योगी सरकार का बड़ा प्रशासनिक कदम, 13 गांवों को चकबंदी प्रक्रिया से किया गया बाहर
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य में भूमि सुधार और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में दशकों से लंबित पड़ी चकबंदी प्रक्रियाओं को खत्म करने के लिए शासन स्तर पर बड़ी कार्रवाई की गई है। मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बाद चकबंदी विभाग ने सक्रियता दिखाते हुए कई ऐसे गांवों को इस जटिल प्रक्रिया से बाहर कर दिया है, जहां वर्षों से कोई ठोस प्रगति नहीं हो रही थी।
अधिकारियों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य किसानों को अनावश्यक कानूनी और कागजी झंझटों से मुक्ति दिलाना है। जिन गांवों में चकबंदी का कार्य तकनीकी अड़चनों, भौगोलिक समस्याओं या अन्य कारणों से दशकों से अटका था, वहां के निवासियों को अब राहत की सांस मिलने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि जो प्रक्रियाएं सालों-साल से नतीजा नहीं दे पा रही थीं, उन्हें बेवजह खींचने के बजाय समाप्त करना ही बेहतर विकल्प है।
इस पूरी कार्रवाई की निगरानी खुद चकबंदी आयुक्त डॉ. हृषिकेश भास्कर यशोद कर रहे हैं। उनके निर्देशों के आधार पर ही प्रदेशभर के उन तमाम गांवों की सूची तैयार की गई, जहां चकबंदी के नाम पर किसान सालों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। शासन के इस सख्त रुख से महकमे में भी हड़कंप मचा हुआ है और फाइलों के निस्तारण में तेजी लाई जा रही है।
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मैनपुरी से लेकर बदायूं तक, दशकों से अटके थे जमीनी मामले
चकबंदी आयुक्त कार्यालय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, छह अलग-अलग जिलों के कुल 13 गांवों को जोत चकबंदी अधिनियम की धारा-6(1) के तहत अब इस प्रक्रिया से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है। इन गांवों में कुछ मामले तो ऐसे थे जो पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से फाइलों में धूल फांक रहे थे। इन मामलों के कारण किसानों की जमीन से जुड़े तमाम कार्य ठप पड़े हुए थे।
सूची के अनुसार, सबसे पुराना मामला मैनपुरी जिले के भांती गांव का है, जहां पिछले 35 वर्षों से चकबंदी प्रक्रिया चल रही थी लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। इसी तरह बदायूं का सिरतौल गांव 14 साल से, उन्नाव के दरौली, पीखी, सर्लीद और निहालपुर गांव तथा लखनऊ का शिवपुरी गांव 12 साल से इस प्रक्रिया में उलझे हुए थे। इसके अलावा बरेली का कादरगंज गांव भी पिछले 10 साल से लंबित था।
इन लंबे समय से चल रहे मामलों के कारण किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। जमीन के छोटे-छोटे बंटवारे और चक परिवर्तन के मामलों में किसान रोजाना तहसील और चकबंदी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर थे, जिससे उनकी नाराजगी लगातार बढ़ रही थी।
किन कारणों से फंसी थी प्रक्रिया? विकास और भौगोलिक अड़चनें बनीं वजह
सवाल यह उठता है कि आखिर इन गांवों में चकबंदी का काम इतने लंबे समय तक क्यों लटका रहा और इसे पूरा क्यों नहीं किया जा सका? इसके पीछे कई व्यावहारिक और भौगोलिक कारण सामने आए हैं। अधिकारियों का कहना है कि इन क्षेत्रों में जमीनी हकीकत चकबंदी नियमों के अनुकूल नहीं बैठ रही थी, जिसके कारण लगातार पेंच फंस रहे थे।
प्रमुख कारणों में इन गांवों का तेजी से शहरीकरण या विकास योजनाओं के दायरे में आना शामिल है। इसके अलावा कई गांव नदियों के कटान से भारी रूप से प्रभावित थे, जिससे भूमि का स्वरूप लगातार बदल रहा था। नियमानुसार चकबंदी योग्य क्षेत्रफल कुल क्षेत्र का 40 प्रतिशत से कम होना भी एक बड़ी तकनीकी बाधा थी। साथ ही, कुछ गांवों के हिस्से औद्योगिक विकास क्षेत्रों में शामिल हो जाने के कारण भी वहां पुरानी चकबंदी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना असंभव हो गया था।
"किसानों के हितों की रक्षा करना हमारी प्राथमिकता है। जो प्रक्रियाएं दशकों से लंबित थीं और तकनीकी कारणों से आगे नहीं बढ़ पा रही थीं, उन्हें समाप्त कर किसानों को राहत दी जा रही है ताकि वे अपनी जमीन का स्वतंत्र उपयोग कर सकें।" — प्रशासनिक अधिकारी, चकबंदी विभाग, उत्तर प्रदेश
मुजफ्फरनगर में 16 साल पुराना मामला हुआ सफलतापूर्वक पूरा
एक तरफ जहां 13 गांवों को चकबंदी प्रक्रिया से बाहर किया गया है, वहीं दूसरी ओर कुछ स्थानों पर इसे सफलतापूर्वक पूरा भी किया गया है। मुजफ्फरनगर जिले के पीपलशाह गांव में पिछले 16 वर्षों से लंबित चकबंदी प्रक्रिया को आखिरकार कड़े प्रयासों के बाद पूरा कर लिया गया है। इसे जोत चकबंदी अधिनियम की धारा-52(1) के तहत अमलीजामा पहनाया गया है।
पीपलशाह गांव में चकबंदी प्रक्रिया पूरी होने से वहां के किसानों में खुशी की लहर है। लंबे समय से अटके मालिकाना हक और चक के निर्धारण का काम पूरा होने से अब ग्रामीण अपनी जमीनों पर स्पष्ट रूप से कृषि कार्य और अन्य गतिविधियों को अंजाम दे सकेंगे। प्रशासन का कहना है कि जिन जगहों पर प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता था, वहां पूरी पारदर्शिता के साथ काम पूरा कराया जा रहा है।
किसानों को मिलेगा सीधा लाभ, समयबद्ध निस्तारण पर जोर
योगी सरकार के इस फैसले से प्रदेश के कृषि जगत में एक सकारात्मक संदेश गया है। जानकारों का मानना है कि जिन गांवों को चकबंदी से बाहर किया गया है, वहां अब किसान अपनी भूमि को लेकर नए सिरे से फैसले ले सकेंगे। उन्हें पुराने विवादों और कानूनी पचड़ों से मुक्ति मिलेगी।
सरकार की मंशा साफ है कि भूमि प्रबंधन से जुड़ी प्रक्रियाओं को पारदर्शी, सरल और समयबद्ध बनाया जाए। भविष्य में भी उन सभी मामलों की समीक्षा की जा रही है जो अनावश्यक रूप से अदालतों या दफ्तरों में लंबित हैं। इस पूरी कार्रवाई से प्रशासनिक तंत्र में सुस्ती और लालफीताशाही पर लगाम कसने में मदद मिलेगी, जिसका सीधा फायदा राज्य के करोड़ों किसानों को मिलेगा।





