नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली की सियासत में इन दिनों चुनाव आयोग (Election Commission) के कामकाज और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की शक्तियों को लेकर पारा सातवें आसमान पर है। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, एक तरफ जहां जंतर-मंतर से लेकर संसद परिसर तक विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों के 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन ने एसआईआर (SIR) और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह दबाव मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने तक पहुंचेगा, और क्या वाकई सीईसी की शक्तियां सुप्रीम कोर्ट के जज के समकक्ष हैं?
जंतर-मंतर 2.0 और 'सीजेआई' की चौखट पर याचिका
पिछले कुछ दिनों में घटनाक्रम तेजी से बदला है। जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शनों और नागरिक अधिकार समूहों (CJP) के एक्शन प्लान ने इस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया है। स्थिति तब और दिलचस्प हो गई जब मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक याचिका सीधे सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची। हालांकि, शीर्ष अदालत के जज ने इस मामले की तत्काल सुनवाई से साफ इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास जाने की सलाह दी। हमारी फील्ड टीम ने पाया कि कानूनी मोर्चे पर भले ही शुरुआती झटका लगा हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में महाभियोग के प्रस्ताव और विरोध की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
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राहुल गांधी का मंत्र और 'इंडिया' गठबंधन की व्यूह रचना
संसदीय लोकतंत्र में यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव आयोग को लेकर इस तरह के गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। 'आज तक' के पॉडकास्ट और विभिन्न राजनीतिक सूत्रों से सामने आए इनपुट्स के अनुसार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 'इंडिया' गठबंधन के घटक दलों को एक स्पष्ट मंत्र दिया है। हाल ही में हुई विपक्षी दलों की मैराथन बैठकों में एसआईआर (SIR) और मतदाता सूची के पारदर्शी न होने के मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई। रणनीति यह बनाई गई है कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर जनता के बीच जाकर दबाव बनाया जाए, ताकि चुनावी प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे।
क्या सुप्रीम कोर्ट के जज जितनी ही है CEC की पावर?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा संवैधानिक सवाल यह है कि आखिर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की शक्तियां और उनका पद किस स्तर का है? संविधान के जानकारों का मानना है कि सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया लगभग वैसी ही जटिल है जैसी सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने की होती है (महाभियोग जैसी प्रक्रिया)। यही कारण है कि विपक्षी दल और नागरिक संगठन इस संवैधानिक कवच के दायरे में रहकर कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि संस्था की गरिमा और उसकी संवैधानिक शक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।
संसद से सड़क तक: गांधी प्रतिमा के सामने प्रदर्शन
रणनीति के अगले चरण में कांग्रेस पार्टी और 'इंडिया' गठबंधन के तमाम सांसद संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष प्रदर्शन की तैयारी कर चुके हैं। हाथों में तख्तियां और मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग को लेकर यह प्रदर्शन केवल सांकेतिक नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक निहितार्थ हैं। आने वाले दिनों में चुनाव सुधारों और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर यह संघर्ष और अधिक आक्रामक हो सकता है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।








