नई दिल्ली/न्यूज़ीलैंड: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के मौजूदा स्वरूप और इसकी कार्यप्रणाली पर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर तीखे सवाल उठने लगे हैं। 'द फ्रीलान्स' के ग्राउंड इनपुट और हालिया कूटनीतिक हलचल के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से लेकर वैश्विक महाशक्तियों के गलियारों तक, सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की मांग अब और अधिक मुखर हो गई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गढ़ी गई इस वैश्विक संस्था की प्रासंगिकता पर विश्लेषक अब 'दब्बू और कमजोर' होने के तंज़ कस रहे हैं, क्योंकि समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को यह मंच दर्शाने में नाकाम साबित हो रहा है।
IBSA का दो टूक अल्टीमेटम और वैश्विक कूटनीति
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के प्रभावशाली त्रिपक्षीय गठबंधन (IBSA) ने UNSC के ढांचे में तत्काल बदलाव की मांग करते हुए एक कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है। गठबंधन का स्पष्ट मानना है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। IBSA देशों ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र और उभरती आर्थिक ताकत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय के लिए अनिवार्य शर्त है।
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रूस की जोरदार पैरवी और वीटो पावर का पेंच
इस बीच, मास्को से आ रही कूटनीतिक खबरें भारत के पक्ष को बेहद मजबूत करती हैं। रूस ने एक बार फिर UNSC में भारत की स्थायी उम्मीदवारी का खुलकर और जोरदार समर्थन किया है। मॉरीशस समेत कई अन्य विकासशील राष्ट्र भी इस मुहिम में भारत के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, दिलचस्प पहलू यह है कि रूस जहां भारत की स्थायी सदस्यता का मुखर समर्थक है, वहीं जर्मनी और जापान की उम्मीदवारी को लेकर कुछ रणनीतिक हिचकिचाहट भी देखने को मिलती है, जो सुरक्षा परिषद के भीतर शक्ति संतुलन के जटिल समीकरणों को उजागर करती है।
वीटो पावर की वैधता पर गहरी बहस
केवल सीटों का विस्तार ही नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद की सबसे विवादित शक्ति—'वीटो पावर' (Veto Power)—पर भी अकादमिक और रणनीतिक गलियारों में पुनर्विचार शुरू हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक पांच स्थायी सदस्यों के पास मौजूद इस विशेषाधिकार को लोकतांत्रिक नहीं बनाया जाता, तब तक दुनिया के किसी भी बड़े संघर्ष (चाहे वह पश्चिम एशिया का संकट हो या अन्य क्षेत्रीय युद्ध) पर UNSC का प्रभावी नियंत्रण असंभव है। वीटो के इसी केंद्रित स्वरूप ने संस्था को कई मामलों में पंगु बना दिया है।
भविष्य का असर और भारत की रणनीतिक स्थिति
- वैश्विक दक्षिण (Global South) के नेता के रूप में भारत का उभरना।
- पश्चिमी देशों पर सुधारों के लिए बढ़ता कूटनीतिक दबाव।
- संयुक्त राष्ट्र के आगामी सत्रों में वीटो सुधारों पर कड़े संघर्ष के आसार।
हमारी फील्ड जांच बताती है कि आने वाले दिनों में बहुपक्षीय मंचों पर भारत की दावेदारी सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्माण का मुख्य केंद्रबिंदु बनेगी। क्या संयुक्त राष्ट्र खुद को समय के साथ बदल पाएगा या यह संस्था महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी, यह आने वाला वक्त तय करेगा।





