नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में आज विश्व कपास दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन कपास किसानों की कड़ी मेहनत और देश के बड़े वस्त्र उद्योग को आपस में जोड़ता है। खेत में उगने वाले सफेद सोने यानी कपास से लेकर करघे तक पहुँचने वाले कपड़े तक की यात्रा बहुत लंबी होती है। इस यात्रा में देश के करोड़ों किसानों और बुनकरों की मेहनत शामिल है। द फ्रीलान्स की टीम ने इस मौके पर जमीन पर जाकर किसानों की स्थिति और सरकार की योजनाओं का जायजा लिया है।
कपास उगाने वाले किसानों के लिए खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने किसानों को राहत दी है। बाजार में खादों की कीमतें बढ़ने के बावजूद किसानों को बहुत सस्ती दरों पर यूरिया उपलब्ध कराया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश के किसानों को यह भरोसा दिलाया है कि उनकी सरकार खेती की लागत कम करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। इससे देश के कपास और अन्य किसानों को अपनी फसल उगाने में बड़ी आर्थिक मदद मिल रही है।
किसान सम्मान निधि से खातों में सीधे पहुँच रही मदद
खेती किसानी को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार लगातार बड़े कदम उठा रही है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की अगली यानी 22वीं किस्त जारी करने वाले हैं। इस योजना के तहत देश के करीब नौ करोड़ बानवे लाख किसानों के बैंक खातों में सीधी रकम भेजी जाएगी। कपास की खेती करने वाले छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह पैसा बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने में बहुत काम आता है।
देश के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी अपने राष्ट्र के नाम संदेश में देश की एकता, विकास और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि जब तक देश का किसान और मजदूर मजबूत नहीं होगा, तब तक वास्तविक विकास संभव नहीं है। कपास के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वैज्ञानिक शोध और नई तकनीकों का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ाया जा रहा है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के मौके पर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हुए नए आविष्कारों ने खेती को और आसान बना दिया है।
खेतों से लेकर आधुनिक मिलों तक बदल रही तस्वीर
पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर अब कपास के किसान आधुनिक तकनीकों को अपना रहे हैं। कीटों से फसल बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है जिससे पैदावार में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। कपास से धागा बनाने और फिर उससे कपड़ा तैयार करने वाली मिलों में भी नई मशीनों का उपयोग हो रहा है। इससे हमारे देश में ही उच्च गुणवत्ता का कपड़ा तैयार हो रहा है और विदेश से कपड़ा मंगाने की जरूरत कम हो रही है।
गाँवों से लेकर शहरों तक फैले इस उद्योग में रोजगार के अनगिनत अवसर पैदा हो रहे हैं। हथकरघा और पावर लूम से जुड़े कामगारों को सरकार की तरफ से आधुनिक उपकरण और वित्तीय सहायता दी जा रही है। इससे पारंपरिक बुनकरों की आर्थिक स्थिति सुधर रही है और वे अपने पुश्तैनी काम को गर्व के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। कपास किसानों और बुनकरों के बीच तालमेल बिठाने से देश का वस्त्र निर्यात भी लगातार बढ़ रहा है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूत कदम
कपास की खेती और उससे जुड़े उद्योगों का विकास सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था को ताकत देता है। सरकार की योजनाओं का जमीनी स्तर पर सही क्रियान्वयन होने से बिचौलियों की भूमिका खत्म हो रही है। किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिल रहा है और वे कर्ज के जाल से बाहर निकल रहे हैं। द फ्रीलान्स की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि यदि समय पर खाद, बीज और सरकारी सहायता मिलती रहे, तो देश का किसान दुनिया के किसी भी देश के किसान से मुकाबला कर सकता है।
आने वाले दिनों में कपास के उत्पादन को और बढ़ाने के लिए सरकार नए कृषि क्लस्टर बना रही है। किसानों को मौसम की सटीक जानकारी और बाजार के भाव समय पर मिल रहे हैं। खेत से लेकर करघे तक की यह पूरी श्रृंखला अब आत्मनिर्भर भारत के सपने को हकीकत में बदल रही है। आने वाला समय देश के कपास किसानों और वस्त्र उद्योग के लिए और अधिक सुनहरा साबित होने की पूरी उम्मीद है।






