विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई वैश्विक रिपोर्ट में जीवन प्रत्याशा के आंकड़े
दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं, खान-पान और जीवन शैली में आए बदलावों के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यापक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में वर्ष 2000 से लेकर 2023 तक के स्वास्थ्य संबंधी रुझानों, मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा का विस्तृत लेखा-जोखा पेश किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर औसत जीवन प्रत्याशा में सुधार देखने को मिला है और यह फिर से महामारी से पहले के स्तर के करीब पहुंच गई है। वैश्विक औसत जीवन प्रत्याशा वर्ष 2023 में 73.3 वर्ष तक दर्ज की गई है, जो 2019 के 73.4 वर्ष के आंकड़े के बेहद करीब है।
इस वैश्विक अध्ययन में विभिन्न देशों की तुलना में भारत की स्थिति पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है। भारत के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि यहां के नागरिकों का औसत जीवन काल कुछ पड़ोसी देशों के मुकाबले बेहतर हुआ है, लेकिन अभी भी कई मोर्चों पर सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल लंबी उम्र होना ही काफी नहीं है, बल्कि उस उम्र को स्वस्थ और रोगमुक्त तरीके से जीना एक बड़ी चुनौती है।
डब्ल्यूएचओ के डेटा, एनालिटिक्स और एआई विभाग के निदेशक डॉ. एलेन लैब्रिक ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि अधिक उम्र तक जीना सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अब असल चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जीवन के वे अतिरिक्त वर्ष अच्छे स्वास्थ्य में व्यतीत हों। स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को जनसंख्या की बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को ढालना होगा ताकि बुजुर्गों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें।
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पाकिस्तान से आगे निकला भारत, लेकिन बांग्लादेश ने छोड़ा पीछे
डब्ल्यूएचओ की इस ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय नागरिकों का औसत जीवन काल पाकिस्तान के लोगों की तुलना में अधिक है। वर्ष 2023 के दौरान भारत में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 71 वर्ष दर्ज की गई है। इसके मुकाबले पाकिस्तान में यह आंकड़ा 68.2 वर्ष ही रिकॉर्ड किया गया है। इस प्रकार भारतीय नागरिक पाकिस्तानियों की तुलना में औसतन अधिक वर्षों तक जीवित रहते हैं।
हालांकि, यदि तुलना अन्य पड़ोसी देशों से की जाए तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। भारत की तुलना में बांग्लादेश के नागरिकों की औसत जीवन प्रत्याशा अधिक है। रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में यह आंकड़ा 72.7 वर्ष दर्ज किया गया है, जो भारत के 71 वर्ष के आंकड़े से ज्यादा है। इसके अलावा पश्चिमी देशों की बात करें तो अमेरिका में यह 78.5 वर्ष और कनाडा में 81.4 वर्ष दर्ज की गई है, जो विकासशील देशों की तुलना में काफी आगे है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जीवन प्रत्याशा में इस अंतर के पीछे खान-पान, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाएं, और स्वास्थ्य सेवाओं तक आम जनता की पहुंच जैसे कई महत्वपूर्ण कारक जिम्मेदार हैं। भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही स्वास्थ्य पहलों के बावजूद जमीनी स्तर पर अभी और अधिक सुधार करने की आवश्यकता है।
लंबी उम्र बनाम स्वस्थ जीवन: क्या कहती है हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि लंबी उम्र का मतलब हमेशा बेहतर और स्वस्थ जीवन नहीं होता है। भारत में वर्ष 2023 के दौरान हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी स्वस्थ जीवन प्रत्याशा केवल 60.6 वर्ष दर्ज की गई है। दिलचस्प बात यह है कि साल 2019 में यह आंकड़ा 60.5 वर्ष था, जिसका अर्थ है कि पिछले कुछ वर्षों में इसमें केवल मामूली सा ही सुधार देखने को मिला है।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय नागरिक अपनी कुल उम्र के अंतिम कुछ वर्ष किसी न किसी बीमारी, शारीरिक कमजोरी या विकलांगता के साथ बिताने को मजबूर होते हैं। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता प्रदूषण, तनाव और खान-पान में अशुद्धियां इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। जब तक देश में निवारक स्वास्थ्य सेवाओं (Preventive Healthcare) और पोषण स्तर में बड़ा सुधार नहीं होता, तब तक स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के आंकड़े में तेजी से बढ़ोतरी की उम्मीद करना मुश्किल है।
चिकित्सा जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को अपनी दिनचर्या में योग, व्यायाम और संतुलित आहार को शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य जांच शिविरों और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करना बेहद जरूरी हो गया है ताकि बीमारियों की समय रहते पहचान की जा सके।
मौतों के कारणों में बड़ा बदलाव: संक्रामक रोगों से गैर-संचारी बीमारियों की ओर
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में मानव मृत्यु के कारणों में आए दीर्घकालिक और बड़े बदलावों की ओर भी इशारा किया गया है। एक समय था जब भारत और दुनिया भर में अधिकांश मौतें संक्रामक रोगों (Communicable Diseases) जैसे कि मलेरिया, टीबी और अन्य संक्रमणों के कारण होती थीं। लेकिन अब मौतों के मुख्य कारण तेजी से बदलकर गैर-संचारी रोगों (Non-Communicable Diseases - NCDs) की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर वर्ष 2023 में होने वाली कुल मौतों में से 74 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण हुईं, जबकि वर्ष 2000 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत हुआ करता था। इसी अवधि में डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी से होने वाली मौतें तीन गुना तक बढ़ गई हैं। इसके अलावा चिंता विकार (Anxiety Disorders) और अवसाद से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं भी महामारी के बाद से तेजी से बढ़ी हैं, जो आधुनिक समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में सबसे बड़ा हिस्सा हृदय संबंधी बीमारियों (जैसे इस्कीमिक हृदय रोग और स्ट्रोक) और श्वसन तंत्र से जुड़े रोगों का है। भारत में भी दिल की बीमारियां, डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं महामारी का रूप लेती जा रही हैं, जो सीधे तौर पर लोगों की जीवन प्रत्याशा और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही हैं।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की चुनौतियां
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी स्वास्थ्य नीतियों में एक बड़ा बदलाव लाने की जरूरत है। केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि बीमारियों की रोकथाम और शुरुआती स्तर पर उनकी पहचान पर जोर देना होगा। बढ़ती आबादी और बदलती जीवनशैली के बीच देश की स्वास्थ्य प्रणाली के सामने बुजुर्गों की बढ़ती संख्या को संभालना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।
"अधिक उम्र तक जीना सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है, लेकिन हमारी अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जीवन के ये अतिरिक्त वर्ष अच्छे स्वास्थ्य में व्यतीत हों।" — डॉ. एलेन लैब्रिक, निदेशक (डेटा, एनालिटिक्स और एआई विभाग, WHO)
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि हालांकि भारत ने औसत जीवन प्रत्याशा के मामले में पड़ोसी पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया है, लेकिन बांग्लादेश जैसे देशों से आगे निकलने और अपने नागरिकों को एक स्वस्थ व दीर्घायु जीवन देने के लिए अभी नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य सेक्टर को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। संतुलित विकास और हर नागरिक तक बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच ही देश के भविष्य को स्वस्थ बना सकती है।








