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सावधान! 7.5 लाख करोड़ पार पहुंच सकता है सोने का आयात बिल, उदय कोटक ने दी चेतावनी

भारत में सोने की लगातार बढ़ती मांग से देश के आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर बड़ा दबाव आ सकता है। दिग्गज बैंकर उदय कोटक ने चेतावनी दी है कि वित्त वर्ष 2027 तक सोने का आयात बिल 88 से 90 अरब डॉलर यानी करीब 7.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
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21 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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सावधान! 7.5 लाख करोड़ पार पहुंच सकता है सोने का आयात बिल, उदय कोटक ने दी चेतावनी
📷 सावधान! 7.5 लाख करोड़ पार पहुंच सकता है सोने का आयात बिल, उदय कोटक ने दी चेतावनी — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • वित्त वर्ष 2027 में भारत का सोने का आयात बिल 88-90 अरब डॉलर (लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचने की आशंका है।
  • कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और कमजोर रुपये के बीच सोने का भारी आयात देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सोने के आयात को अलग कर दिया जाए, तो भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत नजर आती है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी हो रही है सोने के आयात की बड़ी चुनौती

भारत में सोने के प्रति प्रेम जगजाहिर है और देश में हर शुभ अवसर पर या निवेश के रूप में सोने की खरीद को सबसे सुरक्षित माना जाता है। लेकिन यही बढ़ता रुझान अब देश की वृहद अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है। कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक और जाने-माने बैंकर उदय कोटक ने भारत के लगातार बढ़ते सोने के आयात को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उनके अनुसार, आने वाले कुछ वर्षों में सोने का आयात बिल इस हद तक बढ़ सकता है कि यह देश के चालू खाते के घाटे यानी करंट अकाउंट डिफिसिट पर सीधा दबाव डालेगा।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि जब देश में किसी वस्तु का आयात उसकी जरूरत और क्षमता से अधिक होने लगता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ जाता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, वित्त वर्ष 2027 तक भारत का कुल सोने का आयात बिल 88 से 90 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। भारतीय मुद्रा में यदि इसकी गणना की जाए, तो यह आंकड़ा लगभग 7.5 लाख करोड़ रुपये या उससे भी अधिक बैठता है। यह एक ऐसा आंकड़ा है जो देश के नीति निर्माताओं और वित्तीय विशेषज्ञों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।

उदय कोटक ने अपने हालिया बयानों में इस बात पर जोर दिया है कि देश को अपनी आयात नीतियों और प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। एक तरफ जहां कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में कमजोरी ने आयात को पहले ही महंगा कर दिया है। ऐसे में सोने पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा देश के विकास कार्यों के लिए उपलब्ध फंड को प्रभावित कर सकती है।

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चालू खाते के घाटे और सोने के आयात का गणित

सोने के आयात और देश के चालू खाते के घाटे के बीच के गणित को समझना बेहद जरूरी है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2026 में भारत का चालू खाता घाटा लगभग 25 अरब डॉलर यानी करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। वहीं दूसरी तरफ, इसी समान अवधि के दौरान देश में कुल सोने का आयात लगभग 72 अरब डॉलर यानी करीब 6.9 लाख करोड़ रुपये के आसपास रहा था।

यहाँ एक दिलचस्प आर्थिक पहलू यह है कि यदि सोने के आयात के आंकड़ों को कुल बाहरी व्यापार से अलग कर दिया जाए, तो भारत की आर्थिक और बाहरी स्थिति काफी हद तक संतुलित और बेहतर नजर आती है। यानी देश का मुख्य व्यापारिक घाटा काफी हद तक सोने के भारी-भरकम आयात की वजह से बढ़ जाता है। बैंकर उदय कोटक का तर्क है कि भारत जैसे विकासशील देश में कीमती धातुओं का इस तरह बड़ी मात्रा में आना और केवल तिजोरी या घरों में बंद हो जाना देश के लिए अनुत्पादक साबित होता है।

विशेषज्ञों का यह भी अनुमान है कि यदि आने वाले वित्त वर्ष में कच्चे तेल की औसत कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है, तो भारत का चालू खाता घाटा तेजी से बढ़कर करीब 60 अरब डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 5.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में, यदि सोने का आयात भी 88 से 90 अरब डॉलर के अनुमानित स्तर को छू लेता है, तो सरकार और रिजर्व बैंक के सामने विदेशी मुद्रा प्रबंधन को लेकर बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

