तुर्कमेनिस्तान में क्यों है काले रंग की गाड़ियों पर बैन?
दुनियाभर में देशों के अपने अलग-अलग कानून और नियम होते हैं, जो वहां की संस्कृति, इतिहास या फिर वहां के शासकों की पसंद के हिसाब से तय होते हैं। लेकिन कुछ नियम इतने अजीब और हैरान करने वाले होते हैं कि उनके बारे में जानकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है। मध्य एशिया के देश तुर्कमेनिस्तान में भी एक ऐसा ही सख्त और अनोखा नियम लागू है, जिसके बारे में जानकर दुनिया भर के लोग हैरान रह जाते हैं। इस देश में गाड़ी जैसी आम चीज को लेकर बेहद अजीबोगरीब पाबंदियां हैं।
तुर्कमेनिस्तान अपनी कूटनीति, सख्त प्रशासनिक नियमों और असामान्य पाबंदियों के लिए जाना जाता है। देश के सबसे गंभीर और चर्चित प्रतिबंधों में से एक गाड़ी के रंग से जुड़ा हुआ है। देश की राजधानी अश्गाबात में काले रंग की गाड़ियों के चलने पर पूरी तरह रोक जैसी स्थिति है। यहां के अधिकारियों और प्रशासन ने काले वाहनों के बजाय सफेद और दूसरे हल्के रंगों की गाड़ियों को प्राथमिकता देने का कड़ा निर्देश दे रखा है।
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पूर्व राष्ट्रपति की मान्यताओं से जुड़ा है यह अजीब नियम
गाड़ियों के रंगों से जुड़ा यह अजीबोगरीब नियम रातों-रात नहीं बना, बल्कि इसके पीछे एक लंबी प्रशासनिक सोच और पूर्व राष्ट्रपति की व्यक्तिगत मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। यह पूरा मामला तुर्कमेनिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति गुरबांगुली बेर्dymuhamedov के कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूर्व राष्ट्रपति का ऐसा पक्का विश्वास था कि सफेद रंग पवित्रता, शुद्धता और अच्छे भाग्य का प्रतीक होता है।
इसके विपरीत, पूर्व राष्ट्रपति काले रंग को दुर्भाग्य और अशुभता से जोड़कर देखते थे। उनकी इसी सोच और मान्यताओं ने राजधानी अश्गाबात के प्रशासनिक अधिकारियों के फैसलों को गहराई से प्रभावित किया। नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे राजधानी की सड़कों पर काली गाड़ियों का दिखना कम होता गया और प्रशासन ने सफेद व चमकीले रंगों के वाहनों को ही बढ़ावा देना शुरू कर दिया।
साल 2015 में आयात पर लगी थी पहली रोक
इस अजीबोगरीब प्रतिबंध की शुरुआत एक झटके में नहीं हुई, बल्कि यह कई सालों के दौरान क्रमिक रूप से लागू किया गया। साल 2015 में तुर्कमेनिस्तान सरकार ने विदेशों से काले रंग की गाड़ियों के आयात यानी इम्पोर्ट पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया। इस नियम के आते ही देश के नागरिकों और व्यापारियों के लिए बाहर से काली गाड़ियां मंगवाना पूरी तरह असंभव हो गया।
इसके कुछ ही सालों बाद, यानी 2018 तक राजधानी में पहले से मौजूद काली गाड़ियों पर भी शिकंजा कसना शुरू हो गया। स्थानीय पुलिस और यातायात विभाग के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए कि वे रंग से जुड़े नियमों का पालन न करने वाले वाहन चालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। कई मामलों में मालिकों को अपनी गाड़ी सड़क पर लाने से रोक दिया गया।
वाहन मालिकों पर पड़ा भारी आर्थिक बोझ
जिन नागरिकों के पास पहले से ही काली गाड़ियां थीं, उनके लिए यह नियम किसी बड़े संकट से कम नहीं साबित हुआ। अपनी गाड़ियों को नियमों के दायरे में लाने के लिए वाहन मालिकों को भारी-भरकम खर्च का सामना करना पड़ा। स्थिति और स्थानीय प्रशासन के आदेश के आधार पर लोगों को अपनी काली गाड़ियों को सफेद, चांदी या फिर सुनहरे रंग में दोबारा रंगवाना पड़ा।
आम नागरिकों के लिए यह री-पेंटिंग का खर्च बहुत बड़ा था। जानकारों के अनुसार, तुर्कमेनिस्तान में आम लोगों की औसत मासिक आय लगभग 200 से 300 डॉलर के आसपास है, जबकि एक सामान्य कार को पूरी तरह से दोबारा रंगवाने का खर्च 500 से 1000 डॉलर तक बैठता है। ऐसे में एक आम नागरिक के लिए यह खर्च उसकी कई महीनों की कमाई के बराबर था।
क्यों खास है 'व्हाइट सिटी' अश्गाबात?
