द फ्रीलान्स, इस्लामाबाद/विशेष रिपोर्ट: वैश्विक कूटनीति और दक्षिण एशिया की राजनीति में विरोधाभासों का खेल नया नहीं है, लेकिन पाकिस्तान के धार्मिक और राजनीतिक गलियारों से इन दिनों जो बयान सामने आ रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। कभी वैश्विक आतंकवाद के प्रतीकों को महिमामंडित करने वाले चेहरे अब भू-राजनीतिक हितों के तहत अपनी बयानबाजी में नाटकीय बदलाव कर रहे हैं। ताजा मामला एक प्रमुख पाकिस्तानी मौलाना का है, जिन्होंने अपने पुराने रुख से यू-टर्न लेते हुए यमन के हूती विद्रोहियों को 'आतंकी' और 'गैर-मुस्लिम' करार दिया है।
आतंक के समर्थकों का चयनिया रवैया
विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान महज एक धार्मिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसके गहरे भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं। जिस मौलाना ने इतिहास में ओसामा बिन लादेन को एक 'योद्धा' (Warrior) के रूप में पेश किया था, उसका आज हूती विद्रोहियों के खिलाफ यह रुख अपनाना वैश्विक गठजोड़ और खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के रणनीतिक समीकरणों की ओर इशारा करता है। सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्य एशिया में बदलते शक्ति संतुलन के प्रभाव अब पाकिस्तान के धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व पर साफ दिखने लगे हैं।
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सऊदी अरब से नजदीकियां और कूटनीतिक मजबूरियां
एक तरफ जहां कट्टरपंथी धार्मिक चेहरे क्षेत्रीय ताकतों के पाले तय कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस्लामाबाद के हुक्मरान भी खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करने में जुटे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव के बीच सऊदी क्राउन प्रिंस से सीधी बातचीत की है और स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान हर परिस्थिति में रियाद के साथ खड़ा है। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत और खाड़ी देशों पर उसकी निर्भरता ने उसकी विदेश नीति को काफी हद तक सऊदी हितों के अनुकूल बना दिया है।
पाकिस्तान का 'नाटो जैसा' नया गठबंधन कार्ड
सिर्फ बयानों तक ही बात सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक गलियारों से यह भी खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ मिलकर अन्य प्रमुख मुस्लिम देशों को भी एक 'नाटो जैसे' सुरक्षा गठबंधन के दायरे में लाने की जुगत में है। इस संभावित सैन्य और रणनीतिक ढांचे का उद्देश्य मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में उभरते सुरक्षा खतरों से निपटना बताया जा रहा है। हालांकि, इस तरह के प्रस्तावों पर इस्लामिक जगत के भीतर ही कई तरह की असहमतियां और आशंकाएं भी जताई जा रही हैं।
घरेलू सत्ता के समीकरण और आंतरिक कलह
इन सब बाहरी कूटनीतिक उठापटक के बीच पाकिस्तान के भीतर भी सत्ता के गलियारों में वर्चस्व की जंग छिड़ने के संकेत मिल रहे हैं। हालिया घटनाक्रमों में सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को 'चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज' (CDF) बनाए जाने की चर्चाएं जोरों पर थीं, लेकिन ठीक उसी समय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अचानक विदेश दौरे पर रवाना होने से राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। क्या यह नागरिक और सैन्य नेतृत्व के बीच किसी अनबन का नतीजा है या महज कूटनीतिक व्यस्तता? यह आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगा।
निष्कर्ष और भविष्य का असर
यह पूरी परिघटना दर्शाती है कि पाकिस्तान में धर्म, सेना और कूटनीति किस तरह एक जटिल चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं। एक तरफ जहां कट्टरपंथी तत्व अपनी सुविधानुसार आतंकवाद की परिभाषाएं गढ़ते हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की आर्थिक और रणनीतिक लाचारी हुक्मरानों को बाहरी ताकतों के इशारे पर कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है। इन सबका क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ेगा, इस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पैनी नजर बनी हुई है।








