युवाओं में तेजी से पैर पसार रही गंभीर बीमारी
भारत के युवाओं के बीच स्वास्थ्य से जुड़ी एक ऐसी खामोश चुनौती सिर उठा रही है, जो आने वाले समय में एक बड़े जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है। कभी इस बीमारी को केवल अधिक उम्र के लोगों या अत्यधिक शराब का सेवन करने वालों से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज के दौर में देश के युवा मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टिएटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) यानी फैटी लिवर की चपेट में धड़ल्ले से आ रहे हैं। यह स्थिति न सिर्फ उनके पाचन तंत्र को प्रभावित कर रही है, बल्कि उनके पूरे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और कार्यप्रणाली को भी गंभीर रूप से कमजोर कर रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अनियंत्रित दिनचर्या और खानपान की बुरी आदतें इस स्थिति की सबसे बड़ी वजह हैं। युवावस्था में प्रवेश करते ही लोग अपने शरीर की अनदेखी करना शुरू कर देते हैं, जिसका खामियाजा उनके महत्वपूर्ण अंगों को भुगतना पड़ता है। लिवर हमारे शरीर का एक ऐसा अंग है जो शरीर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है, लेकिन जब इसमें लगातार चर्बी जमा होने लगती है, तो इसकी कार्यक्षमता पर भारी असर पड़ता है। देश की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित हुए वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी 2026 में भी इस गंभीर विषय पर देश-विदेश के चिकित्सा विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है।
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25 साल की उम्र में ग्रेड-2 फैटी लिवर मिलना बना आम
चिकित्सा जगत के लिए यह सबसे डराने वाली बात है कि अब बहुत कम उम्र के लोग इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं। कुछ साल पहले तक जिस बीमारी के लक्षण 45 या 50 साल की उम्र के बाद दिखाई देते थे, वह अब 25 से 26 साल के नौजवानों में आसानी से मिल रही है। डॉक्टरों का कहना है कि रूटीन चेकअप के दौरान युवाओं में ग्रेड-2 फैटी लिवर का पाया जाना अब किसी भी डॉक्टर को हैरान नहीं करता, क्योंकि यह एक सामान्य बात बन चुकी है। इस उम्र में लिवर का ऐसा हाल होना इस बात का प्रमाण है कि हमारी जीवनशैली में कुछ तो बहुत बुनियादी और खतरनाक स्तर पर गलत हो रहा है।
जब लिवर कोशिकाओं के भीतर अतिरिक्त वसा या चर्बी जमा होने लगती है, तो लिवर में सूजन पैदा होने लगती है। इस सूजन को समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो यह फाइब्रोसिस में बदल जाती है। फाइब्रोसिस का मतलब है लिवर के ऊतकों का सख्त होना और उनमें घाव बनना। एक बार लिवर में फाइब्रोसिस की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो लिवर के स्वस्थ ऊतक धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं और अंग को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचता है, जिसे मेडिकल भाषा में सिरोसिस कहा जाता है।
"आज के दौर में 25-26 साल की उम्र के युवाओं में ग्रेड-2 फैटी लिवर मिलना बेहद आम हो गया है। लिवर में जमा होने वाली चर्बी आगे चलकर फाइब्रोसिस और फिर सिरोसिस का रूप ले लेती है, जिसे शुरुआती दौर में ही रोकना बेहद जरूरी है। खानपान और निष्क्रिय दिनचर्या इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।" — डॉ. अनूप कुमार सिंह, गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट
खानपान की गलत आदतें और निष्क्रिय जीवनशैली बनी मुख्य वजह
इस बीमारी के इतनी तेजी से फैलने के पीछे सबसे बड़ा हाथ हमारे खानपान और आदतों का है। आज की युवा पीढ़ी पारंपरिक और पौष्टिक घर के खाने से दूर होकर फास्ट फूड, जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स और अत्यधिक चीनी वाले उत्पादों पर निर्भर हो चुकी है। इन खाद्य पदार्थों में ट्रांस फैट और कैलोरी की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिसे शरीर का मेटाबॉलिज्म पूरी तरह पचा नहीं पाता। अतिरिक्त ऊर्जा शरीर में चर्बी के रूप में जमा होने लगती है, और इसका सबसे पहला निशाना हमारा लिवर बनता है।
इसके अलावा, घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने की आदत यानी सिडेंटरी लाइफस्टाइल ने इस समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है। शारीरिक श्रम या व्यायाम के लिए समय न निकालना, रात-रात भर जागना, अनियमित नींद और तनाव का स्तर बढ़ना लिवर के स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। जब शरीर में शारीरिक गतिविधि कम होती है, तो फैट बर्न होने की प्रक्रिया रुक जाती है और वह लिवर के चारों ओर और उसके अंदर इकठ्ठा होने लगता है।
लिवर सिरोसिस तक का सफर: एक खामोश और घातक खतरा
फैटी लिवर को अक्सर 'साइलेंट किलर' कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती चरणों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति को सामान्य थकान या कमजोरी महसूस होती है, जिसे वह काम का तनाव मानकर नजरअंदाज कर देता है। जब तक बीमारी गंभीर रूप नहीं ले लेती, तब तक मरीज को पता ही नहीं चलता कि उसका लिवर अंदर ही अंदर कितना नुकसान झेल चुका है। जब स्थिति बिगड़कर लिवर सिरोसिस में बदल जाती है, तो पेट में पानी भरना, पीलिया होना, उल्टी में खून आना और अत्यधिक कमजोरी जैसे गंभीर लक्षण सामने आते हैं।
सिरोसिस की स्थिति में लिवर का बड़ा हिस्सा अपनी कार्यक्षमता खो देता है, और कई मामलों में लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार यह चेतावनी दे रहे हैं कि इस बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही पहचान कर इसे रोका जाना चाहिए। यदि समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है और युवावस्था में ही जीवन पर बड़ा संकट खड़ा कर सकती है।
बचाव के उपाय: वजन नियंत्रण और एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाना है जरूरी
अच्छी खबर यह है कि शुरुआती चरणों में फैटी लिवर को पूरी तरह से ठीक या रिवर्स किया जा सकता है। इसके लिए किसी महंगी दवा की नहीं, बल्कि अनुशासन और जीवनशैली में बड़े बदलाव की जरूरत होती है। सबसे पहले अपने वजन को नियंत्रित रखना जरूरी है। यदि शरीर का वजन संतुलित रहेगा, तो लिवर पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव खुद-ब-खुद कम हो जाएगा। इसके लिए रोजाना कम से कम 30 से 45 मिनट तक एक्सरसाइज, योग या ब्रिस्क वॉक को अपनी दिन का हिस्सा बनाना चाहिए।
खानपान में हरी सब्जियां, ताजे फल, साबुत अनाज और पर्याप्त मात्रा में पानी को शामिल करना चाहिए। तली-भुनी चीजों, मैदे से बनी चीजों, पैकेज्ड फूड और कोल्ड ड्रिंक्स से पूरी तरह दूरी बनानी होगी। समय-समय पर अपने स्वास्थ्य की जांच करवाना और डॉक्टर की सलाह लेना इस खतरे से बचने का सबसे अचूक उपाय है। युवाओं को यह समझना होगा कि उनका शरीर ही उनका असली पूंजी है, और इसकी अनदेखी भविष्य में भारी पड़ सकती है।








