उमर अब्दुल्ला सरकार का बड़ा फैसला: जम्मू-कश्मीर में आवारा कुत्तों की समस्या पर कसेगा शिकंजा
जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से आम नागरिकों और राहगीरों के लिए सिरदर्द बन चुके आवारा कुत्तों के मुद्दे पर अब प्रशासन ने सख्त और निर्णायक कदम उठाने का फैसला किया है। प्रदेश में आवारा कुत्तों की बेकाबू होती आबादी को नियंत्रित करने के लिए उमर अब्दुल्ला सरकार ने एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) कार्यक्रम का दायरा पूरे राज्य में फैलाने की व्यापक योजना तैयार की है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य न केवल कुत्तों की संख्या को सीमित करना है, बल्कि रेबीज जैसी खतरनाक बीमारियों के खतरे को कम करते हुए आम जनता को सुरक्षित माहौल देना भी है।
आंकड़ों के मुताबिक, पूरे केंद्र शासित प्रदेश में इस समय आवारा कुत्तों की संख्या लगभग 1.53 लाख आंकी गई है। इतनी बड़ी आबादी के प्रबंधन के लिए पुराने और सीमित तरीकों से काम नहीं चल पा रहा था, जिसके चलते अब इसे एक सुनियोजित और बड़े पैमाने पर लागू करने की रणनीति पर काम शुरू हो चुका है। सरकार का यह कदम शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण अंचल तक के लोगों को राहत देने वाला साबित होगा, जहां आवारा कुत्तों के काटने और झुंड बनाकर हमला करने की घटनाएं अक्सर चिंता का विषय बनी रहती हैं।
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यह पूरी नीतिगत पहल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुपालन के तहत आगे बढ़ रही है। इस योजना की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने इस पूरे अभियान की उच्च स्तरीय समीक्षा की है। प्रशासन ने पिछले कुछ महीनों में नसबंदी और टीकाकरण की गति में उल्लेखनीय तेजी लाई है, जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं।
अधिकारियों का मानना है कि यदि इस अभियान को इसी रफ्तार से और व्यवस्थित तरीके से चलाया जाए, तो आने वाले कुछ वर्षों में आवारा कुत्तों की आबादी पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण पाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता के मेल से इस गंभीर सामाजिक समस्या का एक स्थायी और मानवीय समाधान खोजने की दिशा में काम किया जा रहा है, जिससे पशु प्रेमियों और आम नागरिकों दोनों के हितों का संतुलन बना रहे।
जिला स्तर तक पहुंचाई जाएगी व्यवस्था: 13 जिलों में जमीन चिन्हित
अभी तक आवारा कुत्तों के नियंत्रण और नसबंदी के केंद्र मुख्य रूप से बड़े शहरों जैसे कि जम्मू और श्रीनगर तक ही सिमटे हुए थे। लेकिन अब सरकार ने इस व्यवस्था को विकेंद्रीकृत करते हुए जिला और ग्रामीण स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया है। नई योजना के तहत प्रदेश के 13 जिलों में नए एबीसी केंद्रों के निर्माण के लिए जमीन की पहचान भी कर ली गई है।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो, भगवती नगर, रूपनगर, एसपीसीए चौआदी, तेंगपोरा और सुहामा में कुल पांच केंद्र पहले से ही सुचारू रूप से काम कर रहे हैं। इसके अलावा, चट्टरहामा में एक नए केंद्र का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर जारी है। इन मौजूदा केंद्रों के साथ-साथ अब 20 नए अत्याधुनिक एबीसी केंद्र और विशेष मोबाइल यूनिट्स स्थापित किए जाने की पुख्ता योजना है, जो दूर-दराज के इलाकों में भी जाकर कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण का काम करेंगी।
अब तक कितने कुत्तों की हो चुकी है नसबंदी और वैक्सिनेशन?
प्रशासन द्वारा साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस अभियान के तहत अब तक कुल 68,346 आवारा कुत्तों की सफल नसबंदी की जा चुकी है। इसके साथ ही, रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी के रोकथाम के लिए 80,725 कुत्तों का टीकाकरण भी किया जा चुका है। हालांकि, कुल 1.53 लाख की आबादी को देखते हुए यह आंकड़े अभी शुरुआती चरण जैसे प्रतीत होते हैं, जिन्हें आने वाले दिनों में और अधिक तेजी से पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नसबंदी के साथ-साथ टीकाकरण अभियान का चलना बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे कुत्तों के काटने की स्थिति में इंसानों में फैलने वाले संक्रमण का खतरा लगभग नगण्य हो जाता है। पिछले छह महीनों के दौरान इस मोर्चे पर आई तेजी इस बात का प्रमाण है कि सरकार इस समस्या को लेकर पूरी तरह गंभीर है और कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर धरातल पर परिणाम दिखाने का प्रयास कर रही है।
डिजिटल निगरानी और फीडिंग स्पॉट की नई व्यवस्था
इस पूरे कार्यक्रम को केवल नसबंदी तक ही सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को भी शामिल किया गया है। योजना के तहत आवारा कुत्तों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली का उपयोग किया जाएगा। इसके साथ ही, स्थानीय नगर निकायों के सहयोग से शहर के विभिन्न हिस्सों में 'फीडिंग स्पॉट' भी तय किए जा रहे हैं।
"आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और इससे जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए हमारा प्रशासन पूरी तरह प्रतिबद्ध है। एबीसी कार्यक्रम का विस्तार न केवल शहरी क्षेत्रों बल्कि जिला स्तर पर भी किया जा रहा है, ताकि वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से इस समस्या का स्थाई समाधान निकाला जा सके।" — प्रशासनिक प्रवक्ता, जम्मू-कश्मीर सरकार
फीडिंग स्पॉट तय होने से एक तरफ जहां कुत्तों को नियमित रूप से भोजन मिलने में आसानी होगी, वहीं दूसरी ओर रिहायशी इलाकों और बाजारों में उनके झुंड बनाकर घूमने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा। डिजिटल मॉनिटरिंग से यह भी ट्रैक किया जा सकेगा कि किस क्षेत्र में कितने कुत्तों की नसबंदी हो चुकी है और कहां अभी और काम करने की जरूरत है।
निष्कर्ष: क्या बदलेगा आम जनता का जीवन?
जम्मू-कश्मीर सरकार की यह पहल राज्य के आम नागरिकों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए एक बड़ी राहत साबित हो सकती है, जो अक्सर आवारा कुत्तों के भय के साये में जीने को मजबूर रहते हैं। एनिमल बर्थ कंट्रोल कार्यक्रम का जिला और ग्रामीण स्तर पर विस्तार, नए केंद्रों की स्थापना और आधुनिक तकनीक का समन्वय यह उम्मीद जगाता है कि आने वाले समय में सड़कों पर आवारा पशुओं से जुड़ा खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा।








