देश की राजनीति में संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर बड़ा घमासान छिड़ गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजधानी लखनऊ में एक उच्चस्तरीय प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों के दोहरे चरित्र पर करारा प्रहार किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के कुछ राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर अपनी विफलताओं का ठीकरा हमेशा निष्पक्ष संस्थाओं के सिर फोड़ते आए हैं। जनता द्वारा नकारे जाने के बाद इन दलों के नेताओं के पास केवल अनर्गल प्रलाप करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है।
जीत का श्रेय खुद को और हार पर संवैधानिक संस्थाओं को दोष
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया के सामने खुलकर बात रखते हुए कहा कि राजनीति में जीत और हार सिक्के के दो पहलू हैं, जिसे हर राजनीतिक दल को सहजता से स्वीकार करना चाहिए। हालांकि, विडंबना यह है कि जब चुनाव में इन दलों को जीत मिलती है, तब ये अपनी पीठ थपथपाते हैं और अपने पुरुषार्थ का बखान करते थकते नहीं हैं। वहीं, जैसे ही जनता इन्हें खारिज कर देती है, वैसे ही इनका सारा गुस्सा देश के निर्वाचन आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम और अन्य स्वतंत्र संस्थाओं पर उतरने लगता है।
उन्होंने आगे कहा कि इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना रवैया देश की मजबूत लोकतांत्रिक नींव को अंदर से खोखला करने का सुनियोजित षड्यंत्र है। जब कोई दल अपनी आंतरिक कमियों और जनता के बीच अपनी अलोकप्रियता को स्वीकार नहीं कर पाता, तो वह झूठे आरोप लगाने का आसान रास्ता चुन लेता है। मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में हिंसा, तोड़फोड़ और जनता के बीच भ्रम फैलाने के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
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एसआईआर प्रक्रिया पर फैलाए जा रहे भ्रम का पर्दाफाश
हाल ही में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर भी मुख्यमंत्री ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि एसआईआर कोई पहली बार लागू की गई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि देश में पहले भी कई दशकों और वर्षों में यह प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ अपनाई जा चुकी है। इसके बावजूद कुछ राजनीतिक दल इस पर बेवजह का बवंडर खड़ा कर रहे हैं ताकि आम जनता के मन में भ्रम की स्थिति पैदा की जा सके।
मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि देश के तीनों चुनाव आयुक्तों ने खुद मीडिया के सामने आकर एसआईआर की पूरी प्रक्रिया का खाका खींचा था। साथ ही, छूटे हुए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 की व्यवस्था को लेकर भी दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया गया था। इसके बाद भी लगातार अनर्गल बयानबाजी करना यह साबित करता है कि विपक्ष का मकसद केवल राजनीति करना है, तथ्यों से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
इमरजेंसी से लेकर सेना के शौर्य तक पर उठाए गए सवाल
कांग्रेस पार्टी के ऐतिहासिक और राजनीतिक आचरण पर हमला बोलते हुए योगी आदित्यनाथ ने 1975 के काले दौर की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी ने देश में इमरजेंसी लगाकर लोकतंत्र का गला घोंटने का काम किया हो, आज वही दल संवैधानिक शुचिता का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने अपने शासनकाल में कई राज्यों में चुनी हुई सरकारों को अनैतिक तरीकों से गिराने का गंदा खेल खेला था।
"कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अपने गैर-जिम्मेदाराना रवैये के लिए देश की जनता और संवैधानिक संस्थाओं से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए। चुनाव में हार के बाद ईवीएम पर ठीकरा फोड़ना इनकी पुरानी आदत बन चुकी है।" — योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री ने देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भी विपक्ष के रुख को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे गौरवशाली अभियानों के दौरान भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल खड़े करना कौन सी देशभक्ति है? सेना के शौर्य पर शक जाहिर करके ये दल देश के दुश्मनों को ही परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने का काम करते हैं।
न्यायपालिका और कैग पर उठाए गए बयानों की निंदा
विपक्ष के शीर्ष नेताओं द्वारा विदेश की धरती पर जाकर देश की न्यायपालिका और स्वतंत्र जांच एजेंसियों की गरिमा को ठेस पहुंचाने के मामलों का भी जिक्र किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि संसद से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक भारत की मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर सवालिया निशान लगाना देश की छवि को धूमिल करने का कुत्सित प्रयास है। राफेल जैसे मामलों में कैग की रिपोर्ट पर सवाल खड़े करना और अपनी ही जीत वाले राज्यों में ईवीएम को सही तथा हार वाले राज्यों में उसे 'ब्लैक बॉक्स' करार देना पाखंड की पराकाष्ठा है।
उन्होंने अंत में कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, जहां हर एक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान करने का पवित्र अधिकार मिला हुआ है। मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के लिए पुख्ता कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में तुच्छ राजनीतिक फायदों के लिए इन सम्मानित संस्थाओं पर कीचड़ उछालना किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाना चाहिए।






