उत्तराखंड शिक्षा विभाग की बड़ी कार्रवाई, फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी पाने वाले 10 शिक्षक बर्खास्त
देशभर में सरकारी नौकरियों को पाने के लिए फर्जीवाड़े के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, लेकिन उत्तराखंड के प्राथमिक विद्यालयों से एक बेहद चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। राज्य के बागेश्वर जिले में शिक्षा विभाग ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए कूटरचित और फर्जी दस्तावेजों के सहारे शिक्षण कार्य कर रहे दस शिक्षकों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी हैं। इन शिक्षकों के कारनामों का खुलासा तब हुआ जब उनके शैक्षिक प्रमाणपत्रों का रामनगर बोर्ड से सत्यापन कराया गया। जांच रिपोर्ट में उनके दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए, जिसके बाद विभाग ने बिना कोई देर किए उनके खिलाफ सख्त कदम उठाया।
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद से ही शिक्षा विभाग के भीतर और बाहर हड़कंप मच गया है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जब इन शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही थी, तब उनके दस्तावेजों की जांच इतनी सतही क्यों थी कि फर्जी कागजात पकड़े नहीं जा सके। इस तरह के मामलों ने सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यापन तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा विभाग अब यह पता लगाने में जुट गया है कि आखिर नियुक्ति के समय इन शिक्षकों के प्रमाण पत्रों की गहनता से जांच क्यों नहीं की गई और इसके पीछे किन-किन लोगों की लापरवाही या मिलीभगत रही है।
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जनवरी में हुई थी ज्वाइनिंग, आठ महीने तक सरकारी खजाने से उठाते रहे वेतन
विभाग से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इन सभी दस शिक्षकों की नियुक्ति इसी साल यानी जनवरी महीने में प्राथमिक विद्यालयों में हुई थी। नौकरी मिलते ही इन्होंने अपने-अपने स्कूलों में कार्यभार संभाल लिया और बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। हैरान करने वाली बात यह है कि पिछले आठ महीनों से ये सभी फर्जी शिक्षक लगातार अपनी सेवाएं दे रहे थे और हर महीने नियमित रूप से सरकार से वेतन भी प्राप्त कर रहे थे। आठ महीने तक बिना किसी कानूनी बाधा के सरकारी खजाने से वेतन उठाने के बाद जब रामनगर बोर्ड की रिपोर्ट सामने आई, तब जाकर इस बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ।
बागेश्वर के प्रभारी डीईओ बेसिक आशाराम ने पूरे मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि विभागीय स्तर पर चलाए जा रहे सत्यापन अभियान के दौरान इन शिक्षकों के दस्तावेजों पर संदेह हुआ था। इसके बाद जब दस्तावेजों को रामनगर बोर्ड के पास अधिकारिक सत्यापन के लिए भेजा गया, तो सच्चाई सामने आ गई। बोर्ड की रिपोर्ट में साफ हो गया कि इन सभी दस शिक्षकों द्वारा जमा किए गए शैक्षणिक प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी और कूटरचित हैं। रिपोर्ट मिलते ही उच्च अधिकारियों के निर्देश पर तत्काल प्रभाव से इनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया गया।
इन दस शिक्षकों पर गिरी गाज, सूदूर ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में थे तैनात
शिक्षा विभाग द्वारा बर्खास्त किए गए इन दस शिक्षकों की तैनाती बागेश्वर जिले के विभिन्न पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक विद्यालयों में थी। जिन शिक्षकों की सेवाएं समाप्त की गई हैं, उनमें कमला देवी (राप्रावि ससोला, कांडा), चंद्र प्रकाश (राप्रावि रीमा क्वीटी कपकोट), रजनी (राप्रावि उछात बागेश्वर), लक्ष्मी आर्य (राप्रावि स्यालढूंगा कपकोट), रोहित कुमार (राप्रावि चनौस चनूसी कपकोट), नेहा (राप्रावि नरगोली कांडा), संजय कुमार (राप्रावि ठेली कपकोट), अरविंद कुमार (राप्रावि जलमानी कपकोट), पंकज कुमार (राप्रावि सुदिल बागेश्वर), और प्रियंका (राप्रावि उडियारी जगथाना कपकोट) शामिल हैं।
