प्रयागराज से शुरू हुई 'संवैधानिक सुरक्षा रैली', संजय निषाद ने भरी हुंकार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा गरमाने लगा है। आगामी चुनावों के मद्देनजर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल (एस) जैसे दलों के बीच अब निषाद पार्टी ने भी अपने तेवर तेज कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने अपनी ही सरकार के सामने एक बेहद संवेदनशील और बड़ा राजनीतिक दांव रख दिया है। प्रयागराज में आयोजित एक विशाल रैली के दौरान उन्होंने ऐलान किया कि उनकी पार्टी चुप बैठने वाली नहीं है और वे समाज के अधिकारों के लिए हर स्तर पर संघर्ष करने को तैयार हैं।
इस रैली में भारी संख्या में निषाद, मल्लाह, कश्यप, बिंद और अन्य पिछड़ी जातियों के लोग जुटे थे। भीड़ के उत्साह को देखते हुए संजय निषाद ने अपनी बात खुलकर रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी सरकार का हिस्सा इसलिए बनी थी ताकि उनके समाज की आवाज सुनी जा सके और उन्हें उनका हक मिल सके। इस रैली के जरिए निषाद पार्टी ने राज्य की सियासत में एक बार फिर अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश की है, ताकि आने वाले दिनों में राजनीतिक मोलभाव और सीटों के बंटवारे में उनका पलड़ा भारी रहे।
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ओबीसी से हटाकर एससी कोटे में शामिल करने की पुरजोर मांग
संजय निषाद की सबसे बड़ी मांग इन 17 उप जातियों को मिलने वाले आरक्षण के स्वरूप को बदलने को लेकर है। उनका तर्क है कि निषाद, मल्लाह, तुरई, बिंद, कश्यप जैसी करीब 17 उप जातियों को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) सूची से निकालकर अनुसूचित जाति (SC/ST) सूची में डाला जाना चाहिए। उनका दावा है कि इतिहास में ये जातियां अनुसूचित जाति वर्ग का ही हिस्सा थीं, लेकिन बाद में इन्हें ओबीसी में डाल दिया गया, जिससे इनके विकास की गति धीमी पड़ गई और इन्हें इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
मंत्री संजय निषाद ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि इस संबंध में पहले भी कई बार चर्चाएं और दस्तावेज सामने आ चुके हैं। उनका कहना है कि चूंकि यह मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के शुरुआती राजनीतिक एजेंडे और वादों का हिस्सा रहा है, इसलिए वे सरकार को उसका पुराना वादा याद दिला रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने इन जातियों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया और सत्ता में आने के बाद इनसे मुंह मोड़ लिया। ऐसे में उन्हें पूरी उम्मीद है कि डबल इंजन की मौजूदा सरकार उनके इस ऐतिहासिक और न्यायसंगत मुद्दे पर जरूर गंभीरता से विचार करेगी।
दस अलग-अलग जिलों में रैलियों का बड़ा राजनीतिक प्लान
इस मुद्दे को केवल प्रयागराज तक सीमित न रखते हुए संजय निषाद ने इसे पूरे उत्तर प्रदेश में एक बड़े आंदोलन का रूप देने की योजना बनाई है। निषाद पार्टी ने प्रदेश के दस अलग-अलग जिलों में 'संवैधानिक सुरक्षा रैली' निकालने का ऐलान किया है। पार्टी का मकसद इसके जरिए गांव-गांव और हर विधानसभा क्षेत्र तक पहुंचना है। मल्लाह, बिंद, कश्यप और निषाद समाज के युवाओं और बुजुर्गों को एकजुट करके इस मांग के पक्ष में माहौल तैयार किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की रैलियों का आयोजन करना सरकार और पार्टी दोनों के लिए एक दबाव की रणनीति का हिस्सा है। संजय निषाद भली-भांति जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इन जातियों के पास जीत और हार तय करने की क्षमता है। ऐसे में जब तक चुनाव नजदीक आएंगे, यह मुद्दा तूल पकड़ता जाएगा और अन्य राजनीतिक दल भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर होंगे। पार्टी नेताओं का दावा है कि इन रैलियों में उमड़ रही भीड़ इस बात का सबूत है कि समाज अपने अधिकारों को लेकर अब पूरी तरह जागरूक हो चुका है।
विपक्ष पर साधा निशाना, बोले- हमें मिला सिर्फ धोखा
रैली को संबोधित करते हुए संजय निषाद ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर भी जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों ने सिर्फ और सिर्फ निषाद और मल्लाह समाज के लोगों को ठगने का काम किया है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन सत्ता में आने के बाद इन जातियों के उत्थान के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई। उन्होंने कहा कि उनके समाज के लोगों को अब समझ आ गया है कि कौन उनका सच्चा हितैषी है और कौन सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेक रहा है।
"हमारी सरकार से स्पष्ट मांग है कि निषाद, मल्लाह और तुरई समेत 17 उप जातियों को ओबीसी से निकालकर अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाए। हम सरकार में इसलिए हैं क्योंकि हमें विश्वास है कि बीजेपी हमारी सुनेगी और हमें न्याय दिलाएगी।" — डॉ. संजय निषाद, अध्यक्ष, निषाद पार्टी एवं कैबिनेट मंत्री, यूपी सरकार
उन्होंने भीड़ से यह भी अपील की कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी के बहकावे में न आएं। रैली के दौरान 'आरक्षण हमारा अधिकार है' के नारे भी गूंजे, जिससे साफ जाहिर होता है कि पार्टी इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार और केंद्रीय नेतृत्व इस मांग पर क्या रुख अपनाता है, क्योंकि आने वाले समय में यह मुद्दा सियासी गलियारों में एक बड़ा भूचाल ला सकता है।
निष्कर्ष: आने वाले चुनावों पर कितना असर डालेगा यह मुद्दा?
संजय निषाद द्वारा उठाया गया यह कदम यूपी की राजनीति में एक नए समीकरण की शुरुआत कर सकता है। हालांकि किसी भी जाति को ओबीसी से एससी कोटे में शामिल करने की प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी रूप से काफी जटिल होती है और इसके लिए लंबी रिपोर्ट और केंद्र सरकार की संस्तुति की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद, राजनीतिक मंचों से इस तरह के मुद्दों को हवा देना चुनावी मौसम में जनता का ध्यान खींचने का एक अचूक तरीका माना जाता है। निषाद पार्टी की इस जिद से जहां एक तरफ सरकार के भीतर समन्वय की परीक्षा होगी, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों के पास भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का एक नया बहाना मिल गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस सियासी दबाव से कैसे निपटती है और क्या संजय निषाद की यह 'संवैधानिक सुरक्षा रैली' उनके समाज के लिए कोई बड़ा बदलाव ला पाती है या नहीं।






