सफर का आराम बना जान का जोखिम
देशभर के हाई-स्पीड एक्सप्रेस-वे और नेशनल हाईवे पर इन दिनों एक अजीब सा डर मंडरा रहा है। दूर-दराज के सफर को आसान और आरामदायक बनाने के दावे के साथ सड़कों पर दौड़ाई जाने वाली एसी स्लीपर बसें अब यात्रियों के लिए किसी चलते-फिरते ताबूत जैसी बनती जा रही हैं। पिछले कुछ सालों में इन चमचमाती बसों के साथ हुए गंभीर हादसों ने इस उद्योग की कलई खोलकर रख दी है। लखनऊ से लेकर दिल्ली और मेरठ से लेकर आगरा तक, आए दिन सामने आने वाली दुर्घटनाओं की तस्वीरें दिल दहला देने वाली होती हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर जिस सफर को लोग सुरक्षित और आरामदायक मानकर चुनते हैं, वह पल भर में मातम में क्यों बदल जाता है?
रात के सन्नाटे में जब आम जनजीवन सो रहा होता है, तब ये स्लीपर बसें अपनी पूरी रफ्तार से फर्राटा भर रही होती हैं। लेकिन इन आधुनिक और मंहगी बसों के भीतर सफर कर रहे यात्रियों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही होती है। हादसों के बाद प्रशासन जागता है, जांच कमेटियां बैठती हैं और कुछ दिनों की कागजी कार्रवाई के बाद सब कुछ फिर से पहले जैसा सामान्य हो जाता है। नतीजतन, अगली कोई बड़ी घटना फिर से अनगिनत परिवारों को जिंदगी भर का दर्द दे जाती है। आखिर इन लग्जरी बसों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जाते और क्यों इनकी फिटनेस पर कड़ाई से अमल नहीं होता, यह आज हर आम नागरिक के मन में उठने वाला सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
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हादसों की फेहरिस्त: जब पल भर में उजड़ गईं कई जिंदगियां
यदि पिछले कुछ समय के आंकड़ों और सड़क दुर्घटनाओं पर नजर डाली जाए, तो स्थिति बेहद भयावह नजर आती है। उत्तर प्रदेश और आसपास के एक्सप्रेस-वे पर स्लीपर बसों के अनियंत्रित होने या आगे चल रहे भारी वाहनों से टकराने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। हाल ही में हरदोई के पास गंगा एक्सप्रेस-वे पर एक बड़ा हादसा हुआ, जहां दिल्ली जा रही स्लीपर बस अचानक रेलिंग तोड़कर करीब बीस फीट नीचे जा गिरी। इस भयानक दुर्घटना में दर्जनों यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए और चीख-पुकार मच गई। ठीक इसी तरह आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां तेज रफ्तार बसें आगे चल रहे ट्रकों में पीछे से जा घुसीं, जिससे कई मासूम लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
इन सड़क हादसों का पैटर्न लगभग एक जैसा ही रहता है। ज्यादातर दुर्घटनाएं या तो आधी रात के बाद होती हैं या फिर तड़के सुबह के वक्त, जब ड्राइवरों को झपकी आने की संभावना सबसे अधिक होती है। मेरठ हाईवे पर चलती बस में अचानक आग लगने की घटना ने भी सुरक्षा व्यवस्था पर एक और बड़ा सवालिया निशान लगाया था। गनीमत यह रही कि उस मामले में ड्राइवर की सतर्कता से समय रहते लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, वरना एक बड़ा नरसंहार हो सकता था। लेकिन हर बार ड्राइवर की सूझबूझ पर ही भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि तकनीकी खामियां और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले बस संचालक भी इसके लिए उतने ही जिम्मेदार हैं।
स्लीपर बसों के खौफनाक सफर के पीछे छिपी पांच बड़ी वजहें
आखिरकार क्या कारण है कि स्लीपर बसों में होने वाले हादसे इतने घातक और भयानक होते हैं? इस सवाल की तह तक जाने पर कई चौंकाने वाले पहलू सामने आते हैं। पहली और सबसे बड़ी वजह ड्राइवरों की लंबी ड्यूटी और लगातार गाड़ी चलाना है। मुनाफा कमाने की होड़ में बस मालिक एक ही ड्राइवर को सैकड़ों किलोमीटर का सफर लगातार बिना पर्याप्त आराम के पूरा करने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे थकान के कारण उन्हें झपकी आ जाती है। दूसरी बड़ी वजह इन बसों की अत्यधिक रफ्तार है। समय बचाने और तय शेड्यूल पूरा करने के चक्कर में ड्राइवर कोहरे या रात के अंधेरे में भी बस को हवा से बातें कराते हैं, जिस पर पुलिस या परिवहन विभाग की कोई खास लगाम नहीं होती।
