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धार्मिक ग्रंथों पर पेन चलाने से क्यों मना करते हैं संत? कथावाचक शिवम साधक ने बताई बड़ी वजह

सनातन धर्म में धार्मिक ग्रंथों को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं बल्कि भगवान का स्वरूप माना गया है। कथावाचक शिवम साधक महाराज ने बताया है कि श्रीमद्भगवत गीता या अन्य ग्रंथों पर पेन से निशान क्यों नहीं लगाने चाहिए।
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19 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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धार्मिक ग्रंथों पर पेन चलाने से क्यों मना करते हैं संत? कथावाचक शिवम साधक ने बताई बड़ी वजह
📷 धार्मिक ग्रंथों पर पेन चलाने से क्यों मना करते हैं संत? कथावाचक शिवम साधक ने बताई बड़ी वजह — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • कथावाचक शिवम साधक के अनुसार धार्मिक ग्रंथों पर पेन चलाना अशुभ और शास्त्रों के नियमों के खिलाफ है।
  • मान्यता है कि ग्रंथों के पन्नों पर पेन चलाने का मतलब साक्षात श्री कृष्ण के मुखारविंद या हृदय पर पेन चलाना है।
  • यदि कोई अच्छी बात याद रखनी हो, तो उसे ग्रंथ पर लिखने के बजाय किसी अलग कागज पर नोट करना चाहिए।

धार्मिक ग्रंथों के प्रति आदर और हमारी आधुनिक आदतें

सनातन संस्कृति में धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और उनके प्रति अगाध श्रद्धा रखने की परंपरा सदियों पुरानी चली आ रही है। हमारे यहां वेद, पुराण, रामायण और श्रीमद्भगवत गीता जैसे ग्रंथों को केवल ज्ञान का स्त्रोत ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, सकारात्मकता और साक्षात ईश्वर का प्रतीक माना जाता है। जब भी हम इन ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, तो हमारे मन में एक विशेष प्रकार की पवित्रता और अनुशासन का भाव होना चाहिए। ये ग्रंथ हमारी जीवनशैली को सही दिशा दिखाने का काम करते हैं और हमें नैतिक मूल्यों से अवगत कराते हैं।

हालांकि, आधुनिक दौर में पढ़ाई करने और चीजें याद रखने के हमारे तरीके काफी बदल चुके हैं। स्कूल-कॉलेज की किताबों या सामान्य उपन्यासों को पढ़ते समय महत्वपूर्ण पंक्तियों को हाईलाइट करने के लिए हम पेन, पेंसिल या हाइलाइटर का खुलकर इस्तेमाल करते हैं। यह आधुनिक जीवनशैली में एक सामान्य बात बन चुकी है ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर वे जरूरी बातें तुरंत नजर आ सकें। लेकिन, जब यही आदतें धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के समय अपनाई जाती हैं, तो यह शास्त्र सम्मत नहीं मानी जाती हैं।

हाल ही में प्रसिद्ध कथावाचक शिवम साधक महाराज ने इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला है और आम जनमानस को एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में समझाया है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमें अपनी प्राचीन मर्यादाओं और धार्मिक नियमों को नहीं भूलना चाहिए। ग्रंथों के साथ हमारा व्यवहार अत्यंत संवेदनशील और सम्मानजनक होना चाहिए, ताकि अनजाने में भी हमसे कोई ऐसा अपराध न हो जाए जिससे नकारात्मक ऊर्जा का सामना करना पड़े।

📷 धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते समय बरती जाने वाली सावधानियां
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श्रीमद्भगवत गीता और भगवान श्रीकृष्ण का सीधा संबंध

कथावाचक शिवम साधक महाराज ने अपने प्रवचन के दौरान विशेष रूप से श्रीमद्भगवत गीता का उदाहरण देते हुए इस विषय को बेहद सरल तरीके से समझाया है। उनका कहना है कि जब हम गीता या किसी अन्य पवित्र ग्रंथ का अध्ययन करते हैं, तो अक्सर हमारे सामने बहुत अच्छे श्लोक और विचार आते हैं। हमें लगता है कि इन्हें याद रखने के लिए पेन से लाइन खींच दी जाए या हाईलाइटर चला दिया जाए, ताकि बाद में आसानी से पढ़ा जा सके। लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है।

उन्होंने समझाया कि ग्रंथ और भगवान में कोई अंतर नहीं है। श्रीमद्भगवत गीता कोई साधारण पुस्तक नहीं है, बल्कि यह स्वयं भगवान श्री कृष्ण के श्रीमुख से निकले हुए वचनों का संकलन है। ग्रंथ का प्रत्येक शब्द साक्षात कृष्ण का स्वरूप है। ऐसे में यदि हम ग्रंथ के पन्नों पर पेन चलाते हैं, तो उसका सीधा सा मतलब यह निकलता है कि हम भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद अथवा उनके हृदय पर पेन चला रहे हैं। यह भगवान के प्रति अनादर की श्रेणी में आता है, जिसके कारण अनजाने में ही बहुत बड़ा दोष लग सकता है।

संतों और कथावाचकों का हमेशा से यह मानना रहा है कि धार्मिक पुस्तकों के साथ हमारा जुड़ाव मानसिक और वैचारिक होना चाहिए, भौतिक रूप से उन्हें नुकसान पहुँचाने वाला नहीं। शास्त्रों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि पवित्र पुस्तकों को बहुत संभालकर, साफ-सुथरे हाथों से और उचित स्थान पर रखना चाहिए। उन पर किसी भी प्रकार के निशान लगाना या उन्हें गंदा करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है, क्योंकि इससे हमारी आस्था और भक्ति कमजोर होती है।

