जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में विधानसभा के भीतर एक ऐसा बयान दिया है जिसके बाद से देश की सियासत में गर्माहट आ गई है। उन्होंने केंद्र सरकार और सुरक्षा हालातों पर निशाना साधते हुए कहा है कि यदि राज्य के दर्जे की वापसी पूरी तरह से आतंकवाद के खात्मे पर निर्भर करती है, तो फिर इस बात का फैसला देश की राजधानी नई दिल्ली में नहीं बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होना तय होगा। उनके इस तीखे और कड़े तेवर वाले बयान ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
विधानसभा में स्पष्ट की गई पूर्ण राज्य के प्रस्ताव की स्थिति
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी सरकार की तरफ से लाए गए प्रस्ताव में किसी भी प्रकार से अनुच्छेद 370 या फिर पुराने विशेष दर्जे (स्पेशल स्टेटस) की बहाली का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। इसके बावजूद, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कुछ सदस्य इस मुद्दे पर भ्रामक स्थितियां पैदा करने में सफल रहे और उन्होंने प्रस्ताव में संशोधन पेश करने की कोशिश की। मुख्यमंत्री ने अपने सभी विधायकों और सहयोगियों से अपील की कि वे ऐसे किसी भी संशोधन के बहकावे में न आएं, जिसका उपयोग राजनीतिक दल राज्य का दर्जा वापस पाने की पूरी प्रक्रिया को बाधित करने के लिए कर सकते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ जम्मू-कश्मीर के आम नागरिकों को उनका संवैधानिक हक दिलाना है। पूर्ण राज्य का दर्जा न होने की वजह से क्षेत्रीय स्तर पर शासन व्यवस्था और जनता के रोजमर्रा के कामों में किस तरह की बाधाएं आ रही हैं, इसका जिक्र करते हुए उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों को भी बेनकाब किया। उमर अब्दुल्ला के मुताबिक, इस दर्जे के अभाव में आम जनता लगातार पिस रही है और विकास कार्यों की गति भी प्रभावित हो रही है।
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आतंकवाद और राज्य के दर्जे को लेकर तीखा कटाक्ष
अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने आतंकवाद और सुरक्षा के मुद्दों पर बात करते हुए सबसे तीखी टिप्पणी की। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अगर केंद्र सरकार की यह शर्त है कि जम्मू-कश्मीर में जब तक पूरी तरह से शांति स्थापित नहीं हो जाती और उग्रवाद का साया पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, तब तक यहां की जनता को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल सकता, तो फिर यह समयसीमा हमारे हाथ में नहीं है।
"अगर राज्य का दर्जा बहाल करने की शर्त जेएंडके में उग्रवाद से जुड़ी है और यह तभी बहाल होगा जब वहां पूरी तरह शांति हो जाएगी, तो मैं यही कहूंगा कि राज्य का दर्जा बहाल करने का फैसला नई दिल्ली में नहीं, बल्कि पाकिस्तान के इस्लामाबाद में होगा।" — उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर
इस बयान के जरिए उन्होंने यह दर्शाने की कोशिश की कि यदि बाहरी ताकतों और सीमा पार से होने वाले आतंकवाद पर ही सब कुछ निर्भर छोड़ दिया जाएगा, तो राज्य के अधिकारों की बहाली अनिश्चितकाल के लिए टल सकती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आंतरिक प्रशासन और लोकतांत्रिक अधिकारों को सुरक्षा के पैमाने पर अनिश्चितकाल के लिए होल्ड पर नहीं रखा जाना चाहिए।
प्रशासनिक असहयोग और नौकरशाही पर गंभीर सवाल
राजनीतिक मोर्चे के अलावा, उमर अब्दुल्ला ने प्रशासनिक मशीनरी के भीतर चल रही खींचतान को भी सार्वजनिक मंच से साझा किया। उन्होंने खुलासा किया कि कानून विभाग की तरफ से विधानसभा स्पीकर को एक सुझाव भेजा गया था, जिसमें यह कहा गया था कि राज्य के दर्जे के इस संवेदनशील मुद्दे पर सदन में चर्चा नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह मामला फिलहाल अदालत (कोर्ट) के विचाराधीन है।
मुख्यमंत्री ने हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर किसके इशारे और निर्देशों के तहत कानून सचिव ने मुख्य सचिव के आदेशों का पालन करते हुए मुख्यमंत्री द्वारा लाए गए आधिकारिक प्रस्ताव का ही विरोध करना शुरू कर दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि राज्य का दर्जा न होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि एक मुख्य सचिव तक खुलेआम अपने ही मुख्यमंत्री के प्रस्ताव और फैसलों के खिलाफ खड़ा नजर आता है। यह प्रशासनिक और वैधानिक व्यवस्था के बीच तालमेल की भारी कमी को दर्शाता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आगे की राह
उमर अब्दुल्ला के इस बयान के सामने आने के बाद से राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष इसे जनता के अधिकारों की जायज लड़ाई बता रहा है, वहीं विपक्षी दल विशेषकर बीजेपी इस बयान के निहितार्थों को लेकर हमलावर मुद्रा में आ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे के बीच अधिकारों को लेकर चल रही यह खींचतान आने वाले दिनों में और अधिक गहरी हो सकती है।
राज्य के लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन के बीच के इस गतिरोध का अंत कब और कैसे होगा। पूर्ण राज्य की मांग को लेकर विधानसभा के भीतर और बाहर जो राजनीतिक सरगर्मी तेज हुई है, उसने एक बार फिर केंद्र-राज्य संबंधों के दायरे और प्रशासनिक शक्तियों के बंटवारे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले सत्रों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ सकता है, जिसका सीधा असर क्षेत्रीय राजनीति और विकास कार्यों पर पड़ना तय माना जा रहा है।









