नई दिल्ली और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ढांचे में बदलाव, इसकी प्रासंगिकता और सबसे बढ़कर इसके पांच स्थायी सदस्यों के पास मौजूद 'वीटो पावर' पर अब दुनिया भर में बहस तीखी हो गई है। पिछले कुछ घंटों में गूगल ट्रेंड्स पर भारत के संदर्भ में यह विषय शीर्ष पर बना हुआ है, जिसका कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठ रही वे जोरदार आवाजें हैं जो वैश्विक निकाय में बड़े सुधारों की मांग कर रही हैं।
IBSA का कड़ा अल्टीमेटम और वैश्विक कूटनीति
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के संगठन (IBSA) ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों को लेकर एक कड़ा रुख अपनाया है। हमारी फील्ड इन्वेस्टिगेशन और उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, IBSA ने दो टूक शब्दों में वैश्विक ताकतों को अल्टीमेटम दिया है कि सुरक्षा परिषद का मौजूदा स्वरूप अब पुराना पड़ चुका है। संगठन का साफ कहना है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की अनदेखी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस कूटनीतिक दबाव के बीच भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिए जाने की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है, जिसे पश्चिमी देशों की एकाधिकार वाली नीतियों के खिलाफ एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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रूस का खुला समर्थन और भारत की दावेदारी
इस पूरे भू-राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे बड़ा कूटनीतिक मोड़ रूस के रुख से आया है। मास्को ने बिना किसी लाग-लपेट के UNSC के स्थायी सदस्य के तौर पर भारत की उम्मीदवारी का जोरदार समर्थन किया है। इतना ही नहीं, मॉरीशस जैसे देशों ने भी इस पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की है। हालांकि, विश्लेषकों का यह भी मानना है कि रूस जहां एक तरफ भारत के लिए पुरजोर पैरवी कर रहा है, वहीं वैश्विक समीकरणों के तहत जर्मनी और जापान जैसे देशों की उम्मीदवारी पर उसका रुख कुछ अलग और जटिल बना हुआ है। यह विरोधाभास अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उस छिपे हुए पन्नों को उजागर करता है जहां हर देश अपने भू-राजनीतिक हितों को साधने में जुटा है।
UNSC की 'वीटो पावर' और मौजूदा प्रासंगिकता पर सवाल
संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्रों और बैठकों के दौरान जिस तरह की कार्यशैली सामने आ रही है, उस पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्ट्स में यूएन और इसकी महासभा को 'दब्बू और कमजोर' तक करार दिया गया है। मुख्य समस्या UNSC की 'वीटो पावर' है, जिसका इस्तेमाल चुनिंदा देश अपने भू-राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं। जब तक वीटो पावर के प्रावधानों में लोकतांत्रिक बदलाव नहीं किए जाते, तब तक वैश्विक शांति और सुरक्षा के तमाम दावे कागजी साबित होते रहेंगे।
भारत के लिए आगे की राह और भविष्य का असर
एक वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर के तौर पर यदि जमीनी हकीकत को टटोला जाए, तो भारत के लिए UNSC की स्थायी सदस्यता की राह आसान नहीं है, लेकिन इस बार कूटनीतिक दबाव अभूतपूर्व है। ग्लोबल साउथ के देशों का समर्थन और रूस जैसी महाशक्ति की पैरवी भारत के पक्ष को बेहद मजबूत करती है। यदि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलती है, तो यह न केवल देश की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत की जीत होगी, बल्कि यह संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में एक ऐतिहासिक बदलाव का सूचक भी बनेगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पश्चिमी देश इस बढ़ते कूटनीतिक दबाव पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।





