सिनेमा जगत में मानवीय संवेदनाओं की एक अनूठी मिसाल
मनोरंजन इंडस्ट्री की चकाचौंध से दूर जब कोई सितारा असल जिंदगी में किसी की बिखरती हुई दुनिया को संभालता है, तो वह वाकया इतिहास बन जाता है। बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनका दिल सिर्फ फिल्मी पर्दे पर ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी कितना बड़ा है। उनके जीवन से जुड़ा एक ऐसा ही मार्मिक और प्रेरणादायक वाकया सामने आया है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दी हैं। जब एक नन्ही सी बच्ची ने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी जंग जीतकर अपने फॉस्टर फादर यानी गोद लेने वाले पिता को ऐसा नायाब तोहफा दिया, तो पूरा माहौल भावनाओं से भर गया।
यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, लेकिन इसकी सच्चाई और इसमें छिपा संघर्ष हर किसी को अंदर तक झकझोर देने के लिए काफी है। आज के समय में जहां लोग अपनी सफलताओं और सुख-सुविधाओं में व्यस्त रहते हैं, वहीं विवेक ओबेरॉय ने उन बच्चों के जीवन में रोशनी लाने का बीड़ा उठाया, जिनके पास अंधेरे के अलावा कुछ नहीं था। इस विशेष मौके पर जब पुरानी यादें ताजा हुईं और भविष्य की उड़ान का जिक्र आया, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें खुशी और गर्व से छलक उठीं।
संबंधित खबरें
अस्पताल के बेड से शुरू हुई थी अदम्य साहस की यह कहानी
इस दिल को छू लेने वाले सफर की शुरुआत करीब दो दशक पहले हुई थी, जब सेहरा नाम की यह बच्ची महज ढाई साल की थी। उस नन्ही उम्र में उसके चेहरे की रौनक गायब हो चुकी थी, आंखें लाल थीं और शरीर कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रहा था। उस दौर में मुंबई स्थित कैंसर पेशेंट्स एंड एसोसिएशन (CPA) एनजीओ के जरिए विवेक ओबेरॉय की मुलाकात इस मासूम से हुई थी। आर्थिक तंगी और इलाज के भारी खर्च के आगे बेबस परिवार की मदद के लिए जब अभिनेता आगे आए, तो उन्होंने न सिर्फ इलाज का जिम्मा उठाया, बल्कि उस बच्ची को अपने दिल के करीब भी बसा लिया।
कीमोथेरेपी के दर्दनाक दौर, सुइयों की चुभन और अस्पताल के सफेद कमरों के बीच उस छोटी सी बच्ची ने हार नहीं मानी। विवेक ओबेरॉय अक्सर उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे वह बच्ची उनकी उंगली पकड़कर दर्द से लड़ती थी। अभिनेता का वह अटूट विश्वास आखिरकार रंग लाया और आज वह बच्ची न केवल कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी को पूरी तरह हरा चुकी है, बल्कि दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर खड़ी है।
कैंसर को हराने के बाद अब आसमान की ऊंचाइयों पर कब्जा
बीमारी के अंधकार को पीछे छोड़कर सेहरा ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर एक नई उड़ान भरी है। कैंसर मुक्त होने के बाद उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया और एविएशन के क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाई। कड़ी ट्रेनिंग और अथक परिश्रम के बाद आज वह एक कॉमर्शियल पायलट बनने की दहलीज पर खड़ी हैं। आसमान की बुलंदियों को छूने के लिए तैयार सेहरा का यह सफर उन सभी लोगों के लिए एक बड़ा सबक है जो छोटी-छोटी मुश्किलों के आगे घुटने टेक देते हैं।
उनकी यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि उन तमाम डॉक्टरों, सहायकों और विशेषकर उनके फॉस्टर फादर के भरोसे की जीत है जिन्होंने हर कदम पर उनका साथ दिया। सेहरा का यह सफर साबित करता है कि अगर इंसान के भीतर जीने की इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो मौत को भी मात दी जा सकती है। पायलट की वर्दी में आसमान मापने जा रही इस बेटी ने यह साबित कर दिखाया है कि हौसले के आगे बड़ी से बड़ी बाधाएं भी बौनी साबित हो जाती हैं।
पिता के 50वें जन्मदिन पर दिया जिंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफा
हाल ही में जब विवेक ओबेरॉय अपना 50वां जन्मदिन मना रहे थे, तब सेहरा ने उन्हें एक ऐसा सरप्राइज दिया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। इस खास मौके पर सेहरा ने खुलासा किया कि वह जल्द ही एक आगामी नेपाली फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने जा रही हैं। उन्होंने कहा कि वह इस मुकाम तक पहुंचने के बाद अपने पिता का आशीर्वाद लेना चाहती थीं क्योंकि उनके जीवन का हर एक पल उन्हीं की प्रेरणा से गढ़ा गया है। इस घोषणा ने अभिनेता को इतना भावुक कर दिया कि वह खुद को रोक नहीं पाए और बेटी को गले से लगा लिया।
"यह मेरे लिए गर्व का सबसे बड़ा पल है। मैंने इसे ढाई साल की उम्र में कीमोथेरेपी से जूझते देखा है। आज वह एक विनर है और अपनी जिंदगी को अपने दम पर जी रही है, इससे बड़ा सुख एक पिता के लिए कुछ नहीं हो सकता।" — विवेक ओबेरॉय, अभिनेता
पचास और बच्चों को गोद लेकर बढ़ाया नेकी का दायरा
अपनी गोद ली हुई बेटी की इस कामयाबी से अभिभूत होकर विवेक ओबेरॉय ने समाज के नाम एक और बड़ा संदेश दिया। अपने जन्मदिन के जश्न को सिर्फ तकल्लुफ तक सीमित रखने के बजाय, उन्होंने कैंसर से जूझ रहे 50 और मासूम बच्चों को गोद लेने का संकल्प लिया। इन सभी बच्चों के इलाज और देखभाल का पूरा खर्च अभिनेता खुद उठाएंगे। उनका यह कदम इस बात का प्रमाण है कि इंसान जब समाज को कुछ वापस देने की ठान लेता है, तो वह कई जिंदगियों को नया जीवनदान दे सकता है।
सेहरा ने अपने पिता के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए यह भी संकेत दिया कि वह भविष्य में समाज सेवा के कार्यों में पूरी तरह सक्रिय रहेंगी। उनका मानना है कि उन्होंने अपने पिता से जो सीखा है, उसे आगे बढ़ाना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। आज जब लोग मनोरंजन जगत को केवल ग्लैमर और चमक-दमक के चश्मे से देखते हैं, ऐसे में विवेक ओबेरॉय और सेहरा की यह कहानी इंसानियत, प्यार और अटूट विश्वास की एक ऐसी इबारत लिखती है जो लंबे समय तक लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।





