होम/राजनीति/मध्य प्रदेश में नौ साल बाद छात्र संघ चुनाव की सुगबुगाहट, मॉडल तय होने पर फंसा पेंच
राजनीतिपढ़ने में समय: 6 मिनट

मध्य प्रदेश में नौ साल बाद छात्र संघ चुनाव की सुगबुगाहट, मॉडल तय होने पर फंसा पेंच

दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव के नतीजों के बाद मध्य प्रदेश में भी नौ साल के लंबे अंतराल के बाद छात्र संघ चुनाव कराने की तैयारियां तेज हो गई हैं। हालांकि, चुनाव प्रत्यक्ष होंगे या अप्रत्यक्ष, इस मॉडल पर अभी तक अंतिम फैसला नहीं हो पाया है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।
The Freelance ब्यूरो
TheFreelance ब्यूरो
20 सितंबर 2026 • अपडेटेड
🌐Read in English →
शेयर करें:
मध्य प्रदेश में नौ साल बाद छात्र संघ चुनाव की सुगबुगाहट, मॉडल तय होने पर फंसा पेंच
📷 मध्य प्रदेश में नौ साल बाद छात्र संघ चुनाव की सुगबुगाहट, मॉडल तय होने पर फंसा पेंच — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • मध्य प्रदेश में आखिरी बार साल 2017 में हुए थे छात्र संघ चुनाव, अब सितंबर महीने में कराने की चल रही है तैयारी।
  • उच्च शिक्षा विभाग ने तीन सदस्यीय समिति के जरिए चुनाव व्यवस्था और संभावित मॉडल का कराया है परीक्षण।
  • एबीवीपी ने प्रत्यक्ष चुनाव की मांग की है, जबकि एनएसयूआई ने एक सप्ताह के भीतर चुनाव कार्यक्रम घोषित न होने पर हाईकोर्ट जाने की चेतावनी दी है।
प्रायोजित • SPONSOREDVoterAction Campaign Suite
VoterAction - कागज़ पर नहीं, ऐप पर लड़े जाते हैं चुनाव | अभियान की पूरी कमान

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव (DUSU Polls) के नतीजों ने एक बार फिर देश भर की छात्र राजनीति को गर्मा दिया है। राजधानी दिल्ली में हुए इन चुनावों के बाद अब मध्य प्रदेश में भी करीब नौ साल के लंबे अंतराल के बाद छात्र संघ चुनाव कराए जाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लंबे समय से छात्र संघ चुनाव बंद होने के कारण युवाओं को अपनी बात रखने और नेतृत्व क्षमता दिखाने का उचित मंच नहीं मिल पा रहा था, लेकिन अब सितंबर महीने में चुनाव कराने की दिशा में सरकार और उच्च शिक्षा विभाग ने गंभीरता से कदम बढ़ाए हैं।

मध्य प्रदेश में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव साल 2017 में कराए गए थे। इसके बाद से ही विभिन्न छात्र संगठन लगातार लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल करने की मांग करते आ रहे हैं। अब जाकर उच्च शिक्षा विभाग ने इस दिशा में ठोस पहल की है, जिससे छात्र संगठनों में एक बार फिर ऊर्जा का संचार देखने को मिल रहा है। हालांकि, चुनाव की तारीखों से ज्यादा इस समय राज्य में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि आखिर चुनाव का मॉडल क्या होगा और क्या छात्रों को सीधे अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलेगा या नहीं।

दिल्ली के डीयूएसयू नतीजों का मध्य प्रदेश की राजनीति पर असर

दिल्ली विश्वविद्यालय के हालिया चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए चार केंद्रीय पदों में से अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद पर कब्जा जमाया, जबकि उपाध्यक्ष का पद निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गया। इस चुनाव में डेढ़ लाख से अधिक छात्र मतदान के लिए पात्र थे और कुल मतदान प्रतिशत करीब 40.46 प्रतिशत दर्ज किया गया था। दिल्ली के इन परिणामों ने देश के अन्य राज्यों के छात्र संगठनों को भी सक्रिय कर दिया है।

विशेष तौर पर मध्य प्रदेश में, जहां लंबे समय से चुनाव नहीं हुए हैं, दिल्ली के नतीजे आने के बाद एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे प्रमुख छात्र संगठन पूरी तरह से सक्रिय हो चुके हैं। दोनों ही संगठन अपनी ताकत दिखाने की तैयारियों में जुट गए हैं। दिल्ली के घटनाक्रम के बाद मध्य प्रदेश के छात्र नेताओं का मानना है कि यदि राज्य में जल्द चुनाव होते हैं, तो यह यहां के राजनीतिक भविष्य की नई पौध तैयार करने में मील का पत्थर साबित होगा।

