आर्कटिक महासागर में अमेरिका की सामरिक हलचल तेज
वैश्विक कूटनीति और रक्षा क्षेत्र में एक बार फिर उत्तर ध्रुव यानी आर्कटिक का इलाका चर्चा के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी नौसेना ने अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए एक बेहद उन्नत और मारक युद्धपोत को ठंडे प्रदेशों की ओर रवाना किया है। रक्षा गलियारों में इस तैनाती को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, क्योंकि यह इलाका रूस की समुद्री सीमाओं के बेहद करीब माना जाता है।
प्राप्त जानकारियों के अनुसार, अमेरिकी नौसेना का नया गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर यूएसएस टेड स्टीवंस (डीडीजी-128) अपनी रणनीतिक यात्रा के तहत अलास्का के व्हिटियर पहुंच चुका है। यह युद्धपोत अमेरिकी बेड़े के सबसे आधुनिक आर्ले बर्क-क्लास श्रेणी का हिस्सा है, जिसकी मारक क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियां इसे किसी भी नौसेना के लिए एक अचूक हथियार बनाती हैं।
इस विध्वंसक जहाज की आधिकारिक कमिशनिंग की प्रक्रिया भी इसी क्षेत्र में पूरी की जाएगी। हालांकि वाशिंगटन प्रशासन और नौसेना के अधिकारियों का कहना है कि यह नियमित तैनाती का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिस भू-राजनीतिक परिवेश में यह कदम उठाया गया है, वह रूस और अमेरिका के बीच चल रही रणनीतिक खींचतान को और हवा देने के लिए काफी है।
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अत्याधुनिक एसपीवाई-6 रडार और एजिस कॉम्बैट सिस्टम की ताकत
यूएसएस टेड स्टीवंस की सबसे बड़ी ताकत इसमें लगे हुए अत्याधुनिक सेंसर और युद्ध प्रबंधन प्रणालियां हैं। इस युद्धपोत को हवा, पानी और जमीन पर एक साथ कई खतरों से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें लगा एएन/एसपीवाई-6(वी)1 एयर एंड मिसाइल डिफेंस रडार अपनी श्रेणी का सबसे ताकतवर रडार माना जाता है, जो लंबी दूरी से ही किसी भी मिसाइल या संदिग्ध हवाई गतिविधि को भांप सकता है।
इस शक्तिशाली रडार के साथ एजिस बेसलाइन 10 कॉम्बैट सिस्टम को एकीकृत किया गया है। यह कॉम्बैट सिस्टम युद्धपोत के विभिन्न सेंसर्स से मिलने वाले डेटा को मिलीसेकंड में प्रोसेस करके कमांड सेंटर को उपलब्ध कराता है। इससे चालक दल को यह तय करने में आसानी होती है कि आने वाले खतरे को किस प्रकार निष्प्रभावी करना है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर की तकनीक का आर्कटिक जलक्षेत्र में पहुंचना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में महाशक्तियां ध्रुवीय क्षेत्रों में अपनी तकनीकी श्रेष्ठता साबित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहतीं। आधुनिक युद्ध प्रणाली से लैस यह जहाज दुश्मन के रडार को चकमा देने और सटीक निशाना लगाने में माहिर है।
96 वर्टिकल लॉन्च सेल्स और मिसाइलों का जखीरा
इस युद्धपोत की मारक क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके भीतर भारी मात्रा में हथियार ले जाने की क्षमता है। जहाज में कुल 96 एमके-41 वर्टिकल लॉन्च सेल्स बनाए गए हैं। इन वर्टिकल सेल्स के जरिए क्रूज मिसाइलों से लेकर बैलिस्टिक मिसाइलों तक को आसानी से दागा जा सकता है।
सैन्य विश्लेषकों के मुताबिक, इन लॉन्चर्स में मुख्य रूप से टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें और स्टैंडर्ड मिसाइल सीरीज के हथियार तैनात किए जा सकते हैं, जो लंबी दूरी के लक्ष्यों को भेदने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, भारतीय समयानुसार या अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत किसी भी युद्धपोत पर वर्तमान में कौन से हथियार लोड किए गए हैं, इसकी आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है।
"आर्कटिक क्षेत्र में सामरिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। इस तरह के आधुनिक युद्धपोतों की तैनाती यह दर्शाती है कि महाशक्तियां अपनी समुद्री सीमाओं और नेविगेशन रूट्स को सुरक्षित रखने के लिए किस हद तक जा रही हैं।" — रक्षा मामलों के वरिष्ठ विश्लेषक
बेरिंग स्ट्रेट और रूस के चुकची क्षेत्र के पास रणनीतिक महत्व
भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो अलास्का और रूस के बीच की दूरी बहुत कम है और दोनों के बीच बेरिंग स्ट्रेट स्थित है। इस जलडमरूमध्य के ठीक दूसरी तरफ रूस का चुकची पेनिनसुला और उसका सुदूर पूर्वी हिस्सा (Far East) आता है। रूस के लिए यह क्षेत्र सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से उसके कई प्रमुख नौसैनिक मार्ग गुजरते हैं।
ऐसे संवेदनशील भौगोलिक बिंदु के पास 96 मिसाइलों से लैस अमेरिकी डिस्ट्रॉयर का पहुंचना क्रेमलिन की नजरों से ओझल नहीं हो सकता। हालांकि रक्षा जानकारों का यह भी कहना है कि इस जहाज का परमानेंट होमपोर्ट कमिशनिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्जीनिया का नॉरफोक तय किया गया है, लेकिन उत्तरी जलक्षेत्र में इसकी यह उपस्थिति स्पष्ट संदेश देती है कि अमेरिकी नौसेना उत्तर के ठंडे समुद्रों में अपनी उपस्थिति को अनिवार्य मानती है।
भविष्य के समुद्री युद्धों और आर्कटिक सुरक्षा पर प्रभाव
आर्कटिक पिघलती बर्फ के कारण नए समुद्री व्यापारिक मार्गों और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए दुनिया भर के देशों का अखाड़ा बनता जा रहा है। रूस पहले से ही इस क्षेत्र में अपने सैन्य अड्डों को मजबूत कर रहा है और आधुनिक आइसब्रेकर जहाजों का बेड़ा तैयार कर रहा है। ऐसे में अमेरिका का भी अपनी आधुनिक संपत्तियों को इस दिशा में भेजना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में ध्रुवीय कूटनीति और अधिक आक्रामक हो सकती है।
सामान्य नागरिकों और वैश्विक शांति चाहने वालों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कूटनीति केवल शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रहेगी या फिर दोनों देशों के बीच किसी बड़े सैन्य टकराव का नया मोर्चा खुलेगा। फिलहाल, इस युद्धपोत की मौजूदगी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।








