राष्ट्रीय हित पर सियासत से परे एक नई बहस
भारतीय राजनीतिक गलियारों में इन दिनों बयानों का दौर पूरी तेजी के साथ चल रहा है। इस बीच केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। रिजिजू ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी की खुलकर सराहना की है। आमतौर पर राजनीतिक मंचों पर एक-दूसरे की नीतियों की तीखी आलोचना करने वाले नेताओं के बीच यह बयान काफी चौंकाने वाला और चर्चा का विषय बना हुआ है।
यह पूरा मामला अमेरिकी टेक अरबपति एलन मस्क और भारत के बीच चल रहे सैटेलाइट इंटरनेट तथा कारोबारी नीतियों से जुड़े विवाद के बाद गर्माया है। हाल ही में एलन मस्क ने भारत में अपनी स्टारलिंक सेवा को मंजूरी मिलने में हो रही देरी को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी पर निशाना साधा था। मस्क के इस तरह के बयानों और टिप्पणियों के बाद देश में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई थीं, जिसमें ओवैसी का रुख काफी आक्रामक और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाला रहा।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसी संदर्भ में अपनी बात रखते हुए एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा कि वैचारिक विरोध और कट्टर नीतियों के बावजूद जब बात देश के सम्मान और संप्रभुता की आती है, तब कुछ लोग समझदारी का परिचय देते हैं। रिजिजू के इस बयान ने विपक्षी दलों के भीतर भी हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि भाजपा ने सीधे तौर पर विपक्ष के कुछ नेताओं को ओवैसी से सीख लेने की नसीहत दे डाली है।
असदुद्दीन ओवैसी का वह बयान जिस पर छिड़ी है चर्चा
विवाद की शुरुआत तब हुई जब एलन मस्क ने भारतीय बाजार और यहां के कारोबारी दिग्गजों को लेकर सोशल मीडिया पर तंज कसे। मस्क की इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने एक कार्यक्रम के दौरान बेहद कड़े शब्दों में आपत्ति जताई थी। उन्होंने साफ कर दिया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर सौ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि किसी बाहरी विदेशी कारोबारी को देश के सर्वोच्च पदों और आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने की छूट दे दी जाए।
ओवैसी ने अपने संबोधन में कहा था कि भारत दुनिया में सबसे सस्ता और सुलभ डेटा अपने नागरिकों को मुहैया करा रहा है। हमारे देश के संसाधन कैसे इस्तेमाल होंगे, यह तय करने का अधिकार सिर्फ भारत का है, न कि किसी बाहरी गोरे कारोबारी का। उन्होंने आगे कहा कि वे हमेशा से प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों के विरोधी रहे हैं और आगे भी रहेंगे, लेकिन जब बात देश के संवैधानिक पदों और राष्ट्रीय स्वाभिमान की आती है, तो वे अपने देश के साथ खड़े नजर आएंगे।
उनके इसी दो टूक और कड़े रुख को देश के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल मानते हुए सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं ने समर्थन किया है। हैदराबाद सांसद के इस बयान ने राजनीतिक पंडितों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि घरेलू राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय संप्रभुता के मामले में कई बार नेता एक मंच पर खड़े दिखाई देते हैं।
किरेन रिजिजू की नसीहत और विपक्ष पर तीखा हमला
ओवैसी के इसी बयान को आधार बनाते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी दलों पर जोरदार राजनीतिक हमला बोला है। अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में रिजिजू ने लिखा कि भले ही वे असदुद्दीन ओवैसी की मुस्लिम-केंद्रित और कट्टर राजनीति का कड़ा विरोध करते हैं, लेकिन जब देश के राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों की बात आती है, तो वे समझदारी भरी बातें करते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि विपक्ष के कुछ नेता सरकार की बात सुनना और समझना नहीं चाहते हैं, तो कम से कम उन्हें ओवैसी के इस राष्ट्रीय दृष्टिकोण से सीख लेनी चाहिए।
रिजिजू ने अपनी पोस्ट के अंत में एक कड़ा वाक्य भी जोड़ा, जिसमें उन्होंने हालिया राजनीतिक गतिविधियों का जिक्र करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी ताकतों या बयानों का समर्थन करने वाले दलों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने लिखा कि अब यह बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि देश के भीतर एंटी-इंडिया गैंग कौन-कौन सक्रिय है और किसे देश के विकास से ज्यादा अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने की पड़ी है।
"कभी-कभी असदुद्दीन ओवैसी भारत के राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों पर समझदारी बातें करते हैं, हालांकि हम उनकी कट्टर नीतियों का विरोध करते हैं। अगर विपक्ष के कुछ नेता हमारी बात नहीं सुनना चाहते, तो उन्हें ओवैसी से सीखना चाहिए।" — किरेन रिजिजू, केंद्रीय मंत्री
एलन मस्क और भारतीय दूरसंचार बाजार का बड़ा संघर्ष
यह पूरी कूटनीतिक और राजनीतिक खींचतान असल में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक और भारतीय टेलीकॉम सेक्टर के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा से जुड़ी हुई है। मस्क लंबे समय से भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू करना चाहते हैं, लेकिन स्पेक्ट्रम आवंटन के तरीकों और नियमों को लेकर उनकी उद्योग जगत के अन्य दिग्गजों के साथ खींचतान जारी है। मस्क ने सोशल मीडिया पर रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और भारतीय बाजार की कार्यप्रणाली को लेकर तंज कसे थे, जिसके बाद यह मामला राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।
भारतीय दूरसंचार क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि भारत में मोबाइल डेटा और इंटरनेट की कीमतें दुनिया के मुकाबले सबसे कम हैं। देश के सुदूर गांवों और कस्बों तक महज कुछ सौ रुपये में उच्च गति का इंटरनेट उपलब्ध कराया जा रहा है। ऐसे में यदि कोई विदेशी कंपनी आकर अपनी प्रीमियम दरों पर सेवाएं देना चाहे, तो आम भारतीय उपभोक्ता के लिए उसकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। रिलायंस और अन्य कंपनियों ने भी साफ कर दिया है कि वे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से कभी पीछे नहीं हटतीं, बशर्ते नियम सभी के लिए समान हों।
राजनीतिक गलियारों में नई सुगबुगाहट
केंद्रीय मंत्री द्वारा एक विरोधी पार्टी के सांसद की इस तरह से सार्वजनिक सराहना किए जाने से देश की सियासत में नए समीकरणों और चर्चाओं को हवा मिल गई है। एक तरफ जहां भाजपा विपक्षी दलों पर देश को अस्थिर करने वाले बयानों और विदेशी ताकतों के साथ सांठगांठ का आरोप लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर विपक्ष के भीतर भी मतभेद नजर आने लगे हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ओवैसी के इस बयान और किरेन रिजिजू की प्रतिक्रिया पर अन्य विपक्षी दल क्या रुख अपनाते हैं। क्या देश के बुनियादी मुद्दों और विदेशी कंपनियों के हस्तक्षेप पर भारतीय राजनीतिक दल एक मंच पर आएंगे या फिर यह बयानबाजी सिर्फ चुनावी लाभ और बयानों की जंग तक ही सिमट कर रह जाएगी, यह समय ही बताएगा।









