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राजनीतिपढ़ने में समय: 6 मिनट

खानपान पर राजनीति: बंगाल में दुर्गा पूजा पर मांसाहार रोकने की सलाह पर क्यों मचा बवाल?

भारत में खानपान की आदतें राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बनती जा रही हैं। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध या परहेज की सलाह का स्थानीय स्तर पर कड़ा विरोध देखने को मिला है। आलोचकों का मानना है कि यह क्षेत्रीय संस्कृति और खानपान की विविधता के खिलाफ है।
The Freelance ब्यूरो
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20 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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खानपान पर राजनीति: बंगाल में दुर्गा पूजा पर मांसाहार रोकने की सलाह पर क्यों मचा बवाल?
📷 खानपान पर राजनीति: बंगाल में दुर्गा पूजा पर मांसाहार रोकने की सलाह पर क्यों मचा बवाल? — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों को दूर रखने की सलाह पर स्थानीय लोगों और खुद को हिंदू राष्ट्रवादी कहने वालों ने भी कड़ा विरोध जताया।
  • बंगाली संस्कृति में मछली और मांसाहारी व्यंजन उत्सवों का अभिन्न हिस्सा हैं, जिसे लेकर बाहरी सलाह को लोगों ने अपनी संस्कृति में दखਲ माना।
  • भारत के विभिन्न राज्यों में खानपान की आदतों को लेकर राजनीति और शाकाहार को बढ़ावा देने के प्रयासों पर सामाजिक और राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
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खानपान और राजनीति का बढ़ता घालमेल

आज के दौर में राजनीतिक प्रोपेगेंडा और वैचारिक एजेंडे के जरिए समाज के नजरिए को प्रभावित करने के कई उदाहरण लगातार सामने आ रहे हैं। इस प्रक्रिया में खानपान की आदतें भी विभाजनकारी राजनीतिक प्रवृत्तियों के हाथ में एक बड़ा औजार बन गई हैं। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि खानपान की विशेष आदतें समाज के एक निश्चित वर्ग या आचरण से जुड़ी होती हैं। पवित्र गाय और गौमांस के सेवन के मुद्दों को राजनीतिक रूप से जोड़कर देखने के कारण देश में कई तरह की घटनाएं सामने आई हैं, जिनका असर समाज के विभिन्न तबकों पर पड़ा है।

आवासीय सोसायटियों में फ्लैट या मकान बेचने से पहले खरीदार की खानपान की आदतों के बारे में पूछताछ किए जाने का चलन भी धीरे-धीरे आम होता जा रहा है। यह सामाजिक अलगाव अब केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा और अधिक जटिल स्वरूप में त्योहारों और सांस्कृतिक आयстоनों के दौरान भी दिखाई देने लगा है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान इस तरह के विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया, जहां पूजा पंडालों और प्रतिमाओं के पास मांसाहारी खाद्य सामग्री न रखने की सलाह दी गई थी।

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पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा और मांसाहार का विवाद

पश्चिम बंगाल में जल्द ही राज्य का सबसे बड़ा उत्सव यानी दुर्गा पूजा शुरू होने वाली है। हालिया राजनीतिक बदलावों के बाद राज्य में राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का स्वरूप भी बदलता हुआ नजर आ रहा है। इसी कड़ी में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को बंगाल आने का न्यौता दिया गया था, जिन्होंने हावड़ा के लिलुआह में हनुमान कथा के दौरान लोगों को सलाह दी थी कि पूजा के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों को दुर्गा प्रतिमा से दूर रखा जाए।

इस तरह का परामर्श इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठनों द्वारा भी दिया जा चुका था। इस सलाह के बाद बंगाली हिंदुओं में नाराजगी देखी गई, जिसमें वे लोग भी शामिल थे जो खुद को हिंदू राष्ट्रवादी मानते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने सार्वजनिक रूप से अपना विरोध दर्ज कराया और कहा कि किसी बाहरी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि वे अपनी संस्कृति के अनुसार त्योहार कैसे मनाएं और क्या खाएं।

