इराक में दो दशक लंबे सैन्य अध्याय का अंत
मध्य पूर्व के सबसे संवेदनशील देशों में शुमार इराक से अमेरिकी और पश्चिमी सेनाओं की पूरी तरह वापसी ने वैश्विक कूटनीति में हलचल मचा दी है। दो दशक से अधिक समय पहले जिस देश में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए भारी-भरकम सैन्य अभियान शुरू किया था, वहां अब उसका आखिरी सैन्य ठिकाना भी खाली कर दिया गया है। पेंटागन और अंतरराष्ट्रीय रक्षा स्रोतों से मिली जानकारी के मुताबिक, उत्तरी इराक के कुर्द अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र स्थित इरबिल एयर बेस से अमेरिकी सैनिकों और उपकरणों की व्यवस्थित विदाई की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस बड़े घटनाक्रम के साथ ही इराक की धरती पर अमेरिका का प्रत्यक्ष सैन्य साया लगभग समाप्त हो गया है.
यह पूरी सैन्य वापसी उस समय देखने को मिल रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। इस ऐतिहासिक फैसले की रूपरेखा अमेरिका के पिछले प्रशासन के दौरान तैयार की गई थी, जिसे मौजूदा नेतृत्व ने अमलीजामा पहनाया है। जानकारों का कहना है कि इतने लंबे समय तक विदेशी सेनाओं की मौजूदगी ने इराक के आंतरिक और बाहरी सुरक्षा ढांचे को गहराई से प्रभावित किया था। अब जब आखिरी सैनिक भी अपनी बैरकों से विदा हो चुका है, तो इराकी सरजमीं पर सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और सेना के कंधों पर आ गई है, हालांकि इसे लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चिंताएं भी कम नहीं हैं.
इराक में अमेरिकी सैन्य अभियान की कीमत काफी बड़ी चुकानी पड़ी है। आधिकारिक आंकड़ों के गवाह रहे हैं कि इस दो दशक लंबी जंग के दौरान लगभग 4,500 अमेरिकी सैनिकों ने अपनी जान गंवाई. अफगानिस्तान में चले लंबे संघर्ष के बाद इराक का यह ऑपरेशन अमेरिकी इतिहास के सबसे महंगे और मानवीय रूप से नुकसानदेह अभियानों में शुमार रहा है। साल 2003 के आक्रमण से शुरू हुआ यह सिलसिला 2011 में एक बार अस्थायी रूप से थमा जरूर था, लेकिन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के उभार के बाद 2014 में अमेरिकी बलों को दोबारा इराक लौटना पड़ा था.
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इटली और नाटो सहयोगियों ने भी समेटा अपना बोरिया-बिस्तर
अमेरिका के नक्शेकदम पर चलते हुए अन्य पश्चिमी देशों ने भी इराक से अपनी सैन्य टुकड़ियों को पूरी तरह वापस बुला लिया है। हाल ही में यूरोपीय देश इटली ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि उसने इराक में अपनी 12 साल पुरानी सैन्य मौजूदगी का अंत कर दिया है। इतालवी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, मार्च महीने तक देश के अधिकांश सैन्यकर्मी स्वदेश लौट चुके थे और अब अंतिम दस्ते ने भी इलाके को छोड़ दिया है. इतालवी सैनिक मुख्य रूप से नाटो के 'मिशन इराक' और अमेरिका के नेतृत्व वाले 'ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व' का हिस्सा बनकर इराकी बलों को गैर-युद्धक प्रशिक्षण और सुरक्षा सलाह देने का काम कर रहे थे.
स्थानीय और क्षेत्रीय अधिकारियों के साथ लंबी बातचीत और सहमति के बाद ही इन विदेशी बलों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का फैसला किया। नाटो और पश्चिमी देशों का यह सामूहिक निर्णय इस बात का संकेत है कि अब पश्चिमी देश मध्य पूर्व के इस हिस्से में प्रत्यक्ष सैन्य दखल से बचना चाहते हैं। हालांकि, इन देशों के जाने से पैदा होने वाले रणनीतिक खालीपन को भरने को लेकर भू-राजनीतिक विश्लेषक तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं। कई जानकारों का मानना है कि पश्चिमी ताकतों की यह वापसी आने वाले दिनों में क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में एक नया दौर शुरू कर सकती है.
इस पूरी सैन्य वापसी के दौरान भी सुरक्षा हालात तनावपूर्ण बने रहे। ईरान के साथ जारी परोक्ष संघर्ष के बीच हाल के महीनों में भी अमेरिकी और गठबंधन बलों के ठिकानों पर छिटपुट हमले होते रहे थे। जानकारों का यह भी मानना है कि विदेशी सैनिकों की मौजूदगी ने कई बार इराक को अमेरिका और ईरान के बीच प्रॉक्सी वार (परोक्ष युद्ध) का अखाड़ा बना दिया था, जिससे आम इराकी नागरिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में इन सेनाओं की रवानगी से एक तरफ जहां संप्रभुता बहाली की उम्मीद जगी है, वहीं दूसरी तरफ स्थिरता को लेकर अनिश्चितता भी गहरी हो गई है.
