राजनीतिक सरगर्मी के बीच प्रधानमंत्री का बड़ा संदेश
देश की सियासत इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर है जहां पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चरम पर पहुंच चुका है। चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दल लगातार हमलावर रुख अपनाए हुए हैं। ऐसे संवेदनशील राजनीतिक माहौल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी प्राथमिकताओं और वैचारिक स्पष्टता को बेहद खुलकर देश के सामने रखा है। उन्होंने साफ कर दिया है कि तमाम राजनीतिक उठापटक और चुनावी व्यस्तता के बावजूद उनका मुख्य केंद्र बिंदु जनता की सेवा और राष्ट्र का विकास ही बना हुआ है।
हाल ही में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर उपजे सियासी बवाल पर चारों तरफ चर्चाएं गर्म थीं। विपक्षी दलों की ओर से जिस तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही थीं और जनता को सड़कों पर उतरने के आह्वान किए जा रहे थे, उसने राष्ट्रीय राजनीति का पारा बढ़ा दिया था। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर जनता के साथ उनके जुड़ाव और वैचारिक दृढ़ता को रेखांकित करता है। उन्होंने यह जताने का प्रयास किया है कि आलोचनाओं और सियासी हमलों का असर उनके सेवा भाव के संकल्प को डिगा नहीं सकता है।
संबंधित खबरें
वडनगर से वाराणसी तक फैली 'सेवा संकल्प यात्रा'
यह पूरा संवाद एक विशेष आयोजन के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन और उनके सार्वजनिक जीवन के 25 गौरवशाली वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक अनोखी 'सेवा संकल्प यात्रा' निकाली जा रही है। यह यात्रा उनके जन्मस्थान गुजरात के ऐतिहासिक शहर वडनगर से शुरू होकर धार्मिक नगरी उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक का सफर तय कर रही है। इस यात्रा में देश के विभिन्न राज्यों से आए युवा उत्साह के साथ भाग ले रहे हैं।
मध्य प्रदेश के देवास में जब यह यात्रा पहुंची, तो वहां मौजूद प्रतिभागियों ने प्रधानमंत्री के साथ सीधा संवाद किया। अलग-अलग पृष्ठभूमियों और राज्यों से ताल्लुक रखने वाले इन युवाओं के साथ बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री ने अपनी राजनीतिक यात्रा के शुरुआती दिनों और संस्कारों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार गुजरात के छोटे से कस्बे से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के सफर में 'सेवा' ही उनकी शासन व्यवस्था का मुख्य आधार रही है।
'नागरिक देवो भव:' की भावना और शासन का मूल मंत्र
प्रधानमंत्री ने शासन व्यवस्था और जनता के बीच के रिश्तों को परिभाषित करते हुए कहा कि जब नीति और नीयत के केंद्र में सेवा का भाव होता है, तो हर फैसला जनहित में बदल जाता है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्राचीन मंत्र 'नागरिक देवो भव:' का हवाला देते हुए कहा कि सत्ता या पद पाकर कभी भी अहंकार या विचलित होने की गुंजाइश नहीं बचती है। राजनीति में भले ही कितने ऊंचे पद और शिखर क्यों न मिल जाएं, लेकिन असली सफलता जनता के दिलों में जगह बनाने से ही मिलती है।
"राजनीति अपनी जगह है, चुनाव अपनी जगह पर है, शासन व्यवस्थाएं अपनी जगह पर हैं। लेकिन हम तो राष्ट्र निर्माण के लिए निकले हुए लोग हैं, हम विकसित भारत के संकल्प को लेकर निकले हुए लोग हैं।" — नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
उन्होंने यात्रा में शामिल युवाओं को नसीहत दी कि वे अपने आचरण से समाज में सकारात्मक संदेश दें। उनके मुताबिक, यदि कोई जनप्रतिनिधि या कार्यकर्ता सेवा परमो धर्म के रास्ते पर चलता है, तो लोग उस समर्पण को कभी नहीं भूलते हैं। यही वजह है कि जनता का अटूट आशीर्वाद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत और ऊर्जा का स्रोत है, जिसके दम पर वे लगातार काम कर रहे हैं।
विकसित भारत 2047 और युवा शक्ति की बड़ी भूमिका
देश को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने के विजन पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने साल 2047 तक 'विकसित भारत' के निर्माण के संकल्प को दोहराया। उन्होंने कहा कि इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने में देश की युवा शक्ति की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है। युवाओं को सिर्फ अपने करियर तक सीमित न रहकर राष्ट्र निर्माण के महायज्ञ में अपनी आहुति देनी चाहिए। सेवा भाव से किए गए छोटे-छोटे प्रयास भी जब सामूहिक रूप लेते हैं, तो वे एक बड़े बदलाव का कारण बनते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब राजनीतिक माहौल को गर्माने की कोशिशें हो रही थीं। जनता के बीच सीधे संवाद के जरिए उन्होंने संदेश दिया है कि तमाम राजनीतिक लड़ाइयों के बीच देश की दिशा और दशा बदलने का उनका संकल्प कमजोर नहीं पड़ने वाला है। सेवा और समर्पण के इसी रास्ते पर चलकर देश को आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने की राह तय की जाएगी।