तीसरी मुख्य वजह बस बॉडी डिजाइन और सुरक्षा मानकों से जुड़ा गंभीर समझौता है। बाजार में उतरने वाली कई स्लीपर बसों में लोकल स्तर पर बॉडी तैयार कराई जाती है, जो क्रैश टेस्ट के मानकों पर खरी नहीं उतरती। हल्की टक्कर लगते ही ऐसी बसें या तो बुरी तरह पिचक जाती हैं या फिर उनमें तुरंत आग लग जाती है। चौथी वजह इनमें आपातकालीन निकास (Emergency Exit) की खराब या नाममात्र की स्थिति होना है। आग लगने या पलटने की स्थिति में यात्रियों के बाहर निकलने के रास्ते बंद हो जाते हैं। पांचवीं और अंतिम वजह ओवरलोडिंग और सामान रखने के अवैध तरीकों की है, जो बस के संतुलन को बिगाड़ देती है।
नींद के आगोश में मौत: क्यों जानलेवा साबित हो रहा है नाइट ट्रैवल
रात के समय सफर करना वैसे ही जोखिम भरा माना जाता है, लेकिन स्लीपर बसों में यह जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जब यात्री अपनी बर्थ पर लेटकर गहरी नींद में होते हैं, तब उन्हें आने वाले खतरे का कोई अंदाजा नहीं होता। बस के भीतर सीटों की बनावट कुछ इस तरह की होती है कि यदि झटका तेज लगे, तो यात्री सीधे फर्श पर या एक-दूसरे के ऊपर जा गिरते हैं। इसके अलावा, कई बसों में अग्निशामक यंत्र (Fire Extinguisher) या तो होते ही नहीं हैं और अगर होते हैं, तो वे एक्सपायर्ड या खराब स्थिति में पाए जाते हैं। ऐसे में अचानक आग लगने जैसी आपात स्थिति में यात्रियों के पास बचने का कोई विकल्प नहीं बचता।
"सड़कों पर दौड़ने वाली स्लीपर बसों में यात्रियों की जान की कीमत से खिलवाड़ अब और बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। जब तक परिवहन विभाग फिटनेस सर्टिफिकेट और स्पीड गवर्नर जैसे नियमों को लेकर सख्ती नहीं बरतेगा, तब तक मासूम लोगों की यूं ही जान जाती रहेगी। इसके लिए कड़े कानूनी प्रावधान और नियमित चेकिंग बेहद जरूरी है।" — सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ, वरिष्ठ परिवहन विश्लेषक
नियमों की कागजी खानापूर्ति और जमीनी हकीकत
देश के परिवहन नियमों में कागजों पर तो सुरक्षा के कड़े प्रावधान दर्ज हैं, लेकिन जमीन पर उनका पालन कराने में प्रशासनिक अमला अक्सर नाकाम साबित होता है। टोल प्लाजा पर वाहनों की एंट्री और एग्जिट के दौरान ओवरस्पीडिंग पर चालान काटने की व्यवस्था होने के बावजूद, बस ऑपरेटर मिलीभगत से इन सब से बच निकलते हैं। बिना वैध फिटनेस, ओवरलोडिंग और बिना परमिट के चलने वाली बसें बेखौफ सड़कों पर दौड़ती रहती हैं। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता, तब तक संबंधित विभागों की नींद नहीं खुलती। हादसों के बाद कुछ दिनों तक चेकिंग अभियान का ढोंग रचा जाता है और फिर से वही पुरानी लापरवाह व्यवस्था पटरी पर लौट आती है।
निष्कर्ष: अब कड़े कदमों की दरकार
अगर हमें इन हादसों पर लगाम लगानी है और आम जनता के जीवन की रक्षा करनी है, तो केवल मुआवजा देने या शोक संवेदना व्यक्त करने से काम नहीं चलेगा। सरकार और परिवहन मंत्रालयों को स्लीपर बसों के संचालन के लिए एक बिल्कुल नया और सख्त ढांचा तैयार करना होगा। ड्राइवरों के काम के घंटे तय करने होंगे, बसों में स्पीड गवर्नर की अनिवार्यता और उसकी मॉनिटरिंग जीपीएस के जरिए सुनिश्चित करनी होगी। इसके अलावा, अवैध रूप से बॉडी मॉडिफाई करने वाले निर्माताओं पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सड़क पर दौड़ने वाले ये मौत के ताबूत हमेशा के लिए बंद हो सकें और यात्री सुरक्षित अपने घर पहुंच सकें।





