कैंसर के पीछे तंबाकू और शराब के अलावा छिपा है एक और बड़ा खतरा
जब भी कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का जिक्र होता है, तो सबसे पहले लोगों के दिमाग में तंबाकू का सेवन, शराब, सिगरेट, वायु प्रदूषण या फिर अस्वास्थ्यकर जीवनशैली की तस्वीरें उभरती हैं। ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि खराब खानपान और बुरी आदतें ही इस जानलेवा मर्ज की असली जड़ हैं। लेकिन, विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक बेहद अहम और ताजा रिपोर्ट ने इस पारंपरिक धारणा को चुनौती दी है। मेडिकल जगत की प्रतिष्ठित रिपोर्ट्स और डब्ल्यूएचओ की 'इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर' (WHO-IARC) की हालिया स्टडी के अनुसार, कैंसर जैसी भयानक बीमारी के पीछे कई बार छोटे-छोटे और अनदेखे संक्रमण भी जिम्मेदार होते हैं।
इस नई रिसर्च के आंकड़े वाकई हैरान करने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2024 के दौरान सामने आए कुल लगभग 15.62 लाख नए कैंसर मामलों में से करीब 1.9 लाख मामले सीधे तौर पर विभिन्न प्रकार के संक्रमणों से जुड़े हुए थे। इसका मतलब यह हुआ कि देश में कैंसर का हर आठवां मामला किसी न किसी वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन के कारण पनपा है। वैश्विक स्तर पर भी लगभग 23 लाख नए कैंसर मामले संक्रमणों के कारण सामने आए हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
संबंधित खबरें
सिर्फ संक्रमण होने का मतलब यह नहीं कि हो जाएगा कैंसर
आम लोगों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या शरीर में कोई भी इन्फेक्शन होते ही इंसान कैंसर की चपेट में आ जाता है? इस भ्रांति को दूर करते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट्स ने साफ किया है कि स्टडी के इन आंकड़ों का यह कतई मतलब नहीं है कि किसी को संक्रमण हुआ और तुरंत उसे कैंसर हो गया। यहाँ 'संक्रमण से जुड़े' होने का वैज्ञानिक अर्थ उन मामलों से है, जिनमें कुछ चुनिंदा वायरस, बैक्टीरिया या परजीवियों की भूमिका लंबे समय तक शरीर में बीमारी को बढ़ावा देने में पाई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ खास तरह के वायरस और बैक्टीरिया हमारे शरीर के भीतर चुपचाप लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। ये सूक्ष्म जीव शरीर के अंदर निरंतर सूजन, कोशिकाओं की बनावट में असामान्य बदलाव और ऊतकों को नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं। जब यह प्रक्रिया सालो-साल चलती है, तो कुछ मामलों में यही अंदरूनी बदलाव और डैमेज कैंसर का रूप ले लेते हैं। यानी संक्रमण का असर मरीज के इम्यून सिस्टम और इन्फेक्शन की अवधि पर निर्भर करता है, न कि हर संक्रमित व्यक्ति को यह बीमारी होगी।
भारत में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) बना सबसे बड़ा सिरदर्द
डब्ल्यूएचओ-आईएआरसी की इस व्यापक स्टडी के अनुसार, भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर के मामलों में ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी सबसे खतरनाक और प्रमुख वजह बनकर सामने आया है। अकेले एचपीवी संक्रमण से जुड़े एक लाख से अधिक मामले देश में दर्ज किए गए। इस वायरस का सबसे गहरा और खतरनाक संबंध महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर यानी बच्चेदानी के मुंह के कैंसर से माना जाता है। इसके अलावा, यह वायरस गले और मुंह के कुछ खास हिस्सों के कैंसर की वजह भी बनता है।
राहत की बात यह है कि मेडिकल साइंस ने इस खतरे से निपटने के रास्ते तैयार कर रखे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते एचपीवी का टीका लगवाने और नियमित तौर पर स्क्रीनिंग यानी मेडिकल जांच करवाने से सर्वाइकल कैंसर के खतरे को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। सरकार और स्वास्थ्य संगठनों द्वारा इस दिशा में लगातार जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं, ताकि कम उम्र में ही युवतियों का टीकाकरण सुनिश्चित किया जा सके।