"भारतीय परिवारों के पास पहले से ही बहुत बड़ी मात्रा में सोना मौजूद है, लेकिन इस अष्टम संपत्ति का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर देश की सक्रिय आर्थिक गतिविधियों में पूरी तरह से नहीं हो पा रहा है। हमें इस दिशा में गंभीर नीतिगत कदम उठाने की जरूरत है।" — उदय कोटक, संस्थापक, कोटक महिंद्रा बैंक

भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने का अनुत्पादक रूप

भारतीय समाज की संस्कृति में सोने को सबसे सुरक्षित और आपातकालीन पूंजी माना जाता है। यही कारण है कि देश के मध्यम और उच्च वर्गीय परिवारों के घरों में अनगिनत टन सोना दबा हुआ है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़ों के अनुसार भी भारतीय परिवारों के पास दुनिया का सबसे बड़ा निजी स्वर्ण भंडार मौजूद है। हालांकि, समस्या यह है कि यह विशाल संपदा ज्यादातर घरों की तिजोरियों या बैंक लॉकरों में निष्क्रिय पड़ी रहती है और देश के सकल घरेलू उत्पाद या प्रत्यक्ष आर्थिक चक्र में इसका प्रभावी योगदान नहीं मिल पाता है।

इस चुनौती से निपटने के लिए वित्तीय विशेषज्ञों और उद्योग जगत के दिग्गजों ने कई बार सरकार से विशेष मौद्रिक योजनाओं को और अधिक आकर्षक बनाने की अपील की है। उदय कोटक ने भी इस बात पर जोर दिया है कि देश में इस अनमोल धातु के उपयोग और इसके प्रबंधन को लेकर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाना चाहिए। यह समिति उन तमाम तौर-तरीकों पर विचार कर सकती है जिससे जनता के पास पड़े सोने को वित्तीय प्रणाली में लाया जा सके, ताकि आयात पर निर्भरता को कम किया जा सके।

इसके साथ ही, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पाबंदियां लगाने से बात नहीं बनेगी। सरकार को देश के भीतर ऐसे उत्पादों और सेवाओं के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा जिनकी वैश्विक बाजार में भारी मांग है। जब देश का निर्यात मजबूत होगा और विदेशों से आने वाला धन बढ़ेगा, तब इस तरह के आयात बिलों का दबाव अर्थव्यवस्था पर कम महसूस होगा। इसके अलावा, ऊर्जा और तकनीक के मोर्चे पर भी अन्य देशों पर निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से कम करने की आवश्यकता है।

वैश्विक अनिश्चितताओं और आयात दबाव का असर

वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध के हालात और महंगाई के कारण निवेशकों का रुझान एक बार फिर सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने की तरफ तेजी से बढ़ा है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का माहौल बनता है, सोने की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत जैसे देश में, जहां सोने की मांग पारंपरिक रूप से हमेशा बनी रहती है, कीमतें बढ़ने के बावजूद आयात का वॉल्यूम कम नहीं होता है। इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है।

भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार लगातार इस स्थिति पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। हालांकि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, फिर भी आयात बिल का इस तरह से 7.5 लाख करोड़ रुपये के पार जाना भविष्य के लिए एक चेतावनी की घंटी है। यदि समय रहते घरेलू स्तर पर सोने के मुद्रीकरण (Monetization) के लिए कोई ठोस और व्यावहारिक नीति नहीं बनाई गई, तो यह देश की मुद्रा और चालू खाते के संतुलन को बिगाड़ सकता है।

आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार और वित्तीय संस्थान उदय कोटक जैसे दिग्गजों द्वारा दिए गए सुझावों पर अमल करते हुए कोई नई नीतिगत रूपरेखा तैयार करते हैं या नहीं। आम जनता को भी यह समझने की जरूरत है कि आर्थिक स्थिरता के लिहाज से देश के आयात बिल को नियंत्रित रखना कितना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष और आगे की राह

निष्कर्ष तौर पर कहा जा सकता है कि भारत में सोने का बढ़ता आयात सिर्फ एक व्यापारिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश की वृहद आर्थिक सेहत से जुड़ा एक गंभीर विषय है। वित्त वर्ष 2027 तक आयात बिल के 7.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका ने वित्तीय गलियारों में बहस छेड़ दी है। जरूरत इस बात की है कि कच्चे तेल और सोने जैसी भारी आयात वाली वस्तुओं पर निर्भरता को संतुलित किया जाए। देश के भीतर मौजूद सोने के विशाल भंडार को उत्पादक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए यदि प्रभावी कदम उठाए जाएं, तो इस बड़ी चुनौती से सफलता से निपटा जा सकता है।

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