वाशिंगटन और मॉस्को से लेकर कीव तक इस समय कूटनीतिक हलचल बहुत तेज हो गई है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर रूस और यूक्रेन युद्ध को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रम्प ने दावा किया है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के मुकाबले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस भीषण युद्ध को खत्म करने के लिए ज्यादा गंभीर हैं। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय पर सामने आया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति वार्ताओं को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
इस बयान के ठीक दो दिन पहले ऊर्जा सीजफायर यानी ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने को लेकर बड़े दावे किए गए थे। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के दावों के कुछ ही घंटों के भीतर रूस ने फिर से आक्रामक रुख अपना लिया और कई ठिकानों पर ताबड़तोड़ छह से ज्यादा हमले कर दिए। इस हमले के बाद से शांति समझौते की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है और युद्ध रुकने के आसार फिलहाल कमजोर पड़ते दिख रहे हैं।
शांति समझौतों के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, कूटनीतिक मंचों पर चाहे जितने भी दावे किए जाएं लेकिन युद्ध के मैदान में गोलाबारी जरा भी कम नहीं हुई है। रूस और यूक्रेन दोनों ही देश अपनी सैन्य रणनीतियों पर पूरी ताकत से टिके हुए हैं। ट्रम्प का यह दावा अमेरिकी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस छेड़ रहा है। अमेरिका के भीतर भी इस बात पर चर्चा हो रही है कि क्या ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद इस युद्ध को रोकने का कोई ठोस फॉर्मूला निकल पाएगा या नहीं।
दूसरी ओर, यूरोपीय देशों और यूक्रेन की सरकार का मानना है कि रूस पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। यूक्रेनी पक्ष का कहना है कि पुतिन शांति समझौते के नाम पर केवल समय बर्बाद कर रहे हैं जबकि उनकी सेना लगातार हमलों को अंजाम दे रही है। पश्चिमी देशों की खुफिया रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई है कि रूस अपनी सैन्य स्थिति को और मजबूत करने के बाद ही किसी वास्तविक समझौते की मेज पर बैठेगा।
ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराता खतरा और वैश्विक अर्थव्यवस्था
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस टकराव का सबसे बड़ा असर दोनों देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर पड़ रहा है। बिजली घर, तेल रिफाइनरी और गैस पाइपलाइन लगातार इन हमलों का शिकार हो रही हैं। सर्दियों के इस मौसम में ऊर्जा ठिकानों पर हमले होने से आम नागरिकों का जीवन बेहद मुश्किल हो गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का दौर लगातार बना हुआ है, जिससे दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।
भारत समेत कई विकासशील देश इस पूरे घटनाक्रम पर बहुत बारीक नजर बनाए हुए हैं। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से महंगाई का खतरा हमेशा बना रहता है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष सीधी और बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार नहीं होते, तब तक किसी स्थायी शांति समझौते की उम्मीद करना बहुत मुश्किल होगा।





