रांची में जनजाति संवाद के बाद गरमाई सियासत
जनवरी 2026 के आखिरी सप्ताह में रांची, झारखंड में आयोजित एक द्विदिवसीय जनजाति संवाद कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने देश भर के सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरना कोई अलग धर्म नहीं, बल्कि एक प्राचीन पूजा पद्धति है। उन्होंने हिंदू धर्म की परिभाषा को बेहद व्यापक और समावेशी बताते हुए कहा कि यह किसी एक विशेष पूजा पद्धति या रीति-रिवाज का नाम नहीं है, बल्कि साथ मिलकर रहने और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलने की एक जीवन पद्धति है।
आरएसएस प्रमुख के इस बयान के बाद झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में बयानों का दौर शुरू हो गया। एक तरफ जहां विपक्षी दलों और सरना संगठनों ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे आदिवासियों की स्वतंत्र पहचान को मिटाने का प्रयास बताया, वहीं दूसरी तरफ कई जनजातीय नेताओं ने इसका समर्थन किया। समर्थकों का तर्क है कि आदिवासी समाज सदियों से सनातन संस्कृति के साथ जुड़ा रहा है और दोनों के बीच अटूट सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध हैं। इस बहस ने एक बार फिर आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान और सनातन धर्म के साथ उनके रिश्तों को लेकर चल रही लंबी चर्चा को केंद्र में ला खड़ा किया है।
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सरना पूजा पद्धति और इतिहास की अनकही परतें
धार्मिक पहचान के रूप में 'सरना' शब्द का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, बल्कि इसका संगठित रूप से उदय 1930 के दशक के दौरान हुआ था। छोटा नागपुर क्षेत्र, जो आज के झारखंड राज्य के अंतर्गत आता है, वहां इस शब्द को एक सामूहिक धार्मिक पहचान के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया गया। भाषाई आधार पर देखें तो 'सरना' शब्द मूल रूप से मुंडारी भाषा के शब्द 'सरसे' से निकला है, जिसका शाब्दिक अर्थ पवित्र साल वृक्षों का झुरमुट होता है। परंपरागत रूप से यह शब्द आदिवासियों के मुख्य पूजा स्थल को संदर्भित करता है, जिसे स्थानीय भाषा में 'सरना स्थल' कहा जाता है।
हालांकि यह मूल रूप से मुंडारी भाषा का शब्द है, लेकिन समय के साथ उरांव, हो और संथाल जैसे अन्य प्रमुख जनजातीय समुदायों ने भी इसे अपनी सामूहिक धार्मिक पहचान के रूप में अपना लिया। सरकारी दस्तावेजों और जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1970 के दशक से आदिवासियों ने अपनी धार्मिक पहचान के रूप में 'सरना' दर्ज कराना शुरू किया। वर्ष 1971 की जनगणना के दौरान पहली बार लगभग तीन लाख लोगों ने स्वयं को सरना धर्मावलंबी बताया था। इसके बाद से यह पहचान लगातार मजबूत होती गई और आज यह झारखंड की राजनीति का एक बेहद अहम मुद्दा बन चुका है।
सरना धर्म कोड की मांग और राजनीतिक उठापटक
झारखंड और आसपास के आदिवासी बहुल राज्यों में अलग 'सरना धर्म कोड' की मांग काफी पुरानी है। इसकी औपचारिक शुरुआत 1980 के दशक में तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के लोहरदगा संसदीय क्षेत्र के सांसद रहे कार्तिक उरांव द्वारा की गई थी। उनका मानना था कि आदिवासी समाज की संस्कृति, पूजा-पद्धति और जीवनशैली अन्य मुख्यधारा के धर्मों से अलग है, इसलिए उनकी एक स्वतंत्र और स्पष्ट प्रशासनिक पहचान होनी चाहिए ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं और संवैधानिक अधिकारों का सही लाभ मिल सके।
समय के साथ यह मांग और अधिक मुखर होती गई। वर्तमान समय में झारखंड के विभिन्न आदिवासी संगठन और राजनीतिक दल आगामी जनगणना में आदिवासियों के लिए एक अलग 'सरना धर्म कोड' का कॉलम जोड़ने की जोरदार मांग कर रहे हैं। आधिकारिक रूप से अभी तक इसे केंद्र सरकार द्वारा एक स्वतंत्र धर्म के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, जिसके चलते जनगणना के दौरान सरना मानने वाले लोग खुद को या तो हिंदू या अन्य श्रेणी में दर्ज कराने के लिए मजबूर होते हैं। इसी प्रशासनिक और वैचारिक कशमकश के बीच आरएसएस प्रमुख का यह बयान आया है, जिसमें उन्होंने सरना को सनातन का अभिन्न अंग बताया है।
