पश्चिम बंगाल सरकार के कड़े कानून को झटका
देश के सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों में शुमार पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था को लेकर लाए गए एक बड़े प्रस्ताव को बड़ा झटका लगा है। राज्य की प्रशासनिक मशीनरी द्वारा तैयार किए गए एंटी गुंडा विधेयक को लेकर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति भवन के स्तर से आपत्ति दर्ज कराई गई है। इस स्थिति के चलते फिलहाल इस प्रस्तावित कानून का रास्ता रुक गया है और इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया गया है। राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को एक बड़े प्रशासनिक अवरोध के रूप में देखा जा रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य प्रशासन असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने के लिए नए और कड़े उपाय ढूंढ रहा था। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के प्रस्तावों पर कानूनी और संवैधानिक बारीकियों का गहराई से अध्ययन करना बेहद जरूरी होता है, ताकि केंद्र और राज्य के कानूनों के बीच किसी भी तरह का क्षेत्राधिकार विवाद पैदा न हो। अब गेंद एक बार फिर राज्य सरकार और विधानसभा के पाले में आ गई है, जिसे इस पर नए सिरे से विचार करना होगा।
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क्या है केंद्र की आपत्ति और अनुच्छेद 254 का पेंच
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी वजह संविधान के अनुच्छेद 254 से जुड़ी है। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि यदि राज्य का कोई कानून किसी ऐसे विषय पर समानांतर या अलग व्यवस्था खड़ा करता है जिस पर पहले से ही केंद्रीय कानून प्रभावी है, तो कानूनी पेच खड़ा होना लाजिमी है। विशेष तौर पर, नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों यानी एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के मामलों को इस नए कानून के तहत 'गुंडा' की परिभाषा में शामिल करने पर सवाल उठाए गए हैं।
केंद्र का तर्क है कि इस तरह के प्रावधानों से एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था बन सकती है जो केंद्रीय कानून के साथ सीधे तौर पर टकरा सकती है। इसी विधिक जटिलता के चलते राष्ट्रपति के स्तर पर इस विधेयक को मंजूरी देने से इनकार कर दिया गया और इसे आवश्यक संशोधनों के साथ वापस लौटा दिया गया है। कानूनी जानकारों का यह भी कहना है कि इस प्रकार के टकराव से बचने के लिए संघीय ढांचे में केंद्रीय कानूनों की सर्वोच्चता का ध्यान रखना अनिवार्य होता है।
असामाजिक गतिविधियों पर रोक के लिए लाया गया था विधेयक
जून महीने में राज्य विधानसभा के पटल पर 'वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल' पेश किया गया था। इस विधेयक को लाने का मुख्य उद्देश्य राज्य के भीतर संगठित अपराधों, अवैध गतिविधियों और असामाजिक तत्वों पर प्रभावी ढंग से लगाम कसना था। प्रस्तावित कानून में इस बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया था कि किसे असामाजिक गतिविधि माना जाएगा और किस श्रेणी के व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित किया जाएगा।
इसके साथ ही इस विधेयक में निवारक हिरासत (Preventive Detention) के कड़े प्रावधान भी रखे गए थे, जिसके तहत संदिग्ध व्यक्तियों को बिना मुकदमे के एक निश्चित समय तक हिरासत में रखने या किसी विशेष क्षेत्र में जाने से रोकने की बात कही गई थी। प्रशासन का तर्क था कि इन कढ़ाइयों के जरिए आम नागरिकों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा, हालांकि इन प्रावधानों को लेकर शुरुआत से ही विपक्षी दलों और कानूनी हलकों में चर्चाएं और चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं।
जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को मिलने वाले थे व्यापक अधिकार
इस प्रस्तावित कानून की सबसे बड़ी चर्चा उन असाधारण शक्तियों को लेकर थी जो जिलाधिकारियों, पुलिस आयुक्तों और राज्य सरकार द्वारा अधिकृत डीआईजी स्तर के अधिकारियों को मिलने वाली थीं। यदि किसी अधिकारी को यह आशंका होती कि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार की असामाजिक गतिविधि में शामिल हो सकता है, तो उसे संबंधित व्यक्ति को एक साल तक के लिए किसी खास इलाके या जिले से बाहर रहने का निर्देश देने का अधिकार दिया गया था।
नियमों के तहत ऐसे संदिग्धों को अपनी गतिविधियों की नियमित रिपोर्टिंग करने का आदेश भी दिया जा सकता था। हालांकि, विरोधियों का कहना था कि इस तरह की असीमित शक्तियां प्रशासनिक मनमानी का कारण बन सकती हैं। इसके जवाब में शासन की ओर से यह भरोसा दिलाया गया था कि कानून का कभी भी राजनीतिक बदले की भावना के साथ दुरुपयोग नहीं किया जाएगा और इसका इस्तेमाल केवल जनहित में ही होगा।
कलकत्ता हाईकोर्ट की टिप्पणियां और आगे की कानूनी राह
इस विधेयक के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में कुछ जनहित याचिकाएं भी दायर की गई थीं। अदालत ने सुनवाई के दौरान इन याचिकाओं को समय से पूर्व यानी प्री-मेच्योर करार देते हुए खारिज कर दिया था। अदालत का स्पष्ट मत था कि जब तक कोई विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति पाकर पूरी तरह से कानून नहीं बन जाता, तब तक उसकी वैधता को चुनौती देना कानूनी रूप से उचित नहीं है। अदालत ने यह भी साफ किया था कि कानून बनने के बाद प्रभावित पक्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र होंगे।
"राज्य प्रशासन इस पूरे मामले में कानूनी सलाह ले रहा है। यदि आवश्यक हुआ तो विधानसभा सत्र के दौरान इन प्रावधानों में उपयुक्त संशोधन किए जाएंगे और बिल को दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।"— वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, पश्चिम बंगाल सरकार
अब जबकि राष्ट्रपति भवन से यह प्रस्ताव वापस लौट चुका है, राज्य सरकार के पास दो ही विकल्प बचते हैं। पहला यह कि वह उन खास प्रावधानों को हटा दे या संशोधित कर ले जिन पर केंद्र को आपत्ति है, और दूसरा यह कि नए सिरे से विधिक राय बनाकर इसे आगे बढ़ाए। इस पूरी प्रक्रिया में निश्चित रूप से समय लगेगा, जिससे इस कड़े कानून के धरातल पर उतरने में खासी देरी होना तय माना जा रहा है।



