देश को झकझोर देने वाले चर्चित निठारी कांड के मुख्य आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की मौत ने एक बार फिर पुराने जख्मों और कई अनछुए सवालों को हरा कर दिया है। नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड में 19 बच्चों के दुष्कर्म और हत्या के आरोपों का सामना करने वाले सुरेंद्र कोली ने उत्तराखंड के हरिद्वार में आत्महत्या कर ली है। पुलिस के अनुसार, घटना हरिद्वार के भूपतवाला इलाके की है, जहां कोली ने कथित तौर पर अपनी दुकान के भीतर फंदा लगाकर जान दे दी। मौके पर पहुंची पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने मामले की जांच शुरू कर दी है और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है।
जेल से रिहाई के बाद गुमनामी की जिंदगी और उत्तराखंड वापसी
सुरेंद्र कोली मूल रूप से उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के मंगरुखाल गांव का रहने वाला था। निठारी कांड के मामलों में लंबे समय तक अदालती लड़ाई लड़ने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक दुर्लभ फैसले में उसे बरी कर दिया था। इसके बाद 12 नवंबर 2025 की शाम को वह ग्रेटर नोएडा की लुकसर जेल से बाहर आया था। जेल से रिहाई के बाद कोली अपने गृह राज्य उत्तराखंड चला गया था और वहां एक गुमनाम जिंदगी बिताने की कोशिश कर रहा था। पिछले 10 महीनों से वह हरिद्वार के भूपतवाला इलाके में रह रहा था और अपनी आजीविका चलाने के लिए एक छोटी सी दुकान चला रहा था। स्थानीय लोगों के मुताबिक, वह बहुत ज्यादा किसी से घुलता-मिलता नहीं था और अपनी ही दुनिया में रहता था।
हालांकि, इतने लंबे समय तक जेल की चारदीवारी के अंदर काटने और फिर अचानक समाज के बीच लौटने के बाद उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा था। जानकारों का मानना है कि जेल के भीतर बिताए गए 18 साल और उसके ऊपर लगे गंभीर आरोपों का ट्रॉमा आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। पुलिस इस एंगल से भी मामले की जांच कर रही है कि क्या वह किसी गंभीर मानसिक तनाव या अवसाद से जूझ रहा था, जिसके चलते उसने यह खौफनाक कदम उठाया।
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निठारी कांड: नोएडा की उस कोठी का खौफनाक सच
यह पूरा मामला साल 2005 में गौतम बुद्ध नगर के नोएडा सेक्टर 31 स्थित निठारी गांव से शुरू हुआ था। मनिंदर सिंह पंढेर की डी-5 कोठी के बाहर गटर से बच्चों के कंकाल और हड्डियां मिलने के बाद देश भर में सनसनी फैल गई थी। जांच में सामने आया कि उस कोठी में मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण और हत्या जैसी भयानक वारदातों को अंजाम दिया गया था। इस मामले में पुलिस ने मनिंदर सिंह पंढेर और उसके घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया था। कोली पर बच्चियों के साथ दुष्कर्म, हत्या और उनके शवों के साथ अमानवीय हरकतें करने के गंभीर आरोप लगे थे।
निचली अदालतों से लेकर विभिन्न मंचों पर इस मामले की लंबी सुनवाई चली। सुरेंद्र कोली को अलग-अलग मामलों में कुल तीन बार फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे लेकर देश भर में भारी आक्रोश और बहस देखने को मिली थी। कोली के गुनाहों ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था और इस मामले ने भारतीय न्यायपालिका और पुलिस जांच प्रणाली को भी हिलाकर रख दिया था।
तीन बार फांसी की सजा और फिर कैसे मिली कानूनी राहत?
निचली अदालत और उच्च अदालतों से फांसी की सजा पाने के बाद सुरेंद्र कोली की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। एक तरफ जहां कई मामलों में उसे हाई कोर्ट से राहत मिल चुकी थी, वहीं कुछ मामलों में उसकी फांसी की सजा बरकरार रखी गई थी। आखिरी कानूनी विकल्प के रूप में कोली के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन (सुधारात्मक याचिका) दाखिल की थी। क्यूरेटिव याचिका अदालत से राहत पाने का अंतिम माध्यम होती है, जिसका उपयोग केवल अत्यंत दुर्लभ और अपवाद स्वरूप मामलों में ही किया जाता है।
सुनवाई के दौरान कोली के वकीलों ने तर्क दिया कि जिन सबूतों और बयानों को आधार बनाकर अन्य मामलों में उसे बरी किया गया है, उन्हीं बयानों के आधार पर उसे रिम्पा हल्दर की हत्या के मामले में फांसी देना न्यायसंगत नहीं है। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि पुलिस हिरासत में लिए गए बयानों को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब अन्य मामलों में उन्हीं सबूतों को खारिज कर दिया गया हो। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ बताया और कोली को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
"हम कोली के बयान को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मान सकते, जबकि दूसरे सभी मामलों में उसे खारिज कर दिया गया है। जिन सबूतों को कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है, उनके आधार पर दोषी ठहराना सही नहीं है।"— सुप्रीम कोर्ट, निठारी मामले की सुनवाई के दौरान
आत्महत्या के पीछे मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव
जेल से बाहर आने के बाद सुरेंद्र कोली के सामने एक नई दुनिया में खुद को ढालने की चुनौती थी। 18 साल तक मौत के साए में और जेल की कोठरी में बिताने के बाद सामान्य जीवन में लौटना किसी भी इंसान के लिए आसान नहीं होता। मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार, कोली गंभीर पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) या डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। इतने लंबे समय तक एकांत और अत्यधिक तनावपूर्ण माहौल में रहने वाले कैदियों की मानसिक स्थिति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है।
स्थानीय पुलिस ने बताया कि मौके से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है, लेकिन प्राथमिक दृष्टया मामला आत्महत्या का ही प्रतीत होता है। फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल से तमाम साक्ष्य जुटा लिए हैं और पुलिस अब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है ताकि मौत के असली कारणों और समय की पुष्टि हो सके। वहीं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस अचानक हुई मौत पर संदेह भी जताया है, जिसके चलते पुलिस हर संभावित पहलू से मामले की गहराई से जांच कर रही है।
निष्कर्ष और आगे की जांच
सुरेंद्र कोली का इस तरह दुनिया से चले जाना निठारी कांड के एक और अध्याय का अंत भले ही कर गया हो, लेकिन इस मामले से जुड़े कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सवाल अनुत्तरित छोड़ गया है। 18 साल जेल की सजा काटने के बाद बरी होना और फिर महज 10 महीनों के भीतर इस तरह की घटना का घटित होना समाज में पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति पर सवालिया निशान लगाता है। पुलिस और प्रशासन अब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच के आधार पर अपनी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने की तैयारी में है।






