नई दिल्ली/पटना: भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं में पर्वों और व्रतों का विशेष स्थान है, लेकिन जब बात माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और मंगलकामना के लिए रखे जाने वाले व्रतों की आती है, तो 'जितिया' या 'जीवित्पुत्रिका' व्रत का नाम सबसे ऊपर आता है। इस वर्ष 2026 में भी यह कठिन व्रत माताओं द्वारा पूरी निष्ठा और कठोर नियमों के साथ रखा जा रहा है। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड टीम ने इस पावन पर्व के विभिन्न आयामों, इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और तीन दिनों तक चलने वाले इसके कड़ेनुमा अनुष्ठानों की गहराई से पड़ताल की है।
तीन दिनों तक चलने वाला सबसे कठिन अनुष्ठान
जितिया व्रत को हिंदू पंचांग के अनुसार सबसे कठिन व्रतों में शुमार किया जाता है। यह व्रत कुल तीन दिनों तक चलता है, जिसमें नहाय-खाय से लेकर बिना जल के निर्जला उपवास तक के कड़े नियम शामिल हैं। सप्तमी तिथि को 'नहाय-खाय' के साथ इस व्रत की शुरुआत होती है, अष्टमी तिथि को महिलाएं प्रदोष काल तक बिना अन्न और जल के (निर्जला) उपवास रखती हैं, और नवमी तिथि को पारण के साथ व्रत का समापन होता है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक, माताओं का यह अटूट विश्वास समाज में एक गहरी आध्यात्मिक और मार्मिक मिसाल पेश करता है।
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राजा जीमूतवाहन की कथा: त्याग और करुणा की पराकाष्ठा
जितिया व्रत की कथा के केंद्र में गंधराज राजकुमार जीमूतवाहन की महान कथा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा जीमूतवाहन बेहद दयालु और परोपकारी थे। जब उन्हें पता चला कि नाग वंश के सापं पक्षीराज गरुड़ का आहार बन रहे हैं और हर दिन एक नाग को बलि के रूप में भेजा जाता है, तो जीमूतवाहन ने एक वृद्ध नागमाता शंखचूड के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं अपने शरीर को गरुड़ के सामने अर्पित करने का निर्णय लिया। उनकी इस असीम करुणा, त्याग और जीवदया से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने गरुड़ को पराजित किया और सभी नागों की रक्षा की। साथ ही, जीमूतवाहन को अमरत्व और उनकी शरण में आने वाली माताओं की संतानों को दीर्घायु का वरदान मिला। तभी से संतान की रक्षा के लिए इस कथा का श्रवण और पठन अनिवार्य माना गया है।
कथा श्रवण और पूजा का महत्व
धार्मिक अनुष्ठानों के जानकारों और पुजारियों के अनुसार, जितिया व्रत के दौरान कथा का पाठ करने मात्र से व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है। महिलाएं सामूहिक रूप से बैठकर राजा जीमूतवाहन की इस अमर गाथा को सुनती हैं। इस दौरान पूजा में विशेष सामग्री जैसे मडुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग, और जिउतिया (धागे या सोने-चांदी का पेंडेंट) का विशेष महत्व होता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आधुनिक दौर में भी इसकी प्रासंगिकता उतनी ही मजबूत बनी हुई है।
शुभ मुहूर्त और पारण का समय
व्रत के दौरान सही समय और मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि के आरंभ और समापन के साथ ही पारण का समय तय होता है। इस बार के व्रत में भी माताओं ने सूर्योदय से पूर्व स्नान-ध्यान कर पूजा-अर्चना की और अगले दिन निर्धारित शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण किया। स्थानीय स्तर पर रिपोर्टिंग के दौरान यह बात सामने आई कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी महिलाएं इस व्रत के एक-एक नियम का पूरी सख्ती से पालन करती हैं।
निष्कर्ष और सामाजिक प्रभाव
जितिया व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक मां के अपने बच्चे के प्रति असीम प्रेम, समर्पण और सुरक्षा की भावना का जीवंत प्रतीक है। 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल दर्शाती है कि भागदौड़ भरी इस आधुनिक जिंदगी में भी प्राचीन संस्कृति और लोक-आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह व्रत समाज को त्याग, परोपकार और ममता के उस उच्च आदर्श की याद दिलाता है, जो हर दौर में प्रासंगिक है।








