नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के विभिन्न राज्यों में इन दिनों राजस्व विभाग और खासकर तहसीलदार कार्यालय लोगों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बने हुए हैं। गूगल ट्रेंड्स पर अचानक 'तहसीलदार' शब्द को लेकर भारी सर्च देखा गया है। लोग जमीन की पैमाइश, दाखिल-खारिज यानी म्यूटेशन और जाति-आय प्रमाण पत्रों के लिए चक्कर काट रहे हैं। आम आदमी पार्टी के छोटे से लेकर बड़े कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के धक्के खाने को मजबूर है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब जमीनी स्तर पर पड़ताल की तो पता चला कि कामकाज की सुस्ती सबसे बड़ी समस्या है।
राजस्व मामलों से जुड़े इन दफ्तरों में बिचौलियों और दलालों का बोलबाला आज भी एक कड़वी सच्चाई बना हुआ है। किसानों और आम नागरिकों का आरोप है कि बिना रिश्वत दिए कोई भी फाइल आगे नहीं बढ़ती है। ऑनलाइन पोर्टल शुरू होने के बावजूद जमीनी हकीकत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। सर्वर डाउन होने का बहाना बनाकर फाइलों को महीनों लटकाया जाता है। तहसील कार्यालयों के बाहर खड़े लोगों के चेहरों पर साफ निराशा देखी जा सकती है जो सुबह से अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं।
तहसीलदार कार्यालयों में बढ़ रही हैं आम लोगों की मुश्किलें
जमीन की खरीद-फरोख्त और वारिसान दर्ज कराने के मामलों में सबसे ज्यादा पेचीदगियां सामने आ रही हैं। एक साधारण से म्यूटेशन के लिए भी लोगों को महीनों तक तहसील के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कई मामलों में तो मृत व्यक्तियों की जमीन जीवित लोगों के नाम दर्ज करने या फर्जी कागजात बनाने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। इन शिकायतों के बाद राज्य सरकारों ने कुछ जिलों में औचक निरीक्षण तेज कर दिए हैं। कई भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई भी की गई है।
स्थानीय स्तर पर काम करने वाले पटवारी और अमीन सीधे तौर पर तहसीलदार के अधीन आते हैं। मैदानी रिपोर्ट के अनुसार, पटवारी स्तर पर ही फाइलें सबसे ज्यादा अटकती हैं जब तक कि कोई तयशुदा रकम न पहुंचाई जाए। आम जनता अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यमों से अपनी इन परेशानियों को खुलकर साझा कर रही है। यही वजह है कि इंटरनेट पर इस पद और इससे जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर अचानक खोज बहुत तेजी से बढ़ गई है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर इन गड़बड़ियों पर लगाम लगाने के लिए प्रशासन क्या कदम उठा रहा है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रशासन की सख्त होती कार्रवाई
बढ़ती शिकायतों को देखते हुए राज्य के राजस्व आयुक्त और जिलाधिकारियों ने कड़े निर्देश जारी किए हैं। सभी तहसीलदारों को यह साफ कह दिया गया है कि वे अपने दफ्तरों में पारदर्शिता बनाए रखें। लंबित मामलों की साप्ताहिक समीक्षा बैठकें की जा रही हैं ताकि जनता को समय पर न्याय मिल सके। एंटी करप्शन ब्यूरो यानी एसीबी की टीमें भी अब सक्रिय हो गई हैं और रंगे हाथों रिश्वत लेते अधिकारियों को दबोचा जा रहा है। इन छापों के बाद से भ्रष्ट तंत्र में हड़कंप मचा हुआ है और बाबू लोग अब संभलकर काम कर रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जमीन का मालिकाना हक तय करने में तहसीलदार की भूमिका सबसे अहम होती है। जब तक प्रशासनिक अधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं लाएंगे, तब तक आम जनता की परेशानियां कम नहीं होंगी। सरकार भले ही डिजिटल इंडिया और पेपरलेस वर्क के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर फाइलों का सफर अभी भी बहुत लंबा है। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक आम आदमी का शोषण ऐसे ही जारी रहेगा।
पारदर्शिता और डिजिटल सुधारों की कितनी है जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए नियम बनाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा जब तक सख्त सजा का प्रावधान लागू न हो। डिजिटल भूमि रिकॉर्ड को पूरी तरह से फूल-प्रूफ बनाना होगा ताकि कोई भी उसमें आसानी से फेरबदल न कर सके। जनता को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा ताकि वे किसी भी अवैध मांग के खिलाफ आवाज उठा सकें। आने वाले दिनों में प्रशासन की इन कार्रवाइयों का क्या असर होता है, इस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।












