डिजिटल भुगतान पर नया विवाद और वित्त मंत्री का बड़ा बयान
भारत में डिजिटल भुगतान व्यवस्था यानी यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) आज आम आदमी की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। चाय की टपरी से लेकर बड़े मॉल तक, हर जगह छोटे-बड़े भुगतानों के लिए यूपीआई का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगने या एमडीआर (Merchant Discount Rate) को लेकर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक अक्सर तरह-तरह की चर्चाएं और अफवाहें उड़ती रहती हैं। हाल ही में इस पर मचे घमासान के बीच देश की केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुलकर अपनी बात रखी है और सारे भ्रमों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
वित्त मंत्री ने एक विशेष साक्षात्कार और हालिया बयानों के दौरान स्पष्ट किया है कि यूपीआई भुगतानों पर लगने वाला मर्चेंट डिस्काउंट रेट किसी भी स्थिति में आम उपभोक्ताओं या जनता की जेब से नहीं वसूला जाएगा। उन्होंने विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे उन दाース और दावों को भी सिरे से खारिज कर दिया जिनमें यह कहा जा रहा था कि सरकार आम आदमी के छोटे-छोटे डिजिटल भुगतानों पर भी टैक्स लगाने जा रही है। सीतारमण के इस बयान के बाद देश के करोड़ों डिजिटल उपयोगकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है जो इस बात को लेकर चिंतित थे कि क्या अब ऑनलाइन पेमेंट करने के लिए भी उन्हें अतिरिक्त शुल्क चुकाना होगा।
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आखिर क्या है एमडीआर (MDR) और किसे चुकाना होगा यह शुल्क?
आम जनता के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर यह मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर बला क्या है और यह कैसे काम करता है। इसे बहुत ही सरल भाषा में समझें तो एमडीआर वह शुल्क है जो मर्चेंट यानी व्यापारी अपने पास डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने की एवज में बैंक या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देते हैं। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन आफ इंडिया (NPCI) ने हाल ही में एमडीआर ढांचे से जुड़े कुछ नए नियम और दिशा-निर्देश सामने रखे थे, जिसके बाद से राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई थी।
नए नियमों और वित्त मंत्री के स्पष्टीकरण के अनुसार, यह एमडीआर शुल्क केवल 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर लागू होगा और इसे चुकाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से व्यापारी की होगी। इसका मतलब यह हुआ कि यदि कोई ग्राहक 2,000 रुपये या उससे अधिक का भुगतान किसी दुकान या संस्थान पर डिजिटल माध्यम से करता है, तो ग्राहक को अपनी तरफ से एक भी रुपया एक्स्ट्रा नहीं देना है। व्यापारी को मिलने वाली कुल राशि में से यह सेवा शुल्क काटा जाएगा, जिसे लेकर सरकार ने बार-बार यह साफ किया है कि इससे 96 प्रतिशत से अधिक यूपीआई लेनदेन पूरी तरह अप्रभावित और मुफ्त रहेंगे।
विपक्ष पर फूटा वित्त मंत्री का गुस्सा, कहा- फैलाया जा रहा है सरासर झूठ
इस पूरे मुद्दे पर राजनीति गरमाने के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्षी पार्टियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने विपक्ष पर सीधा आरोप लगाया कि वे जनता के बीच डिजिटल अर्थव्यवस्था को लेकर जानबूझकर भ्रम और दुष्प्रचार फैला रहे हैं। संसद के सत्र के दौरान भी इस मुद्दे पर काफी हंगामा देखने को मिला था, जिसका जवाब देते हुए वित्त मंत्री ने सदन से लेकर बाहर तक यह साफ किया था कि इस विषय पर राजनीति करना पूरी तरह से अनुचित है।
"एमडीआर कोई कर या उपकर नहीं है और न ही यह धन देश के सरकारी कोष में जमा होता है। यह केवल सेवा प्रदाताओं और तकनीकी बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए बैंकों के बीच का एक आंतरिक शुल्क है, जिसका आम जनता की जेब से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। विपक्ष इस पर केवल जनता को डराने की राजनीति कर रहा है।" — निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री
वित्त मंत्री ने आगे कहा कि देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की रफ्तार को बढ़ावा देने के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ऐसे समय में जब भारत पूरी दुनिया में फिनटेक और डिजिटल पेमेंट्स के मामले में एक मिसाल पेश कर रहा है, इस तरह के भ्रामक दावे अर्थव्यवस्था के मनोबल को गिराने का काम करते हैं। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि छोटे दुकानदारों और आम नागरिकों पर किसी भी प्रकार का आर्थिक बोझ न पड़े।
केंद्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों पर स्पष्ट रुख
इस साक्षात्कार के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केवल यूपीआई और अर्थव्यवस्था तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि राज्यों को मिलने वाले फंड और वित्तीय आवंटन के विवादों पर भी खुलकर बात की। आम आदमी पार्टी (AAP) और अन्य विपक्षी दलों द्वारा पंजाब तथा गैर-भाजपा शासित राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा धन आवंटन में भेदभाव करने के लगाए गए तमाम आरोपों को उन्होंने पूरी तरह खारिज कर दिया।
सीतारमण ने दो टूक शब्दों में समझाया कि देश के सभी राज्यों को उनके निर्धारित और तय वित्तीय फॉर्मूले के तहत ही धन जारी किया जाता है। केंद्र सरकार की किसी भी योजना या वित्तीय आवंटन में राज्यों के साथ कोई राजनीतिक भेदभाव नहीं किया जाता है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक प्रावधानों और वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप ही सारा पैसा राज्यों के खातों में पहुंचता है, इसलिए इस प्रकार के बेबुनियाद आरोप लगाना केवल राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा भर है।
डिजिटल इंडिया के बढ़ते कदम और भविष्य की राह
आज भारत का यूपीआई मॉडल पूरी दुनिया में अध्ययन का विषय बन चुका है। सिंगापुर, फ्रांस, यूएई और मॉरीशस जैसे कई देश भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने यहां अपना रहे हैं या इसके साथ अपने भुगतान तंत्र को जोड़ रहे हैं। ऐसे में देश के भीतर यूपीआई को लेकर किसी भी प्रकार का नकारात्मक संदेश जाना आर्थिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। सरकार का यह ताजा स्पष्टीकरण देश के करोड़ों व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब तक छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं को डिजिटल भुगतान करने पर किसी तरह का अतिरिक्त वित्तीय दबाव नहीं महसूस होगा, तब तक देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना और अधिक तेजी से मजबूत होता रहेगा। 2,000 रुपये से कम के छोटे लेनदेनों पर पूरी तरह से जीरो एमडीआर पॉलिसी को बरकरार रखना यह साबित करता है कि सरकार छोटे कारोबारियों और आम जनता के हितों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह संजीदा है। आने वाले दिनों में डिजिटल पेमेंट का यह सफर देश की अर्थव्यवस्था को और अधिक पारदर्शी और सशक्त बनाएगा।







