द फ्रीलान्स की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। टेनिस कोर्ट पर अजेय माने जाने वाले 'जोकर' यानी नोवाक जोकोविच का सफर इन दिनों खेल प्रेमियों और विश्लेषकों दोनों के लिए गहरी चिंता और आश्चर्य का विषय बना हुआ है। एक तरफ जहां कुछ महीनों पहले उन्होंने विंबलडन के मैदान पर 5 घंटे 15 मिनट की मैराथन जंग जीतकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया था, वहीं दूसरी ओर फ्लशिंग मीडोज यानी यूएस ओपन के कोर्ट पर उनका रोते हुए बाहर होना इस खेल के एक स्वर्णिम युग के मद्धम पड़ने का संकेत देता है।
विंबलडन की वह ऐतिहासिक मैराथन और शारीरिक सहनशक्ति की पराकाष्ठा
कुछ समय पहले तक सब कुछ सामान्य और जोकोविच के पक्ष में नजर आ रहा था। विंबलडन के सेमीफाइनल मुकाबले में उन्होंने जिस अदम्य साहस और मानसिक दृढ़ता का परिचय दिया, उसकी मिसाल कम ही मिलती है। पांच घंटे से अधिक चले उस मुकाबले में उन्होंने अपनी फिटनेस और तकनीक का लोहा मनवाया। ऐसा लगा था कि जोकोविच अभी कई साल तक टेनिस की दुनिया पर एकछत्र राज करेंगे। लेकिन खेल का मैदान कब पासा पलट दे, यह कोई नहीं जानता।
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यूएस ओपन 2024: दर्द, आंसू और कोर्ट पर उल्टियां
खेल इतिहास में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 24 बार के ग्रैंड स्लैम चैंपियन नोवाक जोकोविच को किसी टूर्नामेंट के पहले ही दौर में इस तरह घुटने टेकने पड़ेंगे। यूएस ओपन के दौरान उनकी शारीरिक स्थिति बेहद खराब नजर आई। कोर्ट पर उन्हें उल्टियां हुईं, चिकित्सकीय मदद (दवा) लेनी पड़ी और अंततः असहनीय शारीरिक पीड़ा व आंखों में आंसू के साथ उन्होंने अर्जेंटीना के मारियानो नावोन के खिलाफ मैच से त्रस्त होकर विदाई ली। दुनिया के 49वीं रैंकिंग वाले खिलाड़ी के खिलाफ इस तरह हारना हर किसी को झकझोर गया।
8,736 दिन बाद एटीपी टॉप-10 से बाहर: एक युग का अंत या विराम?
सांख्यिकी के आईने में देखें तो यह सिर्फ एक हार या टूर्नामेंट से बाहर होना नहीं है। लगातार 8,736 दिनों तक मेंस टेनिस की एटीपी रैंकिंग के शीर्ष-10 में बने रहने वाले जोकोविच का इस प्रतिष्ठित दायरे से बाहर होना इस बात का प्रमाण है कि उम्र, चोटें और लगातार खेल का दबाव अब उन पर असर डाल रहा है। यह आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि खेल जगत में कोई भी शाश्वत नहीं है।
भविष्य की राह और जोकोविच का मानसिक दृढ़ संकल्प
फीड रिपोर्टिंग और खेल विशेषज्ञों से बातचीत के दौरान यह बात उभरकर सामने आई है कि जोकोविच को कम आंकना भूल होगी। हालांकि शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं दे रहा है और उम्र के इस पड़ाव पर रिकवरी धीमी हो गई है, लेकिन उनकी लड़ने की इच्छाशक्ति आज भी उतनी ही मजबूत है। क्या वे इस झटके से उबरकर कोर्ट पर जोरदार वापसी कर पाएंगे या टेनिस इतिहास का यह अध्याय अब अपने अंतिम चरण में है? यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।








