नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज अचानक पूरी तरह बदल गया है और कुदरत का यह रूप किसानों के लिए भारी मुसीबत बन गया है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पिछले कुछ घंटों के दौरान तेज आंधी के साथ ऐसी भयंकर ओलावृष्टि हुई जिसने सबको हैरान कर दिया। खेतों में लहलहाती फसलें पलक झपकते ही बर्बाद हो गईं और मंडराता संकट किसानों के चेहरों पर साफ झलक रहा है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि शासन-प्रशासन के पास भी अब किसानों की मदद के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
सबसे डराने वाली तस्वीरें उत्तराखंड के हरिद्वार और आसपास के पहाड़ी इलाकों से सामने आई हैं जहाँ आसमान से गिरे ओलों का वजन हैरान करने वाला था। हरिद्वार में कई जगहों पर करीब आधा किलो वजन तक के ओले गिरे जिनकी ताकत से सड़क पर खड़ी गाड़ियों के शीशे चकनाचूर हो गए। लोगों की छतों पर लगी सोलर प्लेटें और एस्बेस्टस की चद्दरें भी इन बड़े ओलों की मार से पूरी तरह टूट गईं। इस अचानक हुए मौसम बदलाव ने न सिर्फ किसानों बल्कि आम शहरियों की जान भी हलक में अटका दी और लोग घरों में दुबकने को मजबूर हो गए।
उत्तराखंड में 8 हजार हेक्टेयर से ज्यादा फसलें तबाह
मैदानी और पहाड़ी दोनों ही क्षेत्रों में इस बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने खेती-किसानी को भारी चोट पहुंचाई है। शुरुआती सरकारी और जमीनी रिपोर्टों के मुताबिक अकेले उत्तराखंड में करीब 8 हजार 372 हेक्टेयर कृषि भूमि इस आपदा की चपेट में आई है। सेब, नाशपाती और अन्य मौसमी फलों की बागवानी करने वाले बागवानों को तो 70 प्रतिशत तक का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। किसानों की महीनों की मेहनत और लागत चंद मिनटों के ओले गिरने से मिट्टी में मिल गई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
फसलों की बर्बादी से गुस्साए और परेशान किसानों ने अब खुलकर सड़कों पर उतरना शुरू कर दिया है। फिरोजबाद और उत्तराखंड के कई अन्य हिस्सों में किसानों ने प्रदर्शन करते हुए सरकार से तुरंत विशेष गिरदावरी कराकर मुआवजे की मांग उठाई है। उधम सिंह नगर और कुमाऊं के इलाकों में ओलावृष्टि पीड़ितों के समर्थन में राजनीतिक और सामाजिक नेता भी एक दिवसीय उपवास पर बैठ गए हैं। किसानों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द ही पचास हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा नहीं दिया तो वे इस आंदोलन को और ज्यादा तेज करेंगे।
प्रशासन का अलर्ट और मौसम विभाग की चेतावनी
जमीनी स्तर पर बढ़ते रोष को देखते हुए जिला प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी अब नुकसान का आकलन करने के लिए गांवों का दौरा कर रहे हैं। हालांकि किसानों का कहना है कि कागजी सर्वे से पेट नहीं भरेगा और उन्हें तत्काल आर्थिक मदद की दरकार है ताकि वे अगली फसल की तैयारी कर सकें। मौसम विभाग ने भी अपनी ताजा चेतावनी में कहा है कि आने वाले दिनों में उत्तराखंड के देहरादून से लेकर पिथौरागढ़ तक कई जिलों में बारिश और बर्फबारी का दौर अभी और जारी रह सकता है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब प्रभावित इलाकों का दौरा किया तो पाया कि किसानों के सामने इस वक्त दोहरी मार है। एक तरफ प्रकृति ने उनकी फसल छीन ली तो दूसरी तरफ कर्ज के जाल से उबरना उनके लिए नामुमकिन सा हो गया है। स्थानीय प्रशासन ने भले ही राहत कार्यों का भरोसा दिया है, लेकिन ठंड और बारिश के बीच खुले आसमान के नीचे बैठे किसानों का सब्र अब जवाब देने लगा है। देखना होगा कि सरकार इस आपदा के बाद किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।
राहत और मुआवजे की आस में अन्नदाता
मौसम के इस तांडव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारे देश का किसान आज भी प्रकृति की अनिश्चितताओं के आगे कितना लाचार है। बिना किसी आधुनिक बीमा सुरक्षा के सीधे मौसम पर निर्भर रहने वाले छोटे किसानों के लिए यह तबाही जानलेवा साबित हो रही है। अब पूरे इलाके की निगाहें राज्य सरकारों और केंद्र की तरफ टिकी हैं कि वे कब तक इन पीड़ित परिवारों के बैंक खातों में राहत राशि पहुंचाती हैं।






