नई दिल्ली और मॉस्को से हमारे फील्ड ब्यूरो की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में रूस के साइबेरिया इलाके से एक महिला की संदिग्ध मौत की खबर सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हलचल मच गई है। इस घटना के बाद करीब दो सौ लोगों को तुरंत एहतियात के तौर पर आइसोलेशन या क्वारंटीन में रखा गया है। शुरुआती खबरों और सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं ने दुनिया भर के लोगों को पुरानी महामारियों की याद दिला दी है। हालांकि, धरातल पर स्थिति उतनी डरावनी नहीं है जितनी सोशल मीडिया पर पेश की जा रही है। स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने स्थिति पर पूरी तरह से काबू पाने का दावा किया है और आम जनता से किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद जैविक हथियारों की चर्चा और रूस की गुप्त कार्यप्रणालियों को लेकर भी तमाम तरह के दावे किए गए हैं, जिन्हें बाद में अमेरिकी और रूसी राजनीतिक मंचों पर खारिज किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात को तूल दिया गया कि क्या रूस किसी तरह के खतरनाक जैविक हथियारों पर काम कर रहा है। लेकिन वैज्ञानिक और तकनीकी पड़ताल बताती है कि यह मामला किसी सोची-समझी साजिश का नहीं, बल्कि प्राकृतिक संक्रमण का एक स्थानीय मामला है। दुनिया भर की शीर्ष स्वास्थ्य एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि इस तरह की घटनाओं पर कड़ी नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह के संक्रमण को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके।
साइबेरिया की घटना और दो सौ लोगों को क्वारंटीन करने का सच
साइबेरियाई क्षेत्र में हुई इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन ने बिना कोई देरी किए त्वरित चिकित्सा प्रोटोकॉल लागू कर दिए। जिन दो सौ लोगों को क्वारंटीन किया गया है, वे सभी मृत महिला के संपर्क में आए थे या उसी इलाके में रह रहे थे। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि समय रहते उठाए गए इन कदमों की वजह से वायरस या बैक्टीरिया को आगे फैलने का मौका नहीं मिला। इस तरह की एहतियाती कार्रवाई यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी स्थानीय संक्रमण बड़ी बीमारी का रूप न ले सके। भारत और अन्य एशियाई देशों के चिकित्सा विशेषज्ञों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि रूस में उठाए गए ये कड़े कदम पूरी तरह से मानक चिकित्सा प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं।
भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां के स्वास्थ्य मंत्रालय और संक्रामक रोग विशेषज्ञों ने स्थिति की पूरी समीक्षा की है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इस वक्त घबराने की कोई जरूरत नहीं है। हमारे देश में निगरानी तंत्र मजबूत है और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों तथा यात्रियों की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। इसके अलावा, भारत के पास प्लेग जैसी पुरानी और जानी-पहचानी बीमारियों से निपटने के लिए पर्याप्त मात्रा में जीवन रक्षक दवाएं और एंटीबायोटिक्स मौजूद हैं। चिकित्सा विज्ञान आज इतना आगे निकल चुका है कि इस तरह के बैक्टीरिया को फैलने से पहले ही आसानी से बेअसर किया जा सकता है।
दुनिया भर में प्लेग के बड़े पैमाने पर न फैलने के वैज्ञानिक कारण
आम लोगों के मन में यह सवाल सबसे बड़ा है कि आखिर दुनिया में न्यूमोनिक प्लेग के वैश्विक महामारी बनने की आशंका इतनी कम क्यों है? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास इसके इलाज के लिए बेहद असरदार एंटीबायोटिक्स मौजूद हैं। ऐतिहासिक रूप से प्लेग ने सदियों पहले तबाही मचाई थी जब साफ-सफाई की कमी थी और इलाज की कोई आधुनिक दवा नहीं थी। आज के दौर में यदि समय पर मरीज की पहचान हो जाए तो सामान्य दवाओं से ही इस बीमारी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इसके अलावा, यह बीमारी हवा के जरिए बहुत लंबी दूरी तक या बहुत तेजी से नहीं फैलती जब तक कि मरीज के बहुत नजदीक लंबे समय तक न रहा जाए।
प्रशासनिक स्तर पर वैश्विक स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ और अन्य देशों की एजेंसियां किसी भी नए संक्रमण पर चौबीसों घंटे नजर रखती हैं। जैसे ही किसी भी देश में इस तरह का संदिग्ध मामला सामने आता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलर्ट जारी कर दिया जाता है। इस त्वरित सूचना तंत्र के कारण कोई भी बीमारी चुपचाप पैर नहीं पसार सकती। रूस की हालिया घटना में भी यही देखने को मिला कि जैसे ही संक्रमण का शक हुआ, तुरंत कड़े कदम उठा लिए गए। इसलिए नागरिकों को डरने के बजाय केवल सतर्क रहने और आधिकारिक स्वास्थ्य सलाह का पालन करने की सलाह दी जाती है।
रूस की प्लेग मिस्ट्री पर राजनीतिक बयानबाजी और जमीनी हकीकत
हाल ही में इस घटना को लेकर अमेरिका और रूस के बीच राजनीतिक बयानों का दौर भी देखने को मिला। कुछ मीडिया घरानों ने इसे जैविक हथियारों के परीक्षण से जोड़कर सनसनीखेज खबरें परोसीं, जिन्हें बाद में जिम्मेदार नेताओं ने खारिज कर दिया। द फ्रीलान्स की पड़ताल से यह साफ होता है कि यह मामला विशुद्ध रूप से एक प्राकृतिक स्वास्थ्य घटना है जिसे बेवफा राजनीतिक बयानों के जरिए बड़ा रूप देने की कोशिश की गई। धरातल पर साइबेरिया का जनजीवन सामान्य है और रूस का स्वास्थ्य विभाग पूरी पारदर्शिता के साथ इस पर काम कर रहा है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही डरावनी कहानियों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है। न्यूमोनिक प्लेग जैसी पुरानी बीमारियों से लड़ने के लिए आज दुनिया के पास न केवल आधुनिक तकनीक है, बल्कि मजबूत वैश्विक सहयोग भी है। भारत समेत दुनिया के किसी भी कोने में इसके व्यापक रूप से फैलने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं बनता है। पाठकों से अपील है कि वे किसी भी तरह की सनसनीखेज अफवाहों पर विश्वास न करें और केवल प्रामाणिक सरकारी तथा चिकित्सकीय ब살ियों पर ही भरोसा रखें।







