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राज्यपढ़ने में समय: 3 मिनट

रणथंभौर के जंगलों में तकनीक का कमाल: आबादी की तरफ बढ़ते ही लेपर्ड की आहट पर बजेगा अलार्म, इंसान और वन्यजीव संघर्ष रोकने की अनोखी पहल

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को रोकने के लिए वन विभाग ने एक अनोखी तकनीक का ट्रायल शुरू करने का फैसला किया है। इसके तहत लेपर्ड की आवाजाही ट्रैक करने के लिए हाई-टेक सेंसर और साइलेंट डिवाइस लगाए जाएंगे, जिससे आबादी तक पहुंचने से पहले ही ग्रामीणों को अलर्ट मिल सके।
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राज्य एवं प्रादेशिक ब्यूरो, द फ्रीलांस
प्रादेशिक एवं राज्य ब्यूरो•8 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•43
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रणथंभौर के जंगलों में तकनीक का कमाल: आबादी की तरफ बढ़ते ही लेपर्ड की आहट पर बजेगा अलार्म, इंसान और वन्यजीव संघर्ष रोकने की अनोखी पहल
📷 रणथंभौर के जंगलों में तकनीक का कमाल: आबादी की तरफ बढ़ते ही लेपर्ड की आहट पर बजेगा अलार्म, इंसान और वन्यजीव संघर्ष रोकने की अनोखी पहल — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • राजस्थान में पहली बार रणथंभौर टाइगर रिजर्व में लेपर्ड की निगरानी के लिए हाई-टेक सेंसर और साइलेंट डिवाइस का ट्रायल किया जा रहा है।
  • केरल के सफल मॉडल से प्रेरित होकर वन विभाग ने इस तकनीक को अपनाया है, जिसका उद्देश्य हाथियों और वन्यजीवों की तर्ज पर लेपर्ड की हलचल ट्रैक करना है।
  • फलोदी रेंज के दूमोंदा, हिंदवाड़ और टोडरा जैसे संवेदनशील इलाकों को प्राथमिकता के आधार पर चिह्नित किया गया है।

रणथंभौर में अब सिर्फ बाघों की दहाड़ पर ही नजर नहीं रहेगी, बल्कि जंगल में घूम रहे लेपर्ड की हर हलचल को भी आधुनिक तकनीक के जरिए ट्रैक किया जाएगा। सवाई माधोपुर स्थित रणथंभौर टाइगर रिजर्व में इंसानों और वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग एक नई तकनीक का ट्रायल करने जा रहा है। इसके तहत लेपर्ड की निगरानी के लिए साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर लगाए जाएंगे।

केरल की तर्ज पर रणथंभौर में पहली बार ट्रायल

इस तकनीक की खास बात यह होगी कि अगर कोई लेपर्ड जंगल से निकलकर आबादी वाले इलाके की ओर बढ़ता है, तो सिस्टम के जरिए तुरंत अलर्ट जारी किया जा सकेगा। तेज अलार्म की आवाज सुनकर ग्रामीणों को समय रहते सतर्क होने का मौका मिलेगा, साथ ही वन विभाग को भी वन्यजीव की गतिविधि का सटीक पता चल सकेगा।

वन विभाग के मुताबिक, रणथंभौर में साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर का इस्तेमाल राजस्थान के किसी टाइगर रिजर्व में पहली बार किया जा रहा है। देश में केरल में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल वन्यजीवों की निगरानी और ग्रामीणों को अलर्ट करने के लिए सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इसी मॉडल को देखते हुए रणथंभौर में इसका ट्रायल शुरू करने की पूरी तैयारी कर ली गई है।

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संवेदनशील इलाकों की पहचान और प्राथमिकता

रणथंभौर टाइगर रिजर्व के आसपास बड़ी संख्या में गांव और आबादी वाले क्षेत्र बसे हुए हैं। जंगल की सीमा से सटे इलाकों में वन्यजीवों की आवाजाही आम बात है और कई बार लेपर्ड सीमा लांघकर रिहायशी इलाकों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में इंसानों और वन्यजीवों के आमने-सामने आने का खतरा हमेशा बना रहता है।

वन विभाग ने उन संवेदनशील इलाकों की पहचान शुरू कर दी है, जहां लेपर्ड की आवाजाही सबसे ज्यादा रहती है। पुराने शहर के आसपास के इलाकों के अलावा फलोदी रेंज के दूमोंदा, हिंदवाड़ और टोडरा को प्राथमिकता सूची में रखा गया है। इन इलाकों में जंगल से आबादी की ओर आने वाली मुख्य पगडंडियों और कच्चे रास्तों पर ये सेंसर लगाए जाएंगे।

टकराव टालने में मददगार साबित होगी तकनीक

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में करीब 170 से अधिक लेपर्ड मौजूद हैं। इतनी बड़ी संख्या के कारण रिजर्व के आसपास उनकी गतिविधियां लगातार बनी रहती हैं। डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि केरल मॉडल के आधार पर यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो इसे अन्य पैराफेरी क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा। इस तकनीक से न सिर्फ इंसानों को चेतावनी मिलेगी, बल्कि अलार्म की आवाज से लेपर्ड भी डरकर वापस जंगल की ओर लौट सकेगा।

डिस्क्लेमर एवं साभार

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल इस वीडियो के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो साभार: संबंधित सोशल मीडिया हैंडल / क्रिएटर।

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राज्य एवं प्रादेशिक ब्यूरो, द फ्रीलांस

सत्यापित संपादकीय डेस्क

उत्तर प्रदेश व प्रादेशिक विकास रिपोर्टिंग टीम

द फ्रीलांस का प्रादेशिक ब्यूरो उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के जमीनी मुद्दों, विकास योजनाओं, प्रशासनिक कार्रवाइयों और ग्रामीण-शहरी समस्याओं की निष्पक्ष और वास्तविक रिपोर्टिंग करता है। हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की जाती है।

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