नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार दबाव में नजर आ रहा है। रुपया टूटकर 96.31 प्रति डॉलर के नए और निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। बाजार के जानकारों का कहना है कि स्टॉप-लॉस ऑर्डर सक्रिय होने के कारण डॉलर में अचानक तेज उछाल देखने को मिला है। निवेशकों और कारोबारियों के बीच इस बड़ी गिरावट को लेकर चिंता बढ़ गई है। रुपये के इस तरह कमजोर होने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव बन रहा है।
इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई की डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा से विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर एक राहत भरी तस्वीर भी सामने आई है। बैंकों ने पिछले कुछ हफ्तों में इस सुविधा के जरिए भारी मात्रा में डॉलर जुटाए हैं जिससे विदेशी मुद्रा भंडार को कुछ हद तक सहारा मिला है। इसके बावजूद, वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूत स्थिति और घरेलू स्तर पर आयातकों की ओर से लगातार डॉलर की मांग बनी रहने के कारण रुपये की चाल सुस्त बनी हुई है।
रुपये की कमजोरी से आम आदमी की जेब पर सीधा असर
डॉलर के मुकाबले रुपये के 96 के पार जाने की चर्चाओं ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रुपया कमजोर होने से देश में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल का आयात महंगा हो जाता है। जब कच्चा तेल महंगा होता है तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अलावा विदेश से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल और अन्य गैजेट्स भी महंगे हो जाते हैं। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों की ट्यूशन फीस और यात्रा का खर्च भी इस गिरावट के कारण काफी बढ़ जाता है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रुपये में इसी तरह की कमजोरी लंबे समय तक बनी रही तो रोजमर्रा की इस्तेमाल होने वाली कई विदेशी वस्तुएं और सामग्रियां महंगी हो सकती हैं। मध्यम वर्ग के परिवारों पर इसका असर रसोई के बजट से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक साफ तौर पर दिखाई देने लगेगा। हालांकि सरकार और केंद्रीय बैंक स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं ताकि बाजार में किसी भी तरह की भारी उथल-पुथल को समय रहते रोका जा सके।
साल 2026 के लिए क्या है विदेशी मुद्रा बाजार का अनुमान
आने वाले समय को लेकर वित्तीय विश्लेषकों का मिला-जुला रुख सामने आ रहा है। कुछ रिपोर्ट्स में साल 2026 तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने और डॉलर के थोड़ा कमजोर होने की उम्मीद जताई गई है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिरते हैं तो भारत को तेल आयात पर कम पैसा खर्च करना पड़ेगा। इससे देश के चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिल सकती है और रुपये में दोबारा मजबूती लौट सकती है।
लेकिन तात्कालिक तौर पर घरेलू शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव रुपये के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। निवेशक और आम नागरिक दोनों ही यह जानने को उत्सुक हैं कि आने वाले दिनों में विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार की दिशा क्या होगी। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे आर्थिक घटनाक्रम पर लगातार नजर रखे हुए है और आगे भी हर जरूरी अपडेट आप तक पहुंचाती रहेगी।








