मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति के क्षितिज पर आज एक ऐसा दृश्य उभरा, जिसकी कल्पना शायद ही कुछ महीने पहले किसी ने की होगी। कभी राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे ठाकरे बंधु—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—एक बार फिर कंधे से कंधा मिलाकर मुंबई की सड़कों पर उतरे। मौका था मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ आयोजित 'गर्जना मोर्चा' का, जिसमें कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दिग्गज नेता भी पूरी ताकत के साथ शामिल हुए।
सड़कों पर उमड़ा विपक्ष का सैलाब
आजाद मैदान से शुरू हुए इस मार्च में दक्षिण मुंबई की सड़कें विपक्षी कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के हुजूम से पट गईं। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड टीम ने पाया कि प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं और वे चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठा रहे थे। महाविकास अघाड़ी (MVA) के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने एक सुर में आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्ष के खिलाफ किया जा रहा है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
संबंधित खबरें
ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग पर सीधा हमला
मोर्चे के दौरान मंच से दिए गए भाषणों का मुख्य केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार रहे। नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और निष्पक्षता के अभाव का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। वक्ताओं ने दो टूक कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता साबित करनी होगी, अन्यथा यह जनआंदोलन पूरे राज्य और देश में फैलाया जाएगा।
ठाकरे बंधुओं की एकजुटता का सियासी संदेश
इस विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा आकर्षण उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की संयुक्त मौजूदगी रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। दोनों भाइयों का एक मंच पर आना और कांग्रेस-NCP के साथ मिलकर हुंकार भरना यह साबित करता है कि विपक्ष मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ अपनी रणनीतिक एकजुटता दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता।
व्यापक राजनीतिक प्रभाव और आगे की राह
भले ही यह मोर्चा तात्कालिक तौर पर चुनाव आयोग के खिलाफ है, लेकिन इसके दूरगामी राजनीतिक निहितार्थ हैं। जिस प्रकार से मुंबई में जनसैलाब उमड़ा है, उससे सत्ताधारी दल की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल बताती है कि आगामी चुनावी रणभेरी से पहले यह प्रदर्शन विपक्ष के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। देखना यह होगा कि चुनाव आयोग इन गंभीर आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देता है और विपक्षी दलों का यह गठबंधन जमीन पर कितना असर छोड़ पाता है।








