देशभर में 17 सितंबर को शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा धूमधाम से आयोजित की जाएगी। इसे लेकर बक्सर जिले में भी उत्साह का माहौल है और सभी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों से लेकर बाजारों तक में साफ-सफाई का दौर चल रहा है। इस दिन सभी लोग अपने औजारों, मशीनों और वाहनों की पूजा करते हैं ताकि सालभर काम में बरकत बनी रहे।
बक्सर में रेलवे स्टेशन से लेकर गैराज तक विशेष तैयारियां
विश्वकर्मा पूजा को लेकर बक्सर में उत्सव जैसा माहौल नजर आ रहा है। रेलवे स्टेशन परिसर, बस स्टैंड, पीएचईडी कार्यालय, टेलीफोन एक्सचेंज, पावर ग्रिड और तमाम कार्यशालाओं में साफ-सफाई का काम जोरों पर है। कई जगहों पर भव्य पूजा पंडाल भी बनाए गए हैं जिन्हें रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जा रहा है। कुंभकार भी भगवान विश्वकर्मा की सुंदर प्रतिमाएं तैयार करने में दिन-रात जुटे हुए हैं ताकि समय पर सभी जगह मूर्तियां पहुंच सकें।
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पौराणिक काल से रहा है देवशिल्पी का खास महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला शिल्पी माना जाता है जिन्होंने सृष्टि की रचना में भगवान ब्रह्मा की सहायता की थी। उन्होंने ही सतयुग के स्वर्ग लोक, त्रेता युग की सोने की लंका, द्वापर युग की द्वारिका नगरी और कलियुग की हस्तिनापुर का निर्माण किया था। यहां तक कि भगवान श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा की पुरी का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा किया गया था।
ऐसे करें विधि-विधान से भगवान विश्वकर्मा की पूजा
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, पूजा के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठना चाहिए। पूजा में अक्षत, हल्दी, फूल, पान, सुपारी, मिठाई और फल का इस्तेमाल किया जाता है। सभी मशीनों और यंत्रों पर हल्दी और चावल का टीका लगाया जाता है।
"भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कला, व्यापार और शिल्प कार्य से जुड़े लोगों को विशेष सफलता मिलती है। सच्चे मन से आराधना करने वाले हर कारीगर के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।" — आचार्य आशुतोष पांडेय, ज्योतिषाचार्य
पूजा के दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करके विधिवत मंत्रोच्चार किया जाता है। इसके बाद चारों दिशाओं में अक्षत छिड़क कर पीली सरसों से रक्षा बंधन किया जाता है। रात के समय कई स्थानों पर भजन-संध्या और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होंगे।

