नई दिल्ली/हेल्थ डेस्क — वेटिकन से आई एक खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। पोप लियो के फेफड़ों में एक छोटी सी गांठ यानी नोड्यूल पाया गया है। डॉक्टरों ने जांच के बाद इसके इलाज के लिए सर्जरी की सलाह दी है। इस खबर के सामने आते ही लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो लोग कभी धूम्रपान नहीं करते, उन्हें फेफड़ों की इतनी गंभीर बीमारी कैसे हो सकती है। आम तौर पर लोग मानते हैं कि सिगरेट या बीड़ी पीने वालों को ही फेफड़ों की बीमारी होती है। लेकिन मेडिकल साइंस का कहना है कि यह बात पूरी तरह सही नहीं है।
अस्पतालों के कैंसर विभागों में आने वाले मरीजों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आज के समय में फेफड़ों के कैंसर के लगभग बीस से तीस प्रतिशत मरीज ऐसे हैं, जिन्होंने जिंदगी में कभी बीड़ी या सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया। भारत के बड़े शहरों में तो यह आंकड़ा और भी तेजी से बढ़ रहा है। खराब हवा और बदलती जीवनशैली इसका एक बड़ा कारण बनकर उभरी है। डॉक्टरों का कहना है कि फेफड़ों में गांठ दिखना हमेशा कैंसर नहीं होता। लेकिन इसे नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है। समय रहते अगर जांच हो जाए, तो मरीज की जान आसानी से बचाई जा सकती है।
फेफड़ों में नोड्यूल क्या होता है और यह कितना खतरनाक है?
फेफड़ों के भीतर बनने वाली किसी छोटी गांठ या धब्बे को मेडिकल भाषा में लंग नोड्यूल कहा जाता है। यह गांठ फेफड़े के ऊतकों में किसी पुराने इन्फेक्शन की वजह से भी बन सकती है। टीबी या निमोनिया जैसी बीमारियों के ठीक होने के बाद भी कई बार फेफड़ों में ऐसे निशान रह जाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, छाती के एक्स-रे या सीटी स्कैन में दिखने वाली ज्यादातर गांठें कैंसर नहीं होती हैं। आम तौर पर नब्बे प्रतिशत से ज्यादा मामलों में यह गांठ सामान्य और बिना नुकसान वाली निकलती है। लेकिन डॉक्टर इसके आकार, फैलाव और बनावट को देखकर ही अंतिम फैसला लेते हैं।
यदि किसी गांठ का आकार समय के साथ बढ़ता जा रहा है, तो डॉक्टर तुरंत बायोप्सी कराने की सलाह देते हैं। बायोप्सी के जरिए यह पक्का पता चल जाता है कि गांठ में कैंसर की कोशिकाएं हैं या नहीं। वेटिकन के डॉक्टरों ने भी पोप लियो के मामले में यही तरीका अपनाया है। जब किसी मरीज की उम्र ज्यादा होती है, तो डॉक्टर किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेते। गांठ को शुरुआत में ही ऑपरेशन करके निकाल देना सबसे सुरक्षित रास्ता माना जाता है। इससे बीमारी को शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने का मौका नहीं मिलता।
सिगरेट न पीने वालों को कैसे घेर लेती है यह बीमारी?
धूम्रपान न करने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा कारण जहरीली हवा है। हमारे शहरों की हवा में पीएम 2.5 जैसे बेहद बारीक धूल और धुएं के कण तैरते रहते हैं। सांस लेते समय ये सूक्ष्म कण सीधे फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। लंबे समय तक ऐसी हवा में सांस लेने से फेफड़ों की कोशिकाएं खराब होने लगती हैं। इसके अलावा घरों के भीतर होने वाला प्रदूषण भी एक बड़ी वजह है। चूल्हे का धुआं, बंद कमरों में अगरबत्ती या मच्छर मारने वाली कॉइल का धुआं भी फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचाता है।
दूसरा बड़ा कारण पैसिव स्मोकिंग है, यानी दूसरों द्वारा छोड़े गए धुएं में सांस लेना। अगर आपके घर या दफ्तर में कोई दूसरा व्यक्ति सिगरेट पीता है, तो उसका असर आपके फेफड़ों पर भी पड़ता है। इसके साथ ही कुछ लोगों के शरीर में जेनेटिक बदलाव भी इस बीमारी का कारण बनते हैं। कुछ खास जीन में खराबी आने से कोशिकाएं अपने आप असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं। मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के मामले में भी यह बीमारी बिल्कुल शुरुआती दौर यानी स्टेज-जीरो में पकड़ में आ गई थी। नियमित जांच की वजह से उनका समय पर इलाज हुआ और वे पूरी तरह स्वस्थ हो गईं।
शरीर में दिखने वाले इन बदलावों को कभी न करें अनदेखा
फेफड़ों की बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि शुरुआत में इसके कोई साफ लक्षण नहीं दिखते। जब तक मरीज को तकलीफ महसूस होती है, तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को तीन हफ्ते से ज्यादा समय से खांसी आ रही है, तो उसे तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। बिना किसी वजह के वजन तेजी से कम होना भी एक खतरे की घंटी है। छाती में लगातार हल्का दर्द रहना या गहरी सांस लेते समय चुभन महसूस होना भी फेफड़ों की खराबी का संकेत हो सकता है।
सांस फूलना और थोड़ा सा चलने पर ही बहुत ज्यादा थकान लगना भी इसके प्रमुख लक्षण हैं। अगर कभी भी बलगम के साथ खून की एक बूंद भी दिखाई दे, तो उसी दिन डॉक्टर से मिलना चाहिए। अक्सर लोग इसे सामान्य मौसमी खांसी या बलगम समझकर कफ सिरप पीते रहते हैं। खुद से दवाइयां लेकर बीमारी को दबाने की कोशिश करना सबसे बड़ी गलती साबित होता है। पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को साल में एक बार अपने पूरे शरीर और छाती की नियमित जांच जरूर करानी चाहिए।
सर्जरी से इलाज और मरीज के पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद
अगर फेफड़ों की गांठ या कैंसर का पता पहली स्टेज में ही चल जाए, तो आधुनिक चिकित्सा में इसका पक्का इलाज संभव है। अब सर्जरी के बेहद आधुनिक तरीके आ चुके हैं, जिन्हें की-होल या दूरबीन वाली सर्जरी कहा जाता है। इसमें मरीज के सीने पर कोई बड़ा चीरा नहीं लगाना पड़ता। छोटे से छेद के जरिए फेफड़े के खराब हिस्से या गांठ को बाहर निकाल दिया जाता है। इस सर्जरी के बाद मरीज बहुत जल्दी ठीक होकर अपने रोजमर्रा के काम करने लगता है। पोप लियो की सर्जरी के लिए भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम इसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि फेफड़ों को मजबूत रखने के लिए हमें अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव करना होगा। रोजाना सुबह के समय प्राणायाम और गहरी सांस लेने के व्यायाम करने से फेफड़ों की ताकत बढ़ती है। ज्यादा प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलते समय अच्छे मास्क का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही भोजन में ताजे फल, हरी सब्जियां और पानी की भरपूर मात्रा रखने से शरीर के अंदर जमा गंदगी बाहर निकलती है। साफ हवा और समय पर स्वास्थ्य जांच ही हमें इस खतरनाक बीमारी से बचा सकती है।