गाड़ियों के रंगों को लेकर तुर्कमेनिस्तान सरकार की यह जिद सिर्फ अंधविश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे शहर की वास्तुकला से जुड़ा एक बड़ा विजन भी है। तुर्कमेन राजधानी अश्गाबात को दुनिया भर में 'व्हाइट सिटी' यानी सफेद शहर के रूप में विकसित किया गया है। शहर की बड़ी-बड़ी और भव्य इमारतों को सफेद संगमरमर से सजाया गया है।
"राजधानी की खूबसूरती को एक खास और एक जैसी वास्तुकला के दायरे में रखना सरकार की प्राथमिकता रही है। शहर की इस सफेद पहचान के साथ काले रंग की गाड़ियां मेल नहीं खाती थीं, जिसके कारण प्रशासन ने वाहनों के रंगों को लेकर यह सख्त रुख अपनाया।" — शहरी मामलों के विशेषज्ञ
सफेद वास्तुकला पर हद से ज्यादा जोर देने की वजह से राजधानी की पूरी विजुअल अपीयरेंस एक जैसी नजर आती है। प्रशासन का मानना है कि सड़कों पर दौड़ती हुई सफेद या चांदी के रंग की गाड़ियां इस सफेद संगमरमर वाले शहर के माहौल के साथ ज्यादा बेहतर तरीके से मेल खाती हैं।
गंदी गाड़ी चलाने पर भी लगता है तगड़ा जुर्माना
तुर्कमेनिस्तान में गाड़ियो से जुड़े नियम सिर्फ उनके रंग तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी साफ-सफाई को लेकर भी प्रशासन उतना ही सख्त है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर राजधानी में कोई चालक अपनी गाड़ी को गंदा या धूल से सना हुआ चलाता पकड़ा जाता है, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है।
राजधानी की सीमा में प्रवेश करने वाले हर वाहन से यह उम्मीद की जाती है कि वह पूरी तरह साफ-सुथरा और बेहतरीन रखरखाव की स्थिति में हो। यदि मोटर चालकों की गाड़ियां शहर के इन कड़े स्वच्छता मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं, तो ट्रैफिक पुलिस तुरंत कार्रवाई करती है। यही वजह है कि वहां के लोगों को अपनी गाड़ियों की चमक-धमक बनाए रखने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है.
निष्कर्ष: नियंत्रण और सौंदर्य का अनूठा मेल
संक्षेप में कहा जाए तो तुर्कमेनिस्तान में काले रंग की गाड़ियों पर लगा प्रतिबंध किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। यह वहां के नियंत्रित राजनीतिक माहौल, पूर्व राष्ट्रपति की व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और राजधानी को एक विशेष वास्तुशिल्प पहचान देने के दृष्टिकोण का मिला-जुला रूप है। भले ही बाहरी दुनिया के लोगों के लिए यह नियम अजीब या तानाशाही भरा लगे, लेकिन वहां के नागरिकों के लिए यह रोजमर्रा की जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बन चुका है जिसका पालन करना उनकी मजबूरी बन गया है।





