पश्चिम बंगाल में उपचुनाव का सियासी रण: किस सीट पर टिकी हैं सबकी निगाहें
भारतीय राजनीति के लिहाज से पश्चिम बंगाल का चुनावी परिदृश्य हमेशा से ही बेहद संवेदनशील और रोमांचक रहा है। राज्य की दो अहम विधानसभा सीटों नंदीग्राम और रेजीनगर पर होने जा रहे उपचुनाव ने एक बार फिर सियासी गलियारों की सरगर्मी बढ़ा दी है। चुनाव आयोग के तय कार्यक्रम के अनुसार, इन दोनों सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर को मतदान संपन्न होगा, जबकि मतों की गिनती 9 अक्टूबर को की जाएगी। भले ही इन उपचुनावों के परिणामों से राज्य की मौजूदा सरकार के स्थायित्व पर कोई सीधा प्रभाव न पड़े, लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद जमीन पर बदलते राजनीतिक समीकरणों और विभिन्न दलों की पकड़ को मापने का यह एक अहम पैमाना जरूर माना जा रहा है।
विशेष तौर पर प्रशासनिक और राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें नंदीग्राम और रेजीनगर के चुनावी अखाड़े पर टिकी हुई हैं। सत्ता पक्ष से लेकर तमाम विपक्षी दल इन सीटों पर अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। रैलियों, जनसंपर्क अभियानों और जुबानी जंग से राज्य का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमाया हुआ है। हर एक राजनीतिक दल इन उपचुनावों के जरिए यह साबित करने की कोशिश में है कि जमीनी स्तर पर जनता का समर्थन किसके साथ है।
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नंदीग्राम का हाई-वोल्टेज मुकाबला: सुवेंदु अधिकारी के गढ़ में कांटे की टक्कर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम सीट का अपना एक ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व है। यह वही धरती है जहां से वर्ष 2007 में ऐतिहासिक भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसने राज्य में तीन दशकों से अधिक समय से चले आ रहे वामपंथी शासन के पतन की इबारत लिखी थी। वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह सीट मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का पारंपरिक और अत्यंत सुरक्षित गढ़ मानी जाती है। उन्होंने पिछले चुनावों में एक कड़े मुकाबले में ममता बनर्जी को इसी सीट से शिकस्त दी थी।
इस बार नंदीग्राम के उपचुनाव में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। कांग्रेस पार्टी ने मिलन प्रधान को अपना उम्मीदवार बनाया है, जिन्हें कुछ ही दिन पहले कलकत्ता हाईकोर्ट से जमानत मिली है। जेल से बाहर आने के तुरंत बाद ही उन्होंने ताबड़तोड़ प्रचार शुरू कर दिया है। खास बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के स्थानीय गुट का अघोषित समर्थन भी कांग्रेस उम्मीदवार को मिलता नजर आ रहा है, क्योंकि टीएमसी ने अपनी मूल उम्मीदवार संचिता प्रधान डे का नाम वापस ले लिया था। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए नंदीग्राम में जोरदार प्रचार अभियान चलाया है और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।
रेजीनगर विधानसभा सीट: हुमायूं कबीर और बाबरी मस्जिद के साये में सियासी बिसात
नंदीग्राम के साथ-साथ रेजीनगर विधानसभा सीट का उपचुनाव भी खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम बहुल इस इलाके में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से अलग और अनूठे हैं। आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के नेता हुमायूं कबीर द्वारा हाल ही में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति (रेप्लिका) बनवाने के ऐलान ने इस चुनाव के एजेंडे को पूरी तरह से बदल दिया है। इस सीट पर इस बार हुमायूं कबीर के सुपुत्र गुलाम नबी आजाद चुनावी मैदान में उतरे हैं, जिससे मुकाबले में नया मोड़ आ गया है।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि रेजीनगर में मुकाबला किसी एकतरफा दिशा में नहीं बल्कि बेहद रोमांचक मोड़ पर खड़ा है। राजनीतिक दलों ने इस सीट पर अपनी रणनीतियों में बड़ा बदलाव किया है। खुद भाजपा के शीर्ष नेताओं ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जाकर सीधे संवाद स्थापित करने की कोशिश की है और यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उनकी प्राथमिकता विकास और क्षेत्र की स्थिति में सुधार लाना है। हुमायूं कबीर की रणनीति और उनके द्वारा सोशल मीडिया आधारित प्रचार पर दिए जा रहे जोर के बीच, अन्य विपक्षी दल भी अपनी पूरी ताकत से मैदान में डटे हुए हैं।
प्रचार का अंतिम दौर और दलों की रणनीति: आखिरी दम तक जुगत
चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में दोनों ही निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की रैलियों और रोड शो का तांता लगा रहा। सुबह से लेकर देर रात तक उम्मीदवार घर-घर जाकर वोटरों से संपर्क साधने में जुटे रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस उपचुनाव के नतीजे आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
"पश्चिम बंगाल के इन उपचुनावों में जनता का रुख स्पष्ट रूप से यह बताएगा कि जमीनी स्तर पर चुनावी हवा किस तरफ बह रही है। सभी दल अपनी पूरी ऊर्जा के साथ मैदान में हैं और परिणाम ही असल तस्वीर साफ करेंगे।" — राजनीतिक विश्लेषक
सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच चुनाव आयोग निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान संपन्न कराने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। स्थानीय प्रशासन ने भी संवेदनशील बूथों पर अतिरिक्त बल तैनात किए हैं ताकि मतदाता बिना किसी भय के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें। अब सभी की निगाहें 6 अक्टूबर के मतदान और 9 अक्टूबर को आने वाले चुनावी नतीजों पर टिकी हैं।