मध्य प्रदेश में नौ साल बाद छात्र संघ चुनाव की सुगबुगाहट, मॉडल तय होने पर फंसा पेंच
📷 मध्य प्रदेश के कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव की तैयारियों को लेकर सरगर्मी तेज।
विज्ञापन • ADVERTISEMENT

उच्च शिक्षा विभाग की तीन सदस्यीय समिति और रिपोर्ट

मध्य प्रदेश में छात्र संघ चुनाव की राह इतनी आसान भी नहीं है। राज्य शासन के सामने सबसे बड़ा सवाल चुनाव प्रणाली को तय करने का है। उच्च शिक्षा विभाग ने चुनाव की पूरी व्यवस्था और उसके संभावित मॉडलों का अध्ययन करने के लिए एक तीन सदस्यीय विशेष समिति का गठन किया था। इस समिति ने विभिन्न पहलुओं पर गहन परीक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है।

अब इस रिपोर्ट के आधार पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार के उच्च स्तर पर लिया जाना है। यही कारण है कि छात्र संगठनों और छात्रों के बीच तारीखों से ज्यादा असमंजस चुनाव के स्वरूप को लेकर बना हुआ है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हों और परिसरों में किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता या अशांति न फैले।

प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष चुनाव: छात्र संगठनों की अपनी-अपनी मांग

मध्य प्रदेश में छात्र संघ चुनाव को लेकर सबसे बड़ा विवाद चुनाव के तरीके को लेकर है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) शुरू से ही प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराने की मांग करती रही है। संगठन का कड़ा तर्क है कि जब तक छात्र अपने वोट से सीधे अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को नहीं चुनेंगे, तब तक सही मायनों में नेतृत्व क्षमता का विकास नहीं हो सकेगा और न ही छात्रों की वास्तविक आवाज सामने आ पाएगी।

दूसरी ओर, सरकार के सामने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष—दोनों ही विकल्पों पर विचार करने की चुनौती है। अप्रत्यक्ष प्रणाली में छात्र पहले अपने क्लास रिप्रेजेंटेटिव (CR) चुनते हैं और वे प्रतिनिधि आगे चलकर मुख्य पदों के लिए मतदान करते हैं। इस बात पर भी मंथन चल रहा है कि किस मॉडल से परिसरों में शांति बनी रहेगी और चुनाव निष्पक्षता के साथ पूरे हो सकेंगे।

"छात्र संघ चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली पाठशाला हैं। इससे विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। सरकार को बिना किसी देरी के जल्द से जल्द प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराने की घोषणा करनी चाहिए।"— केतन चतुर्वेदी, मध्य प्रदेश प्रांत मंत्री, एबीवीपी

एनएसयूआई की चेतावनी और कानूनी कदम उठाने की तैयारी

एक तरफ जहां सत्ता पक्ष और अनुकूल संगठन अपनी मांगों को रख रहे हैं, वहीं विपक्षी दल कांग्रेस से जुड़ा छात्र संगठन एनएसयूआई पूरी तरह आक्रामक रुख अपना चुका है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता और पूर्व एनएसयूआई नेता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि छात्र संघ राजनीति युवाओं को देश की मुख्यधारा की राजनीति के लिए तैयार करती है।

एनएसयूआई ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि यदि अगले एक सप्ताह के भीतर स्पष्ट चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा नहीं की जाती है, तो उनका संगठन अदालत का दरवाजा खटखटाने से पीछे नहीं हटेगा। संगठन का आरोप है कि सरकार जानबूझकर चुनाव टालने की कोशिश कर रही है ताकि युवा अपनी आवाज बुलंद न कर सकें।

आगे की राह और राजनीतिक समीकरण

मध्य प्रदेश में नौ साल बाद होने जा रहे इन संभावित छात्र संघ चुनावों पर राज्य के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों—भाजपा और कांग्रेस—की पैनी नजर है। छात्र संघ चुनावों के परिणाम अक्सर आने वाले समय के बड़े राजनीतिक समीकरणों और युवाओं के रुझान को तय करते हैं। यही वजह है कि छात्र संगठनों के साथ-साथ मुख्य राजनीतिक दल भी अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में हैं।

अब देखना यह होगा कि उच्च शिक्षा विभाग और शासन मिलकर किस मॉडल पर मुहर लगाते हैं और कब तक आधिकारिक तारीखों का ऐलान किया जाता है। फिलहाल, छात्र संगठनों की चेतावनियों, बैठकों और राजनीतिक बयानों के बीच मध्य प्रदेश के कॉलेज परिसरों में चुनावी माहौल गरमाने लगा है और हर किसी की निगाहें अब शासन के अगले बड़े फैसले पर टिकी हुई हैं।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
विज्ञापन एवं अनुशंसित सामग्री • RECOMMENDED