उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले एक बहुत बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। समाजवादी पार्टी से बगावत कर चुके तीन बागी विधायक—गौरीगंज से राकेश प्रताप सिंह, गोसाईगंज से अभय सिंह और कालपी से विनोद चतुर्वेदी—आधिकारिक तौर पर बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करने जा रहे हैं।
सपा के इन तीनों बागी विधायकों की बीजेपी में एंट्री के लिए एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, पिछड़ा वर्ग मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरपाल मौर्य और मंत्री दारा सिंह चौहान समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। अमेठी के इस भव्य और विशाल शक्ति प्रदर्शन से अवध से लेकर बुंदेलखंड तक की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
बगावत से लेकर बीजेपी में एंट्री तक का सफर
गौरीगंज से विधायक राकेश प्रताप सिंह, गोसाईगंज से विधायक अभय सिंह और कालपी से विधायक विनोद चतुर्वेदी 2022 में सपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे थे। हालांकि, साल 2023 में राज्यसभा चुनाव के दौरान ये सभी सपा से बागी हो गए। इन तीनों नेताओं ने पार्टी लाइन से हटकर बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। इसके बाद से ही इनके राजनीतिक रुख को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं।
पार्टी-विरोधी गतिविधियों का हवाला देते हुए समाजवादी पार्टी ने सख्त रुख अपनाते हुए राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह को निष्कासित कर दिया था। अब 2027 के चुनाव से ठीक पहले इन दिग्गजों का भगवा खेमे में शामिल होना विपक्ष के मजबूत किलों में सेंध लगाने की बीजेपी की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अवध से बुंदेलखंड तक साधने का सियासी दांव
राकेश प्रताप सिंह का अमेठी क्षेत्र में अपना व्यक्तिगत जनाधार और मजबूत स्थानीय नेटवर्क है। उनके बीजेपी में आने से गांधी परिवार के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में पार्टी की पकड़ और अधिक मजबूत होगी। वहीं, अयोध्या की गोसाईगंज सीट से विधायक अभय सिंह की गिनती प्रभावी नेताओं में होती है, जिनका प्रभाव आसपास के जिलों तक फैला है।
कालपी सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी के पार्टी में आने से बुंदेलखंड क्षेत्र में बीजेपी का दायरा और चौड़ा होगा। बुंदेलखंड बेल्ट में जातियों के समीकरण साधने के लिहाज से यह जॉइनिंग पार्टी के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नेताओं के आने से स्थानीय स्तर पर टिकट और वर्चस्व को लेकर पार्टी के भीतर संतुलन बिठाना एक बड़ी चुनौती भी होगी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और राजनीतिक गलियारों में वायरल इस घटनाक्रम की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह घटना उत्तर प्रदेश की राजनीति में व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। साभार: संबंधित राजनीतिक अपडेट्स / मीडिया रिपोर्ट्स।
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