ईरान समर्थित गुटों का बढ़ता प्रभाव और रणनीतिक नफा-नुकसान
अमेरिकी सेना की विदाई के बाद मध्य पूर्व के रणनीतिक समीकरणों में ईरान का पलड़ा भारी होता दिखाई दे रहा है। ईरान और उसके समर्थक शिया गुट इस घटनाक्रम को अपनी एक बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक विजय के रूप में देख रहे हैं। मध्य पूर्व मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी सेना की मौजूदगी लंबे समय से क्षेत्र में ईरान के प्रभाव और उसकी विस्तारवादी नीतियों के आड़े आ रही थी। अब उस बड़े अवरोध के हट जाने से तेहरान के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से खुला मैदान मिल गया है, जिसका लाभ उठाने के लिए ईरान समर्थित संगठन अपनी सक्रियता बढ़ा सकते हैं.
ईरान समर्थित प्रमुख प्रतिरोध समूहों और शिया संगठनों के नेताओं ने इस वापसी को विदेशी आधिपत्य के खिलाफ जनता और प्रतिरोध की ऐतिहासिक जीत करार दिया है। उनका दावा है कि इराक की असली सुरक्षा और संप्रभुता बाहरी ताकतों की बंदूकों से नहीं, बल्कि स्थानीय जनता की इच्छाशक्ति से ही संभव हो सकती है। हालांकि, इराक के भीतर मौजूद हर धड़ा इस बदलाव से खुश नहीं है। सुन्नी समुदाय और देश के कई अन्य हिस्सों के स्थानीय नेता इस जल्दबाजी भरी वापसी को लेकर आशंकित हैं। उनका मानना है कि इराकी सुरक्षा बल अभी इतने सक्षम नहीं हुए हैं कि वे बाहरी और आंतरिक खतरों से पूरी तरह अकेले निपट सकें.
"गठबंधन सेना का यह जाना ईरान के लिए रणनीतिक रूप से बेहद फायदेमंद है, क्योंकि यह सेना सालों से इराक में ईरान के बढ़ते असर को सीमित कर रही थी। अब ये गुट अपनी राजनीतिक और सुरक्षा पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेंगे।" — जासिम अल बहादली, सुरक्षा विश्लेषक
भविष्य की चुनौतियां और इराक के सामने खड़े सुरक्षा संकट
विदेशी सेनाओं की इस पूर्ण वापसी के बाद इराक के सामने आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है। देश के विभिन्न हिस्सों में सुन्नी कबीलों और स्थानीय समुदायों के नेताओं का कहना है कि यदि सुरक्षा तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो इस्लामिक स्टेट जैसे कट्टरपंथी संगठन इस खालीपन का फायदा उठाकर दोबारा सिर उठा सकते हैं। अतीत में भी ऐसा देखा जा चुका है कि अमेरिकी सैनिकों की 2011 में हुई वापसी के बाद ही आईएसआईएस ने बेहद खतरनाक तरीके से अपनी जड़ें जमाई थीं, जिसके बाद पश्चिमी देशों को दोबारा हस्तक्षेप करना पड़ा था.
इराक लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक और सैन्य रस्साकशी का केंद्र रहा है। बगदाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पूर्व में हुई बड़ी सैन्य कार्रवाइयों ने यह साबित कर दिया था कि इराकी जमीन का इस्तेमाल किस प्रकार दोनों देशों के बीच टकराव के लिए होता रहा है। इस साल भी ईरान के साथ संघर्ष के दौरान कुछ अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, जो यह बताता है कि यह क्षेत्र कितना विस्फोटक रहा है। अब जबकि अमेरिका ने अपनी प्रत्यक्ष मौजूदगी पूरी तरह समाप्त कर ली है, तो आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इराक अपनी स्वतंत्रता और क्षेत्रीय संतुलन को किस प्रकार बनाए रखता है.
कुल मिलाकर, इराक से अमेरिकी और नाटो सैनिकों की विदाई मध्य पूर्व के इतिहास में एक नए और अनिश्चित अध्याय की शुरुआत है। एक तरफ जहां इराकी हुकूमत इसे अपनी संप्रभुता की बहाली का प्रतीक मान रही है, वहीं दूसरी तरफ आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मंडराते खतरे और क्षेत्रीय ताकतों का बढ़ता दखल इस देश की राह को आसान नहीं होने देगा। दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में इराक का यह खुला मैदान क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देता है या फिर नए संघर्षों को जन्म देता है.








