विजय का बड़ा कदम, बच्चों को सोने की अंगूठी पहनाकर जीतेंगे दिलNATIONAL

सिनेमा से सियासत तक: थलपति विजय का बड़ा कदम, बच्चों को सोने की अंगूठी पहनाकर जीतेंगे दिल

27 सित॰
यूनिवर्सिटीज में सुलगती चिंगारी: क्या सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे झूठे संदेशों से बिगाड़ा जा रहा है अमन?NATIONAL

यूनिवर्सिटीज में सुलगती चिंगारी: क्या सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे झूठे संदेशों से बिगाड़ा जा रहा है अमन?

27 सित॰
बिहार में बढ़ते अपराध पर सियासत तेज: जदयू नेता श्याम रजक बोले- दीया बुझने से पहले तेज होती है लौNATIONAL

बिहार में बढ़ते अपराध पर सियासत तेज: जदयू नेता श्याम रजक बोले- दीया बुझने से पहले तेज होती है लौ

27 सित॰
राजस्थान में निकाय चुनाव की आचार संहिता समाप्त: सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों से पाबंदी हटी, अटके विकास कार्यों को मिलेगी रफ्तारNATIONAL

राजस्थान में निकाय चुनाव की आचार संहिता समाप्त: सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों से पाबंदी हटी, अटके विकास कार्यों को मिलेगी रफ्तार

27 सित॰
मतदाता सूची पुनरीक्षण पर घमासान तेज: चुनाव आयोग के नए नियमों से आम जनता को बड़ी राहतNATIONAL

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर घमासान तेज: चुनाव आयोग के नए नियमों से आम जनता को बड़ी राहत

27 सित॰
बॉक्स ऑफिस पर 'द पैराडाइज' का तहलका: सिर्फ तीन दिनों में 100 करोड़ के पार पहुंची नानी की फिल्मNATIONAL

बॉक्स ऑफिस पर 'द पैराडाइज' का तहलका: सिर्फ तीन दिनों में 100 करोड़ के पार पहुंची नानी की फिल्म

27 सित॰