सड़क पर दौड़ती मौत का अजीबोगरीब ताना-बाना
देश की सड़कों पर चलने वाले यात्री वाहनों की सुरक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के जेवर क्षेत्र के पास यमुना एक्सप्रेसवे पर एक चलती हुई बस में अचानक भीषण आग लग गई। इस हृदयविदारक हादसे में नौ मासूम लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। जब इस दुर्घटना की तह तक जाने के लिए पुलिस और प्रशासनिक जांच शुरू हुई, तो एक ऐसा चौंकाने वाला सच सामने आया जिसने प्रशासनिक महकमों में भी हड़कंप मचा दिया। हादसे का शिकार हुई उस बस का सफर किसी एक राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका तकनीकी और प्रशासनिक ताना-बाना देश के छह अलग-अलग राज्यों से जुड़ा हुआ पाया गया।
इस वाहन के दस्तावेजों और कार्यप्रणाली की पड़ताल करने पर पता चला कि गाड़ी का रजिस्ट्रेशन देश के एक कोने में हुआ था, उसका मालिक किसी दूसरे राज्य में रहता था, फिटनेस का प्रमाण पत्र कहीं और से जारी हुआ था और प्रदूषण नियंत्रण का सर्टिफिकेट भी किसी अन्य राज्य की मुहर के साथ था। इस बहु-राज्यीय प्रशासनिक भूल-भुलैया ने इस बात को साबित कर दिया कि किस तरह अंतर-राज्यीय परिवहन नियमों की आड़ में सुरक्षा मानकों की अनदेखी खुलेआम की जा रही थी। आम जनता रोज इन वाहनों में अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर है, लेकिन कागजी खानापूरी करने वाले महकमे चैन की नींद सो रहे हैं।
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एक ही वाहन के छह राज्यों से जुड़े अजीब तार
इस पूरे मामले की सबसे हैरान करने वाली परत यह है कि दुर्घटनाग्रस्त बस का अधिकार और संचालन कई अलग-अलग भौगोलिक सीमाओं में बंटा हुआ था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस बस का मालिक मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का रहने वाला है। वाहन का संचालन भी मध्य प्रदेश से जुड़ी एक ट्रैवल्स एजेंसी के माध्यम से होना बताया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी विसंगति के बावजूद परिवहन विभाग ने इस पर कभी गंभीर रुख नहीं अपनाया।
मध्य प्रदेश में मालिकाना हक और संचालन होने के बावजूद, इस बस का आधिकारिक रजिस्ट्रेशन बिहार राज्य के एक परिवहन कार्यालय में कराया गया था। बात यहीं खत्म नहीं होती, वाहन को सड़क पर उतारने के लिए जरूरी फिटनेस प्रमाण पत्र राजस्थान के परिवहन प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया था, जबकि इसका प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र हरियाणा से बनवाया गया था। इसके अलावा यह गाड़ी उत्तर प्रदेश के महोबा से नई दिल्ली के कश्मीरी गेट के बीच नियमित रूप से फर्राटा भरती थी और अंततः उत्तर प्रदेश की सीमा में ही हादसे का शिकार हो गई। साफ है कि यह बस छह अलग-अलग राज्यों के प्रशासनिक दायरे को पार कर रही थी, लेकिन किसी भी राज्य का परिवहन महकमा इसकी तकनीकी हकीकत को भांप नहीं सका।
19 चालान और डेढ़ लाख का जुर्माना, फिर भी सड़क पर फर्राटा
यह दुर्घटना महज एक तकनीकी विफलता का नतीजा नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता दस्तावेज है। जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि इस बस पर पहले से ही भारी भरकम नियमों के उल्लंघन के मामले दर्ज थे। सड़क पर बेखौफ दौड़ रही इस गाड़ी पर कुल 19 चालान पेंडिंग थे, जिनकी कुल राशि करीब 1.75 लाख रुपये बैठती है। इन चालानों में कम उम्र के और अनुभवहीन चालक से वाहन चलवाने जैसे गंभीर अपराध भी शामिल थे।
