देश का अन्नदाता हमेशा से ही मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितताओं के बीच पिसता रहा है। खासकर जब बात नकदी फसलों की आती है, तो किसानों का संघर्ष और भी अधिक बढ़ जाता है। उत्तर प्रदेश में इस साल आलू की खेती करने वाले किसानों के सामने एक ऐसा ही गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है, जिसने उनकी नींद उड़ा दी है। फसल की कटाई के समय उचित दाम न मिलने की उम्मीद में किसानों ने अपने पसीने की कमाई को कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित रख दिया था, लेकिन बाजार के मौजूदा हालात ने उन्हें गहरे संकट में डाल दिया है।
आमतौर पर प्रदेश के विभिन्न जिलों में किसान मार्च के महीने में आलू की खुदाई करने के बाद उसे शीतगृहों में रख देते हैं। इसके पीछे उनकी मूल मंशा यही होती है कि जब आने वाले महीनों में बाजार में मांग बढ़ेगी और कीमतें सुधरेंगी, तब वे अपनी उपज बेचकर बेहतर मुनाफा कमा सकेंगे। लेकिन इस सीजन में हालात इसके बिल्कुल विपरीत साबित हुए। मंडियों में आलू के दाम लगातार लुढ़कते चले गए, जिसके कारण किसानों के लिए अपनी लागत निकाल पाना भी दूभर हो गया है।
बाजार में भाव धड़ाम, किसानों के सामने दोहरी मार
वर्तमान समय में खुले बाजार में आलू की कीमतें गिरकर करीब 10 रुपये प्रति किलो के आसपास सिमट गई हैं। कई इलाकों में तो हालात इतने बदतर हैं कि बाजार भाव से मिलने वाली कुल रकम कोल्ड स्टोरेज का किराया चुकाने के लिए भी नाकाफी साबित हो रही है। इटावा और बिजनौर जैसे प्रमुख कृषि जिलों से मिल रही रिपोर्ट्स के अनुसार, किसानों को एक क्विंटल आलू बेचने पर जितनी राशि मिल रही है, उससे अधिक तो शीतगृह का भंडारण शुल्क बन रहा है। ऐसे में परिवहन, मजدूरी और ढुलाई का खर्च जोड़ने पर किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
यही मुख्य वजह है कि इस बार अक्टूबर का महीना बीतने को है, लेकिन इसके बावजूद कोल्ड स्टोरेज में भारी मात्रा में आलू का पुराना स्टॉक जस का तस रखा हुआ है। बिजनौर जिले की ही बात करें तो यहां लगभग 4 हजार हेक्टेयर भूमि पर बड़े पैमाने पर आलू का उत्पादन होता है। यहां के विभिन्न शीतगृहों जैसे किरतपुर, नजीबाबाद, नहटौर और चांदपुर के कोल्ड स्टोरेज में अभी भी सैकड़ों मीट्रिक टन आलू का स्टॉक बचा हुआ है, जिसे निकालने का साहस किसान नहीं जुटा पा रहे हैं।
शीतगृहों में फंसा स्टॉक और बढ़ता वित्तीय बोझ
राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बने कोल्ड स्टोरेज इन दिनों किसानों के बेचे न जा सकने वाले आलू से पटे पड़े हैं। इटावा जिले का उदाहरण लें तो वहां के 58 कोल्ड स्टोरेज में इस साल छह लाख मीट्रिक टन से अधिक आलू का बंपर भंडारण किया गया था। सीजन के शुरुआती महीनों में निकासी की रफ्तार बेहद धीमी रही और अक्टूबर के मध्य तक भी करीब आधा स्टॉक शीतगृहों के भीतर ही बंद पड़ा रहा। किसानों के समक्ष सबसे बड़ी दुविधा यह है कि यदि वे आलू को बाहर निकालते हैं, तो उन्हें भारी घाटा सहना होगा और यदि अंदर छोड़ते हैं, तो भंडारण शुल्क का बोझ लगातार बढ़ता जाएगा।
अनेक किसानों के सामने तो अब अपनी ही फसल को शीतगृहों में ही छोड़ने या त्याग देने जैसी नौबत आ गई है। खेती में जुताई, बीज, खाद, सिंचाई और कीटनाशकों पर पहले ही हजारों-लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं। ऊपर से कोल्ड स्टोरेज का भारी-भरकम किराया किसानों की कमर तोड़ रहा है। इस गंभीर आर्थिक संकट ने खेती-किसानी की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत असर पड़ने लगा है.
"फसल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन जब बेचने का वक्त आता है तो बाजार भाव लागत भी नहीं निकलने देता। कोल्ड स्टोरेज का किराया हमारी जेब पर भारी पड़ रहा है, ऐसे में सरकार की यह सहायता थोड़ी राहत जरूर देगी।" — रामस्वरूप सिंह, प्रगतिशील किसान
उत्तर प्रदेश सरकार की नई पहल और अनुदान योजना
अन्नदाताओं की इस दयनीय स्थिति को संज्ञान में लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य प्रशासन ने आलू उत्पादक किसानों को इस दोहरी मार से उबारने के लिए एक विशेष योजना का ऐलान किया है। इस योजना के प्रावधानों के तहत, जो किसान अपनी फसल को कोल्ड स्टोरेज से बाहर निकालेंगे, उन्हें वित्तीय सहायता के रूप में अधिकतम 20 हजार रुपये तक का अनुदान दिया जाएगा। इस आर्थिक मदद का सीधा उद्देश्य भंडारण और परिवहन के बढ़ते खर्च से जूझ रहे किसानों के वित्तीय बोझ को कम करना है।
सरकार की इस कल्याणकारी पहल से उन किसानों को बड़ी संबल मिलने की उम्मीद है, जिनका आलू भारी मात्रा में शीतगृहों में फंसा हुआ है। अनुदान की यह राशि सीधे पात्र किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर की जाएगी, ताकि वे बिना किसी अतिरिक्त मानसिक दबाव के अपनी उपज को बाजार तक पहुंचा सकें या उचित प्रबंध कर सकें।
योजना का लाभ लेने के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया
यदि आप भी उत्तर प्रदेश के एक ऐसे ही आलू उत्पादक किसान हैं और अपनी फसल को लेकर चिंतित हैं, तो आपके लिए इस योजना का लाभ उठाने का सुनहरा अवसर है। राज्य उद्यान विभाग ने इसके लिए एक पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था तैयार की है। योजना का लाभ प्राप्त करने के इच्छुक किसान उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग के आधिकारिक ऑनलाइन पोर्टल potato.uphorticulture.in पर जाकर अपना पंजीकरण करवा सकते हैं।
आवेदन करने से पहले किसानों को सलाह दी जाती है कि वे पोर्टल पर जाकर अपनी पात्रता, आवश्यक दस्तावेजों की सूची और अंतिम तिथि की पूरी जानकारी अच्छी तरह जांच लें। समय पर आवेदन पूरा करने से न सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया आसान होती है, बल्कि अनुदान राशि का भुगतान भी समयबद्ध तरीके से हो जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी मदद समय पर मिलने से किसानों का मनोबल बढ़ेगा और वे आगामी सीजन की तैयारी पूरी ऊर्जा के साथ कर सकेंगे।