प्रकृति पूजा और सनातन परंपराओं की गहरी समानताएं
सरना और सनातन धर्म के आपसी संबंधों को लेकर विद्वानों और समाजशास्त्रियों के बीच दो अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। एक पक्ष का मानना है कि सरना एक पूरी तरह से स्वतंत्र, प्रकृति-आधारित धर्म है, जिसमें किसी प्रकार की मूर्ति पूजा का विधान नहीं है। इन समुदायों में वेदों, उपनिषदों जैसे लिखित धर्मग्रंथों के बजाय मौखिक परंपराओं का महत्व होता है। इसके अलावा, इनमें हिंदू धर्म जैसी जटिल वर्ण व्यवस्था या जातिगत श्रेणियां नहीं पाई जाती हैं। कई आदिवासी समुदायों में अंतिम संस्कार के दौरान शवों को जलाने के बजाय दफनाने की परंपरा है, जो इसे अन्य सनातन पद्धतियों से थोड़ा अलग करती है।
दूसरी तरफ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कई अन्य सांस्कृतिक संगठनों का तर्क है कि सरना और सनातन में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। उनका मानना है कि सरना वास्तव में सनातन धर्म का ही एक वनवासी और प्राचीन रूप है। प्राचीन ऋषि-मुनियों की 'अरण्य संस्कृति' (जंगलों में रहने और अध्ययन करने की परंपरा) इसी का हिस्सा रही है। सनातन धर्म में भी पीपल, तुलसी, पर्वत, नदियां और सूर्य-चंद्रमा जैसी प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करने का सदियों पुराना विधान रहा है। दोनों ही संस्कृतियों के मूल मूल्य, आध्यात्मिक दृष्टिकोण और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव एक जैसा ही है।
"सरना कोई अलग धर्म नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की ही एक प्राचीन और पवित्र जीवन पद्धति है। प्रकृति के हर रूप में ईश्वर को देखना और उसकी पूजा करना ही हमारा साझा इतिहास और मूल्य है। समाज को तोड़ने के लिए इसे अलग धर्म के रूप में पेश किया जा रहा है।" — मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
लोक-संस्कृति, देवी-देवता और मेल खाती जीवनशैली
जमीनी स्तर पर अगर झारखंड और आदिवासी इलाकों की संस्कृति का अध्ययन किया जाए, तो सनातन और सरना परंपराओं के बीच एक गहरी और अटूट सांस्कृतिक घुलनशीलता दिखाई देती है। अनेक जनजातीय नेताओं और बुजुर्गों का कहना है कि वे पीढ़ियों से रामनवमी, महाशिवरात्रि, होली और दुर्गा पूजा जैसे हिंदू पर्वों में पूरी आस्था और उल्लास के साथ भाग लेते आए हैं। कई आदिवासी घरों के आंगन में तुलसी का चबूतरा होता है और वहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।
सरना धर्म मानने वाले लोग भी एक सर्वोच्च शक्ति की पूजा करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'थान' कहा जाता है। इसके साथ ही, आदिवासी समुदाय में भगवान शिव को 'बड़ा देव' और देवी को 'जगत जननी' के रूप में अत्यंत आदर के साथ पूजा जाता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आदिवासी संस्कृति और सनातन धर्म की जड़ें एक ही सांस्कृतिक और दार्शनिक जमीन से जुड़ी हुई हैं।
निष्कर्ष और आगे की राह
आज के दौर में जब वैचारिक और राजनीतिक कारणों से पहचान की राजनीति अपने चरम पर है, तब सरना और सनातन के संबंधों को लेकर चल रही यह बहस बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। एक तरफ जहां आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान, संस्कृति और अधिकारों की सुरक्षा के लिए 'सरना कोड' की मांग पर अडिग है, वहीं दूसरी तरफ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकार इसे सनातन परिवार का ही एक पूरक हिस्सा मानते हैं। जरूरत इस बात की है कि बिना किसी राजनीतिक नफे-नुकसान के, आदिवासी समाज की भावनाओं और उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता का पूरा सम्मान करते हुए एक संतुलित संवाद स्थापित किया जाए, ताकि सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारा हमेशा बना रहे।