कथावाचक शिवम साधक महाराज की दो टूक चेतावनी

अपनी कथा के दौरान शिवम साधक महाराज ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिकता के चक्कर में लोग अपनी परंपराओं के मूल नियमों को भूलते जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि कई कथाओं और धार्मिक साक्ष्यों में यह देखने को मिलता है कि यदि किसी भक्त ने गलती से भी ग्रंथ पर पेन या पेंसिल चला दी, तो इसे ठाकुर जी के प्रति अपराध माना गया। यह विषय केवल एक साधारण नियम का नहीं, बल्कि हमारी गहरी आस्था और भगवान के प्रति प्रेम का है।

"शास्त्रों या श्रीमद् भगवत गीता का अध्ययन करते समय अक्सर लोग अच्छे श्लोकों को हाईलाइट कर देते हैं। लेकिन ग्रंथों पर पेन चलाने का मतलब है श्री कृष्ण पर पेन चलाना। वह ग्रंथ क्या है? श्रीमद भगवत गीता क्या है? श्री कृष्ण ही हैं, क्योंकि कृष्ण के मुखारविंद से प्रत्येक शब्द निकला है। तो उस पर अगर कोई लाइन आप खींच रहे हैं, तो निश्चित ही आप भगवान के मुखारविंद अथवा हृदय पर लाइन खींच रहे हैं।" — शिवम साधक, कथावाचक

संतों का यह भी कहना है कि आज की पीढ़ी तेजी से सब कुछ डिजिटल या पेपर पर नोट करना चाहती है, जो अच्छी बात है, लेकिन पारंपरिक ग्रंथों के मामले में हमें अपनी सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अनजाने में भी ऐसा करता है, तो उसे तुरंत अपनी इस आदत में सुधार कर लेना चाहिए। भगवान के प्रति समर्पण का भाव तभी सार्थक होता है जब हम उनके द्वारा बताए गए नियमों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करते हैं।

धार्मिक मान्यताएं कहती हैं कि हर वस्तु की एक ऊर्जा होती है। जब हम ग्रंथों का सम्मान करते हैं, तो हमारे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके विपरीत, यदि हम ग्रंथों का अनादर करते हैं या उनके रख-रखाव में लापरवाही बरतते हैं, तो जीवन में कई प्रकार की मानसिक और पारिवारिक अड़चनें आने लगती हैं। इसलिए संतों की इन बातों को अपने जीवन में उतारना बेहद आवश्यक है।

महत्वपूर्ण बातों को याद रखने का सही और पारंपरिक तरीका

अब सवाल यह उठता है कि यदि पढ़ते समय कोई बात बहुत अच्छी लग जाए और उसे याद रखना पड़े, तो क्या किया जाए? इस बारे में भी कथावाचक शिवम साधक ने बहुत ही सुंदर और व्यावहारिक समाधान बताया है। उनका कहना है कि यदि आपको कोई श्लोक, चौपाइ या अच्छी बात आकर्षित करती है और आपको ऐसा लगता है कि आप उसे भूल सकते हैं, तो उसका एक बहुत ही आसान विकल्प मौजूद है।

आपको कभी भी उस अच्छी बात को सीधे ग्रंथ के पन्नों पर पेन से नहीं लिखना चाहिए। इसके बजाय, आप एक अलग से डायरी, नोटबुक या सादा कागज का टुकड़ा अपने पास रख सकते हैं। उस कागज पर आप अपनी जरूरत की बात, श्लोक या उसका अर्थ आसानी से नोट कर सकते हैं। इस प्रकार आपकी जरूरत भी पूरी हो जाएगी और पवित्र ग्रंथ पर पेन चलाने का दोष भी नहीं लगेगा।

इसके साथ ही, संतों का यह भी कहना है कि सबसे उत्तम तरीका यह है कि आप उस अच्छी बात को अपने मन और आचरण में उतार लें। जो ज्ञान हमारे जीवन को बेहतर बना दे, उसे केवल पन्नों पर कैद करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वह हमारे दैनिक व्यवहार में झलकना चाहिए। यदि कोई बात आपके दिल और दिमाग में बैठ गई, तो आपको उसे बार-बार देखने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

निष्कर्ष: शास्त्रों के नियमों का पालन और हमारी जिम्मेदारी

अंत में यही कहा जा सकता है कि धर्म और आध्यात्मिकता का संबंध हमारी श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा हुआ है। आधुनिक दुनिया की भागदौड़ में भले ही हमारे तौर-तरीके बदल गए हों, लेकिन सनातन संस्कृति के मूल संस्कार और नियम आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पहले हुआ करते थे। धार्मिक ग्रंथों के प्रति आदरभाव रखना हर आस्तिक व्यक्ति का कर्तव्य है।

कथावाचक शिवम साधक द्वारा दी गई यह सीख हमें यह याद दिलाती है कि छोटी-छोटी बातें हमारे जीवन पर बड़ा असर डालती हैं। अगली बार जब भी आप श्रीमद्भगवत गीता या रामायण का पाठ करें, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें। ग्रंथों को सुरक्षित रखें, साफ-सुथरे स्थान पर रखें और यदि कोई पंक्ति अच्छी लगे तो उसे अलग कागज पर उतारें, लेकिन ग्रंथ पर भूलकर भी पेन न चलाएं। इसी में हमारी और हमारे संस्कारों की भलाई है।

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