पेट के कैंसर के लिए जिम्मेदार है H. pylori बैक्टीरिया
एचपीवी के बाद जिस दूसरे सबसे बड़े संक्रमण ने शोधकर्ताओं का ध्यान खींचा है, वह हेलिकोबैक्टर पाइलोरी (H. pylori) नाम का एक सूक्ष्म बैक्टीरिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इस बैक्टीरिया से जुड़े लगभग 47 हजार कैंसर के मामले पाए गए हैं। यह बैक्टीरिया आमतौर पर इंसानी पेट की अंदरूनी परत में लंबे समय तक चुपचाप निवास करता है और पेट दर्द, एसिडिटी या अल्सर जैसी समस्याओं को जन्म देता है।
यदि पेट की इस समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए और इसका सही इलाज न कराया जाए, तो यह पेट की अंदरूनी कोशिकाओं में स्थायी बदलाव ला सकता है, जो आगे चलकर गैस्ट्रिक या पेट के कैंसर का रूप ले सकता है। डॉक्टरों की सलाह है कि यदि किसी को लंबे समय से पेट से जुड़ी परेशानियां बनी हुई हैं, तो सामान्य समझकर टालने के बजाय तुरंत किसी अच्छे गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से अपनी जांच करवानी चाहिए।
लिवर कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं हेपेटाइटिस बी और सी वायरस
लिवर हमारे शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। लेकिन, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी जैसे वायरस सीधे तौर पर इसी अंग को निशाना बनाते हैं। इन दोनों वायरसों की वजह से होने वाला पुराना और लंबा संक्रमण लिवर में लगातार सूजन और गंभीर क्षति का कारण बनता है।
स्टडी के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में करीब 10 हजार मामले हेपेटाइटिस बी और लगभग 5,300 मामले हेपेटाइटिस सी से जुड़े पाए गए। जब लिवर लंबे समय तक डैमेज होता रहता है, तो सिरोसिस के रास्ते यह स्थिति लिवर कैंसर में बदल जाती है। इसके अलावा, एपस्टीन-बार वायरस (EBV) भी भारत में करीब 22 हजार कैंसर मामलों से जुड़ा हुआ पाया गया है। शोधकर्ताओं ने कुल 12 ऐसे संक्रामक एजेंटों की पहचान की है जिन्हें कैंसर पैदा करने वाला कार्सिनोजेन माना गया है।
"कैंसर के खिलाफ हमारी लड़ाई केवल अस्पताल के कमरों और कीमोथेरेपी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अगर हम समय पर टीकाकरण, सही खानपान और इन छिपे हुए संक्रमणों की समय पर पहचान व इलाज कर लें, तो देश में कैंसर के एक बड़े हिस्से को आसानी से रोका जा सकता है।"— डॉ. मीनू वालिया, चेयरमैन, मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग, मैक्स हॉस्पिटल
रोकथाम ही सबसे बड़ा हथियार: टीकाकरण और जांच पर जोर
डब्ल्यूएचओ की इस विस्तृत रिपोर्ट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कैंसर जैसी जटिल बीमारी से जंग जीतने के लिए शुरुआती स्तर पर सतर्कता बरतना कितना जरूरी है। जब बीमारी शरीर में पूरी तरह जड़ जमा लेती है, तब उसका इलाज बेहद खर्चीला और मानसिक रूप से कष्टदायक हो जाता है। ऐसे में समझदारी इसी में है कि बीमारी के लक्षण प्रकट होने से पहले ही उसकी रोकथाम के पुख्ता इंतजाम किए जाएं।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि देश में टीकाकरण कार्यक्रमों को और अधिक मजबूती दी जानी चाहिए। एचपीवी और हेपेटाइटिस बी जैसी गंभीर बीमारियों के टीके बच्चों और युवाओं को समय पर दिए जाने चाहिए। साथ ही, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नियमित हेल्थ चेकअप और कैंसर स्क्रीनिंग के प्रति जागरूकता फैलानी होगी। यदि हम इन संक्रामक एजेंटों के खिलाफ सही समय पर सही कदम उठा लें, तो भारत में हर साल लाखों लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है।