इसके साथ ही बस में फ्यूल बदलने और रेट्रोफिटिंग से जुड़े नियमों की धज्जियां उड़ाने के भी स्पष्ट प्रमाण मिले थे। वाहन के परमिट की शर्तों का उल्लंघन करना इस गाड़ी के लिए आम बात बन गई थी। सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यह है कि जब परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस की ऑनलाइन प्रणालियों में इस बस पर बार-बार जुर्माने लग रहे थे, तो इसे प्रतिबंधित क्यों नहीं किया गया? क्या महकमों की जिम्मेदारी सिर्फ चालान की रस्मी पर्चियां काट देना भर रह गई है? यदि समय रहते इस वाहन के संचालन पर रोक लगा दी जाती, तो आज नौ लोगों कीमती जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।
यात्रियों की चीख-पुकार और चालक की आपराधिक लापरवाही
इस भयानक रात बस के अंदर का मंजर बेहद खौफनाक था। जब गाड़ी यमुना एक्सप्रेसवे पर अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी, तभी यात्रियों को ड्राइवर केबिन की तरफ से जलने की दुर्गंध महसूस हुई। सतर्क यात्रियों ने तुरंत अपनी सीट से उठकर चालक और परिचालक को इस अजीब सी बदबू के बारे में आगाह किया और गाड़ी को साइड में लगाने का अनुरोध किया। लेकिन आरोप है कि बस के स्टाफ ने यात्रियों की इस जायज चिंता को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
"जब हमने ड्राइवर को केबिन से आ रही जलने की गंध और धुएं के बारे में बताया, तो उसने हमारी बात को अनसुना कर दिया। उसने कहा कि इस गाड़ी में ऐसी बदबू हमेशा आती रहती है और किसी ने बस रोकने की बात पर हमें धमकाना भी शुरू कर दिया। अगर उसने वक्त रहते गाड़ी रोक दी होती, तो आज कई घर उजड़ने से बच जाते।" — सुनील कुमार, बस यात्री एवं शिकायतकर्ता
यात्रियों की मानें तो चालक अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने वाहन को रोकने से साफ इनकार कर दिया। कुछ ही पलों के भीतर वह छोटी सी बदबू भीषण आग की विकराल लपटों में बदल गई। रात के वक्त जब ज्यादातर यात्री गहरी नींद में थे, अचानक धुएं और आग के गुबार ने पूरी बस को अपनी चपेट में ले लिया। अफरा-तफरी के इस माहौल में कुछ लोग तो जैसे-तैसे बाहर निकलने में कामयाब हो गए, लेकिन आग की भयंकर गर्मी और जहरीले धुएं के कारण कई लोग अंदर ही फंस कर रह गए।
जिम्मेदारों पर शिकंजा और कड़े कानूनी कदम
हादसे के बाद प्रारंभिक पड़ताल में यह बात सामने आई है कि बस के एसी में शॉर्ट सर्किट या स्पार्क होने के कारण आग ने इंजन के लुब्रिकेंट ऑयल को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे आग पलभर में अनियंत्रित हो गई। हादसे के तुरंत बाद अपनी जान बचाकर भागने वाले बस चालक पवन और कंडक्टर योगेश को पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए हिरासत में ले लिया है। उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि आखिर किस परिस्थिति में उन्होंने यात्रियों की चेतावनी को नजरअंदाज किया।
इस घटना ने देश भर के ट्रांसपोर्ट सिस्टम और फिटनेस जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब सिर्फ चालक और परिचालक पर कार्रवाई करने से बात नहीं बनने वाली है, बल्कि उस बस के मालिक और उन तमाम क्षेत्रीय परिवहन अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए जिनके संरक्षण में नियमों को ताक पर रखकर यह गाड़ी सड़कों पर मौत का तांडव मचा रही थी। जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर ऐसे लापरवाह वाहन मालिकों पर नकेल कसने के लिए सरकार और परिवहन विभाग कब सख्त और स्थाई कानून बनाएंगे।