इन सभी शिक्षकों के बर्खास्त होने से ग्रामीण इलाकों के उन स्कूलों में अचानक से शिक्षकों का संकट गहरा गया है, जहां ये तैनात थे। पर्वतीय क्षेत्रों के कई स्कूल पहले से ही संसाधनों और शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में अचानक दस शिक्षकों के हटने से वहां पढ़ने वाले मासूम बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका बन गई है। स्थानीय अभिभावकों और ग्रामीणों ने भी इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि बच्चों के भविष्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सिर्फ बर्खास्तगी काफी नहीं है, बल्कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज होने चाहिए ताकि भविष्य में कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा दुस्साहस न कर सके।
सैकड़ों अन्य शिक्षकों के प्रमाण पत्र भी रडार पर, उत्तराखंड में व्यापक जांच शुरू
यह मामला केवल बागेश्वर तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के अन्य जिलों से भी फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी पाने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कुंवर सिंह रावत के निर्देश पर एक व्यापक स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों का कहना है कि उनके रडार पर इस समय सैकड़ों ऐसे शिक्षक हैं, जिनके शैक्षणिक और अन्य जरूरी प्रमाणपत्र संदेह के घेरे में हैं। विशेष तौर पर पर्वतीय और दूर-दराज के इलाकों में सेवारत जिला कैडर के शिक्षकों की फाइलों को दोबारा खंगाला जा रहा है।
प्राथमिक शिक्षा विभाग की इस विशेष जांच में केवल सामान्य शैक्षणिक डिग्रियां ही नहीं, बल्कि शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET के प्रमाण पत्र और स्थाई निवास प्रमाण पत्रों की भी गहनता से जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि इस बड़े रैकेट के पीछे कोई संगठित गिरोह काम कर रहा हो सकता है, जो नौकरी के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार करके भोले-भाले युवाओं को बेचता है या सिस्टम की आंखों में धूल झोंकता है। आने वाले दिनों में इस जांच का दायरा और अधिक व्यापक होने की उम्मीद है, जिसके बाद कई और बड़े खुलासे होने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
अभिभावकों की बढ़ी चिंता, वैकल्पिक व्यवस्था की मांग
लंबे समय तक स्कूलों में पढ़ाने के बाद जब अचानक इन शिक्षकों के फर्जी होने का सच सामने आया, तो अभिभावक वर्ग में रोष और हैरानी दोनों है। उनका कहना है कि जिन लोगों ने फर्जी कागजों के दम पर नौकरी हासिल की, उन्होंने न सिर्फ एक योग्य और बेरोजगार युवा का हक छीना, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ किया है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की कमी एक बड़ा नासूर बनी हुई है और अब इस तरह की छंटनी से शिक्षा व्यवस्था लड़खड़ाने लगी है।
"फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। रामनगर बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर बागेश्वर में दस शिक्षकों की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई हैं। राज्य स्तर पर अन्य संदिग्ध शिक्षकों के दस्तावेजों की भी बारीकी से जांच चल रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त विधिक कार्रवाई की जाएगी।" — शिक्षा विभाग, उत्तराखंड सरकार
अब स्थानीय लोगों और अभिभावकों की निगाहें इस बात पर टिकी हुई हैं कि शिक्षा विभाग इन बर्खास्त शिक्षकों के स्थान पर ग्रामीण स्कूलों में कब तक वैकल्पिक और योग्य शिक्षकों की तैनाती करता है। सरकार और प्रशासन के सामने अब यह सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती है कि पर्वतीय अंचलों के स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो और भविष्य में होने वाली हर एक भर्ती में दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया इतनी मजबूत हो कि कोई भी फर्जीवाड़ा करने वाला व्यक्ति सिस्टम में सेंध न लगा सके।








