डोनाल्ड ट्रंप की दो टूक: ईरान पर होगा बड़ा फैसला, आसान या मुश्किल रास्ते का विकल्प
अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण संघर्ष अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर आक्रामक तेवर दिखाए हैं। व्हाइट हाउस से बाहर निकलते हुए ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में साफ कहा कि अमेरिका को अब ईरान के मामले में एक निर्णायक कदम उठाना होगा। उन्होंने दावा किया कि ईरान की अर्थव्यवस्था और उसकी सैन्य क्षमता बुरी तरह तबाह हो चुकी है, जिसके बाद अब सवाल केवल यह बचता है कि वाशिंगटन इस स्थिति से निपटने के लिए कौन सा रास्ता अपनाता है।
ट्रंप के इस बयान से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सरगर्मी काफी बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाया जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में होने वाले आगामी मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले इस तरह के तीखे बयान घरेलू राजनीति और भू-राजनीतिक दबाव दोनों का हिस्सा हैं। ट्रंप का यह भी दावा है कि जैसे ही यह संघर्ष समाप्त होगा, वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी।
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पश्चिम एशिया में अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा जमावड़ा
केवल जुबानी जंग तक ही मामला सीमित नहीं है, बल्कि पेंटागन ने जमीन पर अपनी सैन्य मौजूदगी को असाधारण स्तर तक बढ़ा दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने अपने तीसरे विमानवाहक पोत 'यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट' को युद्धक समूह और कई अन्य सहायक पोतों के साथ पश्चिम एशिया की ओर रवाना कर दिया है। इसके साथ ही हजारों की संख्या में मरीन सैनिकों और नौसेना के जवानों को भी उस क्षेत्र में भेजा जा रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि साल 2003 के बाद यह पहला मौका है जब अमेरिकी नौसेना ने इतनी भारी संख्या में अपने युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों को एक साथ इस क्षेत्र में तैनात किया है। पहले से ही क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी विमानवाहक पोतों और अत्याधुनिक एफ-35 फाइटर जेट्स के साथ मिलकर यह नया सैन्य बेड़ा राष्ट्रपति ट्रंप को किसी भी बड़े सैन्य अभियान को अंजाम देने के लिए व्यापक रणनीतिक विकल्प प्रदान करता है।
तेहरान में युद्ध की तैयारी: हाथों में चूड़ियों की जगह बंदूकों ने ली जगह
एक तरफ जहां अमेरिका और उसके सहयोगी देश सैन्य दबाव बना रहे हैं, वहीं ईरान ने भी किसी भी संभावित जमीनी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की पूरी तैयारी कर ली है। राजधानी तेहरान की सड़कों और सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों से चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां आम नागरिक, विशेषकर महिलाएं बड़ी संख्या में हथियार चलाने का कड़ा प्रशिक्षण ले रही हैं। इमाम हुसैन स्क्वायर पर स्थित मिलिट्री ट्रेनिंग सेंटर में महिलाओं ने हैंडगन और अन्य आधुनिक हथियारों को थामकर सटीक निशाना लगाने का अभ्यास किया।
प्रशिक्षण में हिस्सा लेने वाली महिलाओं का साफ कहना है कि वे अपने परिवारों, बच्चों और देश की रक्षा के लिए हर खतरे से टकराने को तैयार हैं। इन सिविलियन ट्रेनिंग सेंटर्स का मुख्य उद्देश्य आम जनता को दुश्मन सेना के संभावित जमीनी हमलों से निपटने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाना है।
"अगर हमारे दुश्मन फिर से सैन्य टकराव का रास्ता चुनते हैं, तो हमारा जवाब पहले से कहीं ज़्यादा कड़ा होगा और हम पूरी ताकत के साथ अपना बचाव करेंगे। इस संघर्ष का कोई सैन्य समाधान नहीं है और न ही नए प्रतिबंधों से कोई स्थायी हल निकल सकता है।" — अब्बास अरागची, ईरान के विदेश मंत्री
कूटनीति के दरवाजे बंद, क्या युद्ध का दायरा और बढ़ेगा?
ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने अमेरिका की किसी भी धमकी के आगे झुकने से साफ इंकार कर दिया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गलीबाफ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को तब तक नहीं खोला जाएगा जब तक कि पिछले समझौतों के तहत तय की गई सभी शर्तें पूरी नहीं हो जातीं। तेहरान का रुख यह बताता है कि वे कूटनीतिक दबाव के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका में होने वाले चुनावों के नतीजों का इस पूरे संघर्ष पर गहरा असर पड़ेगा। यदि वाशिंगटन और तेहरान के बीच कूटनीतिक संवाद बहाल नहीं होता है, तो आने वाले दिनों में यह युद्ध पश्चिम एशिया की सीमाओं को पार कर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को और अधिक गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।







