इस्लामाबाद/लाहौर — पाकिस्तान में गंभीर आर्थिक बदहाली और महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। देश के कई हिस्सों में लोग अब बुनियादी जरूरत यानी दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि खुला आटा और थैलेबंद आटा दोनों ही आम आदमी के बजट से बाहर हो गए हैं। पिछले कुछ हफ्तों में कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के सामने भुखमरी का संकट पैदा हो गया है।
बाजार से मिल रही ताजा जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान में 20 किलो आटे का बैग अब रिकॉर्ड 3300 रुपए तक बिक रहा है। कुछ इलाकों में जमाखोरी और कालाबाजारी के कारण कीमतें इससे भी ज्यादा वसूली जा रही हैं। हालात यह हैं कि दिहाड़ी मजदूर और कम कमाने वाले लोग अपने परिवार के लिए एक बोरी आटा खरीदने में भी असमर्थ हैं। सरकार के तमाम दावों के बावजूद सरकारी सस्ते गन्ने और आटे के काउंटर पर लंबी-लंबी कतारें लगी हैं, लेकिन लोगों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
होटल और ढाबों पर महंगी हुई एक वक्त की रोटी
महंगाई की इस मार का असर केवल घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि बाहर खाने वालों पर भी इसका सीधा असर पड़ा है। पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में होटल और ढाबों पर बनने वाली तंदूरी रोटी की कीमत 20 रुपए से बढ़ाकर अब सीधे 30 रुपए कर दी गई है। जो मजदूर या अकेले रहने वाले लोग रोजाना ढाबे पर खाना खाते थे, उनके लिए अब पेट भरना भी मुश्किल हो गया है। ढाबा मालिकों का कहना है कि महंगा आटा, गैस और तेल खरीदने के बाद उनके पास कीमत बढ़ाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा है।
कच्चे माल की कीमतों में लगातार उछाल आने की वजह से बेकरी उत्पादों, नान और कुलचे के दाम भी आसमान छू रहे हैं। कई इलाकों में तो छोटे ढाबे और नान-शॉप बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं, क्योंकि ग्राहक कम हो गए हैं और लागत लगातार बढ़ती जा रही है। आम नागरिकों का कहना है कि सरकार और प्रशासन इस गंभीर संकट पर पूरी तरह से खामोश बैठे हैं और जमीन पर राहत का कोई नामोनिशान नहीं है।
गेहूं की किल्लत और अंतरराष्ट्रीय बाजार का दबाव
पाकिस्तान में इस गहरी होती खाद्यान्न समस्या के पीछे कई बड़े कारण जुड़े हुए हैं। देश में गेहूं का घरेलू उत्पादन लगातार कम हुआ है और समय पर आयात न होने के कारण गोदाम खाली हो चुके हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन और ढुलाई की लागत बढ़ने से भी आयातित अनाज बहुत महंगा पड़ रहा है। देश की कमजोर अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी के चलते व्यापारी बाहर से गेहूं मंगाने में असमर्थ हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर कृत्रिम किल्लत पैदा हो गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह संकट और अधिक भयानक रूप ले सकता है। आटे और रोटी के दाम बढ़ने से देश के कई बड़े शहरों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। लोग खुलेआम सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं और सस्ती दरों पर राशन उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं। प्रशासन भले ही जमाखोरों के खिलाफ छापे मारने का दावा कर रहा हो, लेकिन आम आदमी की थाली से रोटी गायब होने का सिलसिला लगातार जारी है।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल और आगे का खतरा
द फ्रीलान्स की टीम द्वारा जुटाई गई जमीनी जानकारी बताती है कि देश के ग्रामीण और शहरी दोनों ही इलाकों में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। लोग सुबह सवेरे ही सस्ते आटे के ट्रकों के पीछे दौड़ने को मजबूर हैं, लेकिन सबको कोटा पूरा नहीं मिल पाता। कई जगहों पर आटे की दुकानों के बाहर सुरक्षा बलों को तैनात करना पड़ा है ताकि भगदड़ न मचे। यह स्थिति दिखाती है कि पाकिस्तान का आम नागरिक इस समय इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक राजनीतिक स्थिरता नहीं आती और अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कड़े कदम नहीं उठाए जाते, तब तक महंगाई पर लगाम लगाना नामुमकिन है। फिलहाल, पाकिस्तान की जनता के लिए हर नया दिन एक बड़ी चुनौती बन गया है, जहां बुनियादी जरूरतें पूरी करना ही सबसे बड़ा संघर्ष बन चुका है।






