शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर मंथन
देश में महिलाओं के अधिकारों, उनकी शिक्षा और रोजगार को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। इसी क्रम में राजधानी पटना के फुलवारी शरीफ इलाके में 'तहरीक-ए-निस्वां' की ओर से एक महत्वपूर्ण विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी का मुख्य विषय 'शिक्षा व रोजगार का अधिकार और मुस्लिम महिलाएं' रखा गया था, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के दौरान इस बात पर विस्तार से चर्चा की गई कि आधुनिक दौर में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और लड़कियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए किस तरह की सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि देश का संविधान किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव करने की अनुमति नहीं देता है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालात अलग नजर आते हैं। गोष्ठी में शामिल हुईं वक्ताओं ने कहा कि हाल के वर्षों में देश भर में विभिन्न स्तरों पर भेदभाव की प्रवृत्तियों में बढ़ोतरी देखी गई है। विशेष तौर पर अल्पसंख्यक और कमजोर समुदायों की लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना और रोजगार के अवसरों तक पहुंच बनाना कठिन होता जा रहा है।
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सांप्रदायिक राजनीति और डर के माहौल पर चिंता
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि किस प्रकार की सांप्रदायिक राजनीति समाज में डर का माहौल पैदा कर रही है। इसका सबसे बुरा असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ रहा है। डर और असुरक्षा का यह माहौल महिलाओं को घरों से बाहर निकलने, पढ़ने और अपने पैरों पर खड़े होने से रोकता है। इसके अलावा, सरकारी स्तर पर हो रहे बदलावों जैसे कि स्कूलों के मर्जर और कई विद्यालयों के बंद होने से स्थिति और गंभीर होती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों का आपस में विलय होने और उनकी दूरी बढ़ने के कारण ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों की लड़कियों का स्कूल छोड़ने यानी ड्रॉपआउट रेट में लगातार इजाफा हो रहा है। इस संबंध में तहरीक-ए-निस्वां की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. फरहत बानो ने अपने संबोधन में स्पष्ट रूप से कहा कि महिलाओं को उनके हक से वंचित करने की हर कोशिश का लोकतांत्रिक तरीके से मुकाबला किया जाना बेहद जरूरी है।
"भारत का संविधान जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव की इजाजत नहीं देता, लेकिन हाल के वर्षों में हमने हर जगह इस भेदभाव को बढ़ते देखा है। खासतौर पर अल्पसंख्यक व कमजोर समुदाय की लड़कियों को शिक्षा और रोजगार हासिल करने में भारी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। सांप्रदायिक राजनीति मुस्लिमों को डरा रही है और इसका महिलाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।" — डॉ. फरहत बानो, राष्ट्रीय संयोजक, तहरीक-ए-निस्वां
ऐतिहासिक संघर्ष और महिला शिक्षा की परंपरा
गोष्ठी के दौरान देश में महिलाओं की शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाली ऐतिहासिक शख्सियतों को भी याद किया गया। ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी ने स्त्री शिक्षा और अधिकारों की नींव रखने वाली फातिमा शेख और सावित्रीबाई फुले के साहसिक संघर्षों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश की इन पहली शिक्षिकाओं को अपने दौर में अनगिनत सामाजिक कठिनाइयों और विरोध का सामना करना पड़ा था, लेकिन वे अपने पवित्र उद्देश्य से पीछे नहीं हटीं।
मीना तिवारी ने आगे कहा कि 20वीं सदी के दौरान बिहार की धरती पर रुकैया सखावत हुसैन समेत अनेक ऐसी दूरदर्शी महिलाओं ने काम किया जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर शिक्षा की अलख जगाई। पटना शहर में लड़कियों का सबसे पहला स्कूल रशीदतुन्निश बेगम द्वारा खोला गया था, जिसकी यह विशेषता थी कि वहां बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों की लड़कियां एक साथ शिक्षा ग्रहण करती थीं। यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि शिक्षा के प्रसार के लिए सामूहिक प्रयासों की कितनी आवश्यकता रही है।
महिला पत्रकारों और छात्राओं की प्रताड़ना पर कड़ा विरोध
विचार गोष्ठी में केवल शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि हाल के दिनों में महिला पत्रकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ हुई पुलिसिया कार्रवाई और दमनकारी नीतियों पर भी खुलकर बात रखी गई। वक्ताओं ने दिल्ली की महिला पत्रकारों शाहीन खान और नफीसा खान की पुलिस थाने में कथित पिटाई के मामले की कड़ी निंदा की। इसके साथ ही, पटना छात्र आंदोलन के दौरान सबा आफरीन की गिरफ्तारी और सहारनपुर में पत्रकार हुदा जरीवाला की गिरफ्तारी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया गया।
गोष्ठी में एक स्वर में यह आरोप लगाया गया कि इन सभी महिलाओं को केवल उनकी विशिष्ट मुस्लिम पहचान के कारण टारगेट किया गया और उन्हें प्रताड़ित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में यदि कोई महिला अपने अधिकारों की बात करती है या पत्रकारिता के माध्यम से सच सामने लाने का प्रयास करती है, तो उसे राज्य सत्ता और पुलिस तंत्र के जरिए दबाने की कोशिश की जाती है, जो कि लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है।
विविध वक्ताओं के विचार और कार्यक्रम का संचालन
दिन भर चली इस विचार गोष्ठी में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिला वक्ताओं ने अपने विचार रखे और इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। कार्यक्रम को संबोधित करने वालों में अफ्शां जबीं, नसरीन बानो, गुलशन खातून, आबिदा खातून, अनुशा मंसूर, अनीता सिन्हा, डॉ. मीरा दत्त, अनुराधा और प्रिया गुप्ता जैसी प्रमुख वक्ता शामिल रहीं।
पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन अफ्शां जबीं और नसरीन बानो द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। गोष्ठी के अंत में यह संकल्प लिया गया कि मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों के शैक्षणिक तथा व्यावसायिक अधिकारों के लिए जमीनी स्तर पर जनसंवाद और अभियान को और अधिक तेज किया जाएगा, ताकि समाज में बराबरी और न्याय की बयार को मजबूत किया जा सके।




