चुनावी शुचिता पर तनातनी और राहुल गांधी के तीखे तेवर
भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाले निर्वाचन आयोग की भूमिका और उसके शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर इन दिनों चौतरफा बहस छिड़ी हुई है। संसद से लेकर सड़क तक मचे घमासान के बीच देश का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद कड़े तेवर दिखाए हैं। सार्वजनिक मंचों और चुनावी रैलियों में विपक्षी खेमे की ओर से लगातार यह आवाज उठाई जा रही है कि चुनाव प्रक्रियाओं में पारदर्शिता से समझौता किया गया है।
विपक्ष का यह भी दावा है कि आयोग के भीतर से ही कई अंदरूनी असहमतियां सामने आई हैं, जो इस बात का संकेत देती हैं कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इस माहौल ने प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम नागरिकों के बीच भी सुगबुगाहट तेज कर दी है। हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर देश के सबसे बड़े स्वतंत्र संवैधानिक संस्थान के शीर्ष अधिकारियों और विपक्ष के बीच यह टकराव किस हद तक आगे बढ़ेगा और इसके क्या दूरगामी राजनीतिक परिणाम सामने आएंगे।
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साल 2023 का वह नया कानून जो बना सबसे बड़ी कानूनी दीवार
विपक्ष की ओर से जब भी मुख्य चुनाव आयुक्त या अन्य आयुक्तों पर कार्रवाई करने की बात कही जाती है, तो फौरन एक कानूनी प्रावधान सामने आ जाता है जो पूरी बहस की दिशा बदल देता है। केंद्र सरकार द्वारा संसद के दोनों सदनों से पारित कराए गए 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023' की धारा 16 इस पूरे विवाद के केंद्र में है।
इस अधिनियम के मुताबिक, यदि कोई मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त अपने पद पर रहते हुए अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए कोई निर्णय लेता है, तो किसी भी अदालत में उसके खिलाफ सिविल या क्रिमिनल मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। कानून स्पष्ट रूप से यह सुरक्षा प्रदान करता है कि प्रशासनिक फैसलों या सरकारी ड्यूटी के दायरे में आने वाले कार्यों के लिए इन संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को व्यक्तिगत मुकदमों से पूरी तरह छूट प्राप्त है। यही वजह है कि विपक्ष चाहे जितनी भी तीखी मांगें उठा ले, यह कानूनी प्रावधान सीधे तौर पर किसी भी दंडात्मक कार्रवाई के आड़े आ रहा है।
चयन समिति के गठन और न्यूट्रल मेकैनिज्म पर खड़े हो रहे सवाल
इस पूरे विवाद की जड़ में केवल कानूनी सुरक्षा ही नहीं, बल्कि उस चयन समिति की संरचना भी है जिसके जरिए इन शीर्ष पदों पर नियुक्तियां की जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद संसद ने यह कानून बनाया था। शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बनी अंतरिम समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करने का प्रस्ताव था ताकि चयन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।
हालांकि, बाद में पारित किए गए कानून से देश के मुख्य न्यायाधीश को इस चयन पैनल से बाहर कर दिया गया और उनकी जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर लिया गया। विपक्षी दलों का साफ तौर पर यह तर्क है कि प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सहयोगी के बहुमत के आगे विपक्ष के नेता की आवाज बेअसर हो जाती है। इस प्रकार की चयन प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि इससे संस्था की स्वायत्तता प्रभावित होती है और सरकार मनचाहे नामों पर मुहर लगवा लेती है।
वकीलों की दलीलें और अदालतों में लंबित कानूनी लड़ाइयां
इस कानूनी कवच के खिलाफ अब अदालतों और कानूनी मंचों पर भी आवाजें उठने लगी हैं। देश की विभिन्न अदालतों में वकीलों द्वारा याचिकाएं दायर कर यह तर्क दिया जा रहा है कि चुनावी सूचियों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या कथित छेड़छाड़ को आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
"मुख्य चुनाव आयुक्त या निर्वाचन आयोग के किसी भी सदस्य को संविधान के तहत केवल राष्ट्रपति और राज्यपालों जैसी असीमित छूट प्राप्त नहीं है। यदि वोटर लिस्ट में फेरबदल जैसे मामले सामने आते हैं, तो उसकी गहन जांच होनी चाहिए और कानून सम्मत कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त रहना चाहिए।" — कानूनी विशेषज्ञ एवं याचिकाकर्ता
जानकारों का मानना है कि इस तरह की कानूनी लड़ाइयां आने वाले समय में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने के नए रास्ते तलाश सकती हैं, हालांकि मौजूदा अधिनियम की दीवार को भेदना इतना आसान नहीं होगा।
भविष्य की राजनीति और संस्थागत स्वायत्तता पर मंडराते सवाल
आगामी चुनावी समर को देखते हुए यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में सत्ता में आने पर वे इस कानून के प्रावधानों में फेरबदल करेंगे। उनका यह भी कहना है कि इस प्रकार की छूट लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता को कमजोर करती है।
दूसरी तरफ, सत्तापक्ष का यह पक्ष रहा है कि चुनाव अधिकारियों को बिना किसी डर और दबाव के अपने स्वतंत्र निर्णय लेने का माहौल मिलना बेहद जरूरी है। यदि हर फैसले के बाद अधिकारियों पर मुकदमों की तलवार लटकती रहेगी, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना असंभव हो जाएगा। बहरहाल, लोकतंत्र के इस सबसे बड़े संरक्षक संस्थान की गरिमा और राजनीतिक दलों के बीच छिड़ी इस जंग का असर आने वाले दिनों में देश की पूरी राजनीतिक दिशा तय करने वाला है।





