कल्याणकारी योजनाओं के दावों और हकीकत के बीच बड़ा फर्क
देशभर में गरीबों और जरूरतमंदों के कल्याण के लिए तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों और रिपोर्ट्स ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की पोल खोल दी है। अंत्योदय राशन कार्ड धारकों को सरकार की तरफ से कई तरह की आर्थिक और सामाजिक सहायता मिलने का प्रावधान है, जिसमें मुफ्त इलाज की सुविधा सबसे अहम मानी जाती है। इसके बावजूद, हजारों की संख्या में ऐसे परिवार हैं जो इस महत्वपूर्ण सुरक्षा घेरे से पूरी तरह बाहर हैं।
सरकारी दावों के विपरीत, जब जमीनी हकीकत की पड़ताल की जाती है, तो पता चलता है कि कैसे छोटी-छोटी तकनीकी अड़चनें और विभागों के बीच आपसी तालमेल की कमी का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। जिन लोगों के पास अंत्योदय कार्ड है, उन्हें समाज का सबसे कमजोर वर्ग माना जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरत के मोर्चे पर उनका इस तरह उपेक्षित रहना एक गंभीर विषय है।
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आयुष्मान सुरक्षा से वंचित होने की असल वजह क्या है?
सवाल यह उठता है कि जब सरकार के पास लाभार्थियों का पूरा डेटाबेस मौजूद है, तो फिर इतने बड़े पैमाने पर लोग आयुष्मान जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के दायरे से बाहर कैसे रह गए। इसके पीछे कई वजहें सामने आ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या डेटा का समय पर अपडेट न होना और नाम, पते में मामूली गलतियां होना है। कई मामलों में देखा गया है कि जब अंत्योदय कार्ड बनाए गए, तब उनका डिजिटल डेटाबेस सही तरीके से केंद्रीय सर्वर से लिंक नहीं किया गया।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अमले की उदासीनता भी इस समस्या को और बढ़ा रही है। कार्डधारकों को यह तक नहीं पता होता कि उनका नाम आयुष्मान योजना की सूची में जुड़ा है या नहीं। जब वे अचानक गंभीर बीमारी की चपेट में आते हैं और अस्पताल पहुंचते हैं, तब उन्हें पता चलता है कि उनका कार्ड मान्य नहीं है या पोर्टल पर उनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। उस वक्त उनके सामने इलाज करवाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता और उन्हें कर्ज के दलदल में फंसना पड़ता है।
अधिकारियों की कार्यशैली पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यदि विभाग चाहे तो विशेष अभियान चलाकर इन छूटे हुए परिवारों का सत्यापन कुछ ही दिनों में पूरा कर सकता है। लेकिन फाइलों की लालफीताशाही और सुस्त रवैये के कारण यह काम सालों से लटका हुआ है। पीड़ित परिवार जब ब्लॉक या जिला मुख्यालयों के चक्कर काटते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिलता।
"सरकार की मंशा हर गरीब तक मुफ्त इलाज पहुंचाने की है, लेकिन मैदानी स्तर पर बैठे अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे हैं। जब तक डेटा का पारदर्शी सत्यापन नहीं होगा, तब तक इस तरह की कमियां बनी रहेंगी।"— सामाजिक कार्यकर्ता एवं विश्लेषक
स्थानीय नागरिकों और विभिन्न संगठनों ने भी इस स्थिति पर गहरी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि योजना के प्रचार-प्रसार में तो करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जो लोग वास्तव में इसके हकदार हैं, वे कागजी औपचारिकताओं के जाल में फंसकर रह जाते हैं।
आम जनता की जेब पर पड़ रहा है सीधा असर
स्वास्थ्य सेवाएं आज के समय में सबसे महंगी चीजों में शुमार हो चुकी हैं। एक सामान्य परिवार के लिए अचानक आए मेडिकल खर्च को उठाना नामुमकिन जैसा होता है। अंत्योदय श्रेणी में आने वाले लोग दिहाड़ी मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके अपना गुजर-बसर करते हैं। ऐसे में यदि घर के किसी मुखिया या सदस्य को गंभीर बीमारी घेर लेती है, तो इलाज के लिए उन्हें अपनी जमीन, गहने या तो गिरवी रखने पड़ते हैं या फिर भारी-भरकम ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है।
अगर ये सभी परिवार आयुष्मान योजना के दायरे में होते, तो उन्हें पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज आसानी से मिल सकता था। प्रशासनिक लापरवाही के कारण इन गरीबों को हर रोज स्वास्थ्य और आर्थिक मोर्चे पर दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। यह स्थिति न सिर्फ सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी बेहद चिंताजनक है।
सुधार के लिए क्या कदम उठाने की है जरूरत?
इस गंभीर समस्या का समाधान निकालने के लिए अब प्रशासनिक स्तर पर तत्काल ठोस कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है। सबसे पहले जिला प्रशासन को चाहिए कि वह सभी कोटे के राशन डीलर्स के माध्यम से छूटे हुए अंत्योदय कार्डधारकों की एक नई सूची तैयार करवाए। इसके बाद एक विशेष कैंप लगाकर इनके आयुष्मान कार्ड ऑन-द-स्पॉट बनाए जाएं, ताकि इन्हें अविलंब स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ मिल सके।
तकनीकी कमियों को दूर करने के लिए सॉफ्टवेयर को और अधिक सरल बनाया जाना चाहिए ताकि मामूली गलतियों की वजह से किसी गरीब का हक न मारा जाए। साथ ही, लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो। जब तक प्रशासन पूरी ईमानदारी से इस दिशा में काम नहीं करेगा, तब तक कागजों पर चलाई जा रही योजनाएं जमीन पर दम तोड़ती रहेंगी।