बंगाली संस्कृति और खानपान की गहरी जड़ें

मछली और बकरे के मांस से बनने वाले पारंपरिक व्यंजन बंगाली दुर्गा उत्सव का एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। बंगाली संस्कृति में मछली का स्थान बहुत ऊंचा है और कई धार्मिक संस्कारों में मांसाहारी खाद्य पदार्थों को शुभ माना जाता है। त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय से लेकर कई स्थानीय कंटेंट क्रिएटरों और बुद्धिजीवियों ने इस हस्तक्षेप का खुलकर विरोध किया।

कोलकाता की एक कंटेंट क्रिएटर श्रेयसी विश्वास बैनर्जी ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि बंगालियों को यह कतई नहीं बताया जाना चाहिए कि उन्हें अपनी दुर्गा पूजा कैसे मनानी चाहिए। इस विरोध के दौरान कई जगहों पर पोस्टरों को लेकर भी नाराजगी जताई गई। राजनीतिक रूप से सक्रिय नेताओं, जैसे शुभेंदु अधिकारी ने भी कालीघाट मंदिर में प्रसाद के रूप में तली हुई मछली का सेवन कर यह संदेश दिया कि खानपान क्षेत्रीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।

राष्ट्रीय स्तर पर शाकाहार बनाम मांसाहार की बहस

भारत एक अत्यंत विविधतापूर्ण देश है, जहां भाषा, वेशभूषा, धर्म और खानपान में भारी भिन्नता पाई जाती है। भौगोलिक स्थितियां भी खानपान की आदतों को तय करती हैं, जैसे तटीय क्षेत्रों में समुद्री भोजन प्रमुखता से खाया जाता है। कश्मीरी पंडितों की संस्कृति में भी मांसाहारी व्यंजनों का विशेष स्थान रहा है। इसके बावजूद हाल के वर्षों में सरकारी आयोजनों और नीतियों में शाकाहार को विशेष प्राथमिकता दिए जाने के रुझान बढ़े हैं।

"भारत की विविधता इसकी सबसे बड़ी ताकत है। खानपान और संस्कृति को किसी एक सांचे में ढालने के प्रयास सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करते हैं। क्षेत्रीय परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।" — सामाजिक विश्लेषक

अंतरराष्ट्रीय आयोजनों, जैसे ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान केवल शाकाहारी भोजन परोसे जाने को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई थी। विपक्ष ने जहां इसकी आलोचना की, वहीं सरकार के प्रतिनिधियों ने इसका बचाव किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जारी किए गए राज्य के मुख्य व्यंजनों के मानचित्र में भी पारंपरिक मांसाहारी व्यंजनों को जगह न मिलने पर चर्चाएं गर्म हुई थीं, जिससे यह संकेत मिला कि शासन स्तर पर एक विशेष प्रकार की खाद्य संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है।

खानपान की स्वतंत्रता और राजनीतिक दुविधा

विभिन्न आंकड़ों के अनुसार भारत की एक बहुत बड़ी आबादी किसी न किसी रूप में मांसाहारी भोजन का सेवन करती है, इसके बावजूद राजनीतिक मंचों और कुछ राज्य सरकारों द्वारा आक्रामक रूप से शाकाहार को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। गुजरात जैसे राज्यों में जहां लंबे समय से एक ही पार्टी की सरकार है, वहां मांसाहारी व्यंजन बेचने वाले रेस्तरां और दुकानों पर कई तरह के स्थानीय प्रतिबंध और सामाजिक दबाव देखने को मिलते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और उसके वैचारिक सहयोगियों के सामने यह बड़ी दुविधा है कि वे भारतीयों की वास्तविक खानपान आदतों और अपने शाकाहारी एजेंडे के बीच किस तरह संतुलन बिठाएं। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जहां स्थानीय संस्कृति राष्ट्रीय एजेंडे से अलग पहचान रखती है, वहां इस तरह के प्रयासों को कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।

निष्कर्ष

खानपान व्यक्तिगत पसंद, भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक परंपराओं का मामला होता है। इसे राजनीतिक या वैचारिक रंग देने से समाजों में अनावश्यक ध्रुवीकरण पैदा होता है। पश्चिम बंगाल की घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में किसी एक खास जीवनशैली या खानपान को थोपने के प्रयास सफल नहीं हो सकते। यह जरूरी है कि देश की विविधता और क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान करते हुए खानपान की स्वतंत्रता को बरकरार रखा जाए।